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सामान्य नागरिक संहिता से इत्तफाक नहीं रखते उलमा
ब्ययूराो, अमर उजाला बरेली।
Updated Sun, 03 Jul 2016 12:32 AM IST
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सामान्य नागिरक संहिता की खबर से आलिमों में हलचल है। उनका कहना है कि वह इससे इत्तफाक नहीं रखते क्योंकि वह इसे मजहब में हस्तक्षेप मानते हैं। इस मामले में कुछ उलमