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भगवान भरोसे पकवान, महीने भर रहें सावधान
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- फोटो : Pixabay
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महाशिवरात्रि समेत होली और अन्य आयोजनों में खपाया जाएगा सिंथेटिक दूध
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बरेली। अध्यात्म में ‘अमृत’ और वैज्ञानिक शोधों में संपूर्ण पौष्टिक आहार का दर्जा हासिल करने वाले ‘दूध’ को मिलावटखोर ‘जहरीला’ बना रहे हैं। दो दिन बाद मनाई जाने वाली महाशिवरात्रि और आगे आने वाले होली के त्यौहार पर सिंथेटिक दूध की खपत के लिए मिलावटखोर सक्रिय हो गए हैं। लोगों की सेहत दांव पर लगाकर मुनाफा कमाने वालों के खिलाफ जिम्मेदार भी जानबूझकर बेखबर बने हैं। लिहाजा, दूध से बने पकवान और उनकी सेहत भगवान भरोसे है। विशेषज्ञों ने महाशिवरात्रि पर सिंथेटिक दूध से शिव का दुग्धाभिषेक समेत शहरवासियों को घटिया पकवानों से सतर्क रहने का सुझाव दिया है।
जानकारों के मुताबिक जिले में दूध के नाम पर जहर बेचा जा रहा है। मोटा मुनाफा कमाने के चक्कर में सिंथेटिक दूध का कारोबार जोरशोर से चल रहा है। मुनाफाखोर आम दिनों में भी रोजाना 50 हजार लीटर सिंथेटिक दूध बाजार में खपाकर लोगों की सेहत से खिलवाड़ कर रहे हैं। तमाम जानकारी के बावजूद प्रशासन मौन है। जिन के ऊपर निगरानी की जिम्मेदारी है वे सिर्फ रस्म अदायगी कर पल्ला झाड़ लेते हैं। बताया जाता है कि जिले में प्रतिदिन करीब दो लाख लीटर दूध की खपत है। जबकि उपलब्धता 90 हजार लीटर है। इसमें गांव से आने वाला और पैक्ड दूध करीब 50 हजार लीटर है। फिर भी सवाल उठता है, शहर में करीब 60 हजार लीटर दूध कहां से आ रहा है। दुग्ध उत्पादन संघ के आंकड़ों के अनुसार, दो साल पूर्व शहर में करीब 406 डेयरियां थीं, लेकिन इनमें करीब सौ डेयरियां बंद हो गई। अब महज 327 डेयरियां ही बची हैं। साफ है कि दस लाख से अधिक की आबादी वाले इस शहर के लिए महज 403 डेयरियों का दूध काफी नहीं है। जिले में सिंथेटिक दूध का कारोबार फलफूल रहा है। खानापूर्ति के लिए पिछले आठ महीने में करीब एक दर्जन दूध के सैंपल लिए, लेकिन अधिकारियों के पास ऐसा कोई आंकड़ा नहीं जिसमें सिंथेटिक दूध पाए जाने की पुष्टि हुई हो।
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भैंस की कीमतें बढ़ने के साथ चारा भी महंगा हो चुका है। पशुओं के कटान से भी दूध का उत्पादन घटा है। मिलावटखोर सिंथेटिक दूध बना रहे हैं। डेयरियों पर ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन से दूध निकाला जाता है। जिसका सेवन घातक है। - लल्लू सिंह यादव, जिलाध्यक्ष, दुग्ध
जानकारों के मुताबिक जिले में दूध के नाम पर जहर बेचा जा रहा है। मोटा मुनाफा कमाने के चक्कर में सिंथेटिक दूध का कारोबार जोरशोर से चल रहा है। मुनाफाखोर आम दिनों में भी रोजाना 50 हजार लीटर सिंथेटिक दूध बाजार में खपाकर लोगों की सेहत से खिलवाड़ कर रहे हैं। तमाम जानकारी के बावजूद प्रशासन मौन है। जिन के ऊपर निगरानी की जिम्मेदारी है वे सिर्फ रस्म अदायगी कर पल्ला झाड़ लेते हैं। बताया जाता है कि जिले में प्रतिदिन करीब दो लाख लीटर दूध की खपत है। जबकि उपलब्धता 90 हजार लीटर है। इसमें गांव से आने वाला और पैक्ड