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रखें ख्याल.. कहीं आने वाली नस्लों को भी न बिगाड़ दे यह प्रदूषण
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बरेली। दिल्ली-हरियाणा की तरह बरेली में भी प्रदूषण बेहद खतरनाक स्तर तक पहुंच गया है। विशेषज्ञों का दावा है कि शहर में पहली बार प्रदूषण इस स्तर तक पहुंचा है। इस प्रदूषण का सामान्य दुष्प्रभाव फेफड़ों, आंखों और त्वचा पर नुकसान के रूप में सामने आ सकता है, लेकिन लंबे समय तक इसी तरह के प्रदूषण में रहने वालों का जीन भी प्रभावित हो सकता है। ऐसे लोगों के बच्चे अपंग पैदा हो सकते हैं। महिलाएं में बांझपन की शिकार हो सकती हैं और पुरुषों की प्रजनन क्षमता पर असर पड़ सकता है।
बरेली कॉलेज के बॉटनी विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. आलोक खरे के अनुसार प्रदूषित हवा में सीसे की मात्रा के साथ सड़क पर गाड़ियों के टायर घिसने से पेरोसी एसाइल न्यूट्रेट यानी पेन भी घुला हुआ है। वातावरण में स्मॉग होने की वजह से यह प्रदूषण निचली सतह पर ही रहता है और सांस लेने के साथ शरीर के अंदर पहुंचता है। इस प्रदूषण का दुष्प्रभाव आनुवंशिक गुणों पर ज्यादा पड़ता है। पर्यावरणविद डॉ. डीके सक्सेना भी इसकी पुष्टि करते हुए बताते हैं कि पार्टीकुलेट मैटर (पीएम- 0.1, 2.5 व 10) इस वक्त काफी बड़ी मात्रा में वातावरण में है। यह फेफड़ों को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाता है और कैंसर का बड़ा कारण बन सकता है। शोध से साफ हो चुका है कि यह ब्लड सेल्स में पहुंचकर शरीर की संरचना को भी प्रभावित कर सकता है।
जीन संरचना प्रभावित होगी तो बढ़ेंगी शारीरिक विकृतियां
जिला अस्पताल के फिजीशियन डॉ. अजय मोहन के अनुसार कुछ हैवी मेटल हवा में भी घुले हैं जो प्रभावित इंसान की जीन संरचना को प्रभावित कर सकता है। इससे शारीरिक विकृतियां होने का खतरा बढ़ जाता है। प्रदूषण से क्रोनिक ब्रोंकाइटिस के भी मामले बढ़े हैं। डॉ. अजय मोहन भी मानते हैं कि प्रदूषण का स्तर इतना ज्यादा है कि लंबे समय तक इस माहौल में रहने से इंसानों में आनुवंशिक परिवर्तन हो सकते हैं और गर्भ में बच्चे का पूरी तरह विकसित न हो पाना और बच्चा अपंग पैदा होने जैसी समस्या सामने आ सकती है। हैवी मेटल्स इंसानों की प्रजनन क्षमता को प्रभावित करता है। महिलाओं में गर्भधारण की क्षमता कम हो सकती है। जिला महिला अस्पताल की डॉ. शशि गुप्ता के अनुसार प्रदूषण से गर्भ में पल रहे बच्चे पर सीधे तो प्रभाव नहीं पड़ेगा, लेकिन लंबे समय तक मां ऐसी स्थिति तो उसके स्वास्थ्य का असर बच्चे पर जरूर पड़ेगा।
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बरेली कॉलेज के बॉटनी विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. आलोक खरे के अनुसार प्रदूषित हवा में सीसे की मात्रा के साथ सड़क पर गाड़ियों के टायर घिसने से पेरोसी एसाइल न्यूट्रेट यानी पेन भी घुला हुआ है। वातावरण में स्मॉग होने की वजह से यह प्रदूषण निचली सतह पर ही रहता है और सांस लेने के साथ शरीर के अंदर पहुंचता है। इस प्रदूषण का दुष्प्रभाव आनुवंशिक गुणों पर ज्यादा पड़ता है। पर्यावरणविद डॉ. डीके सक्सेना भी इसकी पुष्टि करते हुए बताते हैं कि पार्टीकुलेट मैटर (पीएम- 0.1, 2.5 व 10) इस वक्त काफी बड़ी मात्रा में वातावरण में है। यह फेफड़ों को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाता है और कैंसर का बड़ा कारण बन सकता है। शोध से साफ हो चुका है कि यह ब्लड सेल्स में पहुंचकर शरीर की संरचना को भी प्रभावित कर सकता है।
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जीन संरचना प्रभावित होगी तो बढ़ेंगी शारीरिक विकृतियां
जिला अस्पताल के फिजीशियन डॉ. अजय मोहन के अनुसार कुछ हैवी मेटल हवा में भी घुले हैं जो प्रभावित इंसान की जीन संरचना को प्रभावित कर सकता है। इससे शारीरिक विकृतियां होने का खतरा बढ़ जाता है। प्रदूषण से क्रोनिक ब्रोंकाइटिस के भी मामले बढ़े हैं। डॉ. अजय मोहन भी मानते हैं कि प्रदूषण का स्तर इतना ज्यादा है कि लंबे समय तक इस माहौल में रहने से इंसानों में आनुवंशिक परिवर्तन हो सकते हैं और गर्भ में बच्चे का पूरी तरह विकसित न हो पाना और बच्चा अपंग पैदा होने जैसी समस्या सामने आ सकती है। हैवी मेटल्स इंसानों की प्रजनन क्षमता को प्रभावित करता है। महिलाओं में गर्भधारण की क्षमता कम हो सकती है। जिला महिला अस्पताल की डॉ. शशि गुप्ता के अनुसार प्रदूषण से गर्भ में पल रहे बच्चे पर सीधे तो प्रभाव नहीं पड़ेगा, लेकिन लंबे समय तक मां ऐसी स्थिति तो उसके स्वास्थ्य का असर बच्चे पर जरूर पड़ेगा।
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