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Bareilly News: परंपरा के चाक से संस्कृति और पर्यावरण को दे रहे रफ्तार

Mon, 16 Dec 2024 02:37 AM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Mon, 16 Dec 2024 02:37 AM IST
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Giving momentum to culture and environment with the wheel of tradition
बरेली। आधुनिक दौर में लोग एक बार फिर मिट्टी के बर्तनों की तरफ रुख कर रहे हैं। ये बर्तन पर्यावरण हितैषी और किफायती होने के साथ-साथ सेहत के लिए भी लाभदायक हैं। कुम्हार भी इस पुरातन कला को नया आयाम दे रहे हैं। उनकी चाक पर संस्कृति के साथ पर्यावरण भी रफ्तार भर रहा है। गांवों के साथ ही शहरों, मेलों प्रदर्शनियों में भी मिट्टी के बर्तन अपनी खूबसूरती और उपयोगिता के कारण लोगों को लुभा रहे हैं।
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कुम्हार अब अपने हुनर को नए अंदाज में लोगों के सामने पेश कर रहे हैं। वे मिट्टी के बर्तनों को नए रूप-रंग में आधुनिक ट्रेंड्स के अनुरूप ढाल रहे हैं। मिट्टी के बर्तनों में अब परंपरागत पतीले और सुराही के अलावा फ्राइंग पैन, कुकर, कढ़ाई, थाली, और डोंगे भी उपलब्ध हैं। कुम्हार समुदाय ने ग्राहकों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए इन्हें खास अंदाज में तैयार किया है। इन बर्तनों का उपयोग न केवल घरेलू रसोई में, बल्कि रेस्टोरेंट और कैफे तक में हो रहा है। कुल्हड़ वाली चाय, मटके की दही लोगों को खूब भा रही है।
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किफायती और पर्यावरण के लिए बेहतर
प्लास्टिक और धातु के बर्तनों की तुलना में मिट्टी के बर्तन सस्ते और टिकाऊ होते हैं। साथ ही, ये पर्यावरण के लिए नुकसानदायक नहीं हैं, क्योंकि इन्हें बनाने में केवल प्राकृतिक सामग्री का उपयोग होता है और अनुपयोगी होने के बाद ये आसानी से मिट्टी में घुल जाते हैं। मिट्टी के बर्तनों में पकाया गया भोजन न केवल स्वादिष्ट होता है, बल्कि स्वास्थ्य के लिए भी लाभदायक होता है।
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मिट्टी के बर्तनों की बढ़ी मांग

विक्रेता रामा शंकर बताते हैं कि कुछ सालों से कुल्हड़ और मिट्टी के अन्य बर्तनों की मांग बढ़ी है। कैफे और होटलों से भी ऑर्डर आने लगे हैं। अब मिट्टी के बर्तन भी अनेक वैरायटी में उपलब्ध हैं। कुम्हार रवि प्रजापति ने बताया कि वह पारंपरिक तरीके से बर्तन बनाते हैं। अब लोगों की ओर से स्टील, तांबे के बर्तनों के बजाय मिट्टी के बर्तन खरीदे जा रहे हैं। इससे उनके कार्य को भी प्रोत्साहन मिल रहा है।
ये हैं बर्तनों के दाम
बर्तन दाम रुपये में
कुकर 800
कढ़ाई 400
तवा 180
थाली 50
सुराही 100-300
कुल्हड़ 2
संवाद
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