दूध करीब 50 हजार लीटर है। फिर भी सवाल उठता है, शहर में करीब 60 हजार लीटर दूध कहां से आ रहा है। दुग्ध उत्पादन संघ के आंकड़ों के अनुसार, दो साल पूर्व शहर में करीब 406 डेयरियां थीं, लेकिन इनमें करीब सौ डेयरियां बंद हो गई। अब महज 327 डेयरियां ही बची हैं। साफ है कि दस लाख से अधिक की आबादी वाले इस शहर के लिए महज 403 डेयरियों का दूध काफी नहीं है। जिले में सिंथेटिक दूध का कारोबार फलफूल रहा है। खानापूर्ति के लिए पिछले आठ महीने में करीब एक दर्जन दूध के सैंपल लिए, लेकिन अधिकारियों के पास ऐसा कोई आंकड़ा नहीं जिसमें सिंथेटिक दूध पाए जाने की पुष्टि हुई हो।
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यहां हैं मिलावटीखोरी के बड़े अड्डे
नकटिया नरियावल, करगैना, लाल फाटक, भमौरा, आंवला, रामगंगा की कटरी, भोजीपुरा, धनेटा, बिनावर, तिरकुनियां, मीरगंज, धनेटा फाटक, सीबीगंज, बिथरी चैनपुर, फरीदपुर के आसपास के गांवों और तिलहर से सिंथेटिक दूध बड़ी मात्रा में बरेली लाया जा रहा है। इसमें एफएसडीए की भी मिलीभगत की संभावना जताई जा रही हैै। बताया जाता है कि करीब 60 हजार लीटर सिंथेटिक दूध यहां से ही खपाया जा रहा है।
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ऐसे बनता है सिथेंटिक दूध
सिंथेटिक दूध बनाने में केमिकल्स का प्रयोग किया जाता है। साथ ही सफेदा पेंट, यूरिया, डिटरजेंट, कॉस्टिक सोडा, शेम्पू का प्रयोग होता है। इन सबको मिलाकर कढ़ाई में खौलाया जाता है। इसके बाद दूध में चिकनाई दिखाने के लिए ऊपर से रिफाइंड डाला जाता है। खौलने के बाद यह दूध देखने में असल जैसा लगता है। बताते हैं कि सिंथेटिक दूध का धंधा इसलिए बढ़ रहा है क्योंकि इसमें मोटा मुनाफा है। सैकड़ों लीटर के हिसाब से यह दूध बनाया जाता है। लिहाजा इसकी कीमत महज चार से पांच रुपये प्रति लीटर आती है। जबकि बाजार में इसे आसानी 35 से 40 रुपये लीटर तक बेच दिया जाता है।गंभीर बीमार बना रहा सिंथेटिक दूध
जिला अस्पताल के फिजिशियन डॉ. वागीश वैश्य के मुताबिक सिंथेटिक दूध सीधे आंतों पर असर करता है। दो-चार साल इसका सेवन करने से कैंसर का खतरा मंडराने लगता है। चूंकि छोटे बच्चे नियमित दूध का सेवन करते हैं। सिंथेटिक दूध पीने पर उन्हें कैंसर होने की सबसे ज्यादा संभावना रहती है। इसके अलावा इसके पीने से पाचन शक्ति कमजोर होना, फूड प्वॉयजनिंग का खतरा, शरीर का विकास रुक जाना, पीलिया समेत किडनी और अन्य बीमारियां भी होने की आशंका रहती है।2006 में लागू हुआ था एक्ट
विभिन्न खाद्य पदार्थों में मिलावट रोकने के लिए सरकार ने एफएसएसएआई (भारतीय खाद्य सुरक्षा मानक अधिनियम एक्ट 2006) लागू किया था। इसमें विभिन्न उत्पादों में गंभीर मिलावट पाए जाने पर सजा व जुर्माना दोनों का प्रावधान है। मानक अधिनियम के अनुसार दूध में फैट कम करना भी नियमों का उल्लंघन है। गाय के दूध का फैट 3.5, भैंस के दूध में 5.00 और मिक्स्ड दूध में 4.5 फैट की मात्र निर्धारित की है।भैंस की कीमतें बढ़ने के साथ चारा भी महंगा हो चुका है। पशुओं के कटान से भी दूध का उत्पादन घटा है। मिलावटखोर सिंथेटिक दूध बना रहे हैं। डेयरियों पर ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन से दूध निकाला जाता है। जिसका सेवन घातक है। - लल्लू सिंह यादव, जिलाध्यक्ष, दुग्ध