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हेपेटाइटिस सी: संक्रमित रक्त से पनपने वाली बीमारी का होगा मुफ्त इलाज
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प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : demo photo
बरेली से मंडल के अन्य जिलों के मरीजों को भी दी जाएगी दवा, बनाया जाएगा डाटा बेस
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जिला अस्पताल भेजी गईं दवाएं, इंफेक्शन बढ़ने पर कैंसर-लिवर तक हो जाता है फेल
बरेली। खून से फैलने वाली लीवर की बीमारी हेपेटाइटिस-सी की गिरफ्त में आए लोगों को अब मुफ्त इलाज मिल सकेगा। इसकी महंगी जांचें और दवाओं की व्यवस्था निशुल्क होगी। मौजूदा समय में इसके इलाज में एक से डेढ़ लाख रुपये खर्च आता है। यहां के जिला अस्पताल में शासन की ओर से इस मर्ज की दवा भेज दी गई है। बरेली के अलावा मंडल के अन्य जिलों के मरीज भी यहां से निशुल्क दवा ले सकते हैं।
हेपेटाइटिस-सी लिवर से संबंधित एक वायरल इंफेक्शन है। इससे कई बार लिवर को बहुत ही गंभीर नुकसान पहुंचता है। चिकित्सकों के मुताबिक अनदेखी पर लिवर फेलियर या कैंसर तक की नौबत आ जाती है, फिर मरीज की जान पर बन आती है। यह बीमारी इसलिए बेहद खतरनाक मानी जाती है क्योंकि आधे से ज्यादा संक्रमित लोगों को यह पता ही नहीं होता कि उन्हें यह बीमारी भी है। ऐसा इसलिए क्योंकि उनमें इसके लक्षण या तो दिखाई नहीं देते हैं या फिर सामने आने में ही दस साल तक लग जाते हैं। इसलिए चिकित्सक समय-समय पर रक्त की जांच कराने का सुझाव देते हैं। एडीएसआईसी और बरेली जिला अस्पताल के सीएमएस डॉ. सुबोध शर्मा ने बताया कि हेपेटाइटिस सी का इंफेक्शन तब फैलता है जब वायरस खून को संक्रमित कर फैलना शुरू कर देता है। इस वायरस के सात रूप हैं और सातों के 67 प्रकार हैं। मरीज को कौन सी दवा देनी है या इलाज का तरीका क्या होगा, यह वायरस के रूप पर निर्भर करता है। जिला अस्पताल में अब दवाएं आ गई हैं। इसलिए अब इसका भी इलाज निशुल्क किया जा सकेगा।
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एक से डेढ लाख तक इलाज का खर्च
जिला अस्पताल में अब तक इस बीमारी का इलाज या दवा आदि उपलब्ध नहीं थी। कुछेक निजी अस्पतालों में ही इलाज हो रहा था। संक्रमण के शरीर में फैलने के आधार पर तीन से छह माह तक चलने वाले दवा के कोर्स पर ही करीब एक से दो लाख रुपये खर्च हो जाते हैं। बड़े शहरों तक की दौड़भाग, मानसिक तनाव अलग। जिला अस्पताल में दवा आने से पूरा कोर्स निशुल्क होगा। कोर्स पूरा करने पर वायरस शरीर से निकल जाएगा। सेंटर पर जांच के बाद एडवांस जांचें बाहर के संस्थानों से कराई जाएंगी।
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इम्यूनोसप्रैसिव दवा से होता है इलाज
वरिष्ठ फिजिशियन डॉ. अर्जुन गुप्ता के मुताबिक हेपेटाइटिस-सी संक्रमित खून से फैलता है। असुरक्षित यौन संबंधों के अलावा संक्रमित खून चढ़ने, संक्रमित उस्तरा से दाढ़ी बनवाने, मुंडन करवाने और संक्रमित नीडल के इस्तेमाल से होता है। यह रोग अभी तक लाइलाज रहा मगर अब प्रतिरोधक क्षमता कम करने वाली (इम्यूनोसप्रैसिव) दवाओं के जरिये वायरस को शरीर से बाहर करते हैं। हेपेटाइटिस-बी की वैक्सीन है, लेकिन संक्रमण हो जाने के बाद रोगी को ताउम्र इसे दबाने की दवा खानी पड़ती है। इसलिए सतर्कता जरूरी है।
पहले होता है हेपेटाइटिस-बी फिर सी
लीवर में सूजन को हेपेटाइटिस-सी या काला पीलिया कहते हैं। जो हेपेटाइटिस-सी वायरस एचसीवी की वजह से होता है। यह एक्यूट और क्रोनिक दो तरह का होता है। इसके लक्षण सामने आने में औसतन 4-12 हफ्ते या दस साल का समय लग जाता है। पीलिया बढ़ने से पहले हेपेटाइटिस-बी होता है, फिर और अधिक पीलिया बढ़ने से हेपेटाइटिस-सी हो जाता है।
लक्षण और क्या बरतें सावधानी
हेपेटाइटिस-सी होने पर भूख कम लगना, थकान, पेट दर्द, खुजली होना, पैरों में सूजन, त्वचा और आंख का पीलापन (पीलिया), वजन बढ़ना, बोलने में दिक्कत, मांसपेशी में दर्द, फ्लू आदि लक्षण होते हैं। इसके बचने के लिए नशे से दूर रहें, लीवर में वसा के इकट्ठे होने से रोकें, पानी अधिक मात्रा में पिएं, आराम करें, नींद पूरी लें, कच्चा-अधपका भोजन न करें, शक्कर और नमक की उच्च मात्रा वाले आहार न लें।
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जिला अस्पताल भेजी गईं दवाएं, इंफेक्शन बढ़ने पर कैंसर-लिवर तक हो जाता है फेल बरेली। खून से फैलने वाली लीवर की बीमारी हेपेटाइटिस-सी की गिरफ्त में आए लोगों को अब मुफ्त इलाज मिल सकेगा। इसकी महंगी जांचें और दवाओं की व्यवस्था निशुल्क होगी। मौजूदा समय में इसके इलाज में एक से डेढ़ लाख रुपये खर्च आता है। यहां के जिला अस्पताल में शासन की ओर से इस मर्ज की दवा भेज दी गई है। बरेली के अलावा मंडल के अन्य जिलों के मरीज भी यहां से निशुल्क दवा ले सकते हैं।
हेपेटाइटिस-सी लिवर से संबंधित एक वायरल इंफेक्शन है। इससे कई बार लिवर को बहुत ही गंभीर नुकसान पहुंचता है। चिकित्सकों के मुताबिक अनदेखी पर लिवर फेलियर या कैंसर तक की नौबत आ जाती है, फिर मरीज की जान पर बन आती है। यह बीमारी इसलिए बेहद खतरनाक मानी जाती है क्योंकि आधे से ज्यादा संक्रमित लोगों को यह पता ही नहीं होता कि उन्हें यह बीमारी भी है। ऐसा इसलिए क्योंकि उनमें इसके लक्षण या तो दिखाई नहीं देते हैं या फिर सामने आने में ही दस साल तक लग जाते हैं। इसलिए चिकित्सक समय-समय पर रक्त की जांच कराने का सुझाव देते हैं। एडीएसआईसी और बरेली जिला अस्पताल के सीएमएस डॉ. सुबोध शर्मा ने बताया कि हेपेटाइटिस सी का इंफेक्शन तब फैलता है जब वायरस खून को संक्रमित कर फैलना शुरू कर देता है। इस वायरस के सात रूप हैं और सातों के 67 प्रकार हैं। मरीज को कौन सी दवा देनी है या इलाज का तरीका क्या होगा, यह वायरस के रूप पर निर्भर करता है। जिला अस्पताल में अब दवाएं आ गई हैं। इसलिए अब इसका भी इलाज निशुल्क किया जा सकेगा।
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एक से डेढ लाख तक इलाज का खर्च
जिला अस्पताल में अब तक इस बीमारी का इलाज या दवा आदि उपलब्ध नहीं थी। कुछेक निजी अस्पतालों में ही इलाज हो रहा था। संक्रमण के शरीर में फैलने के आधार पर तीन से छह माह तक चलने वाले दवा के कोर्स पर ही करीब एक से दो लाख रुपये खर्च हो जाते हैं। बड़े शहरों तक की दौड़भाग, मानसिक तनाव अलग। जिला अस्पताल में दवा आने से पूरा कोर्स निशुल्क होगा। कोर्स पूरा करने पर वायरस शरीर से निकल जाएगा। सेंटर पर जांच के बाद एडवांस जांचें बाहर के संस्थानों से कराई जाएंगी।
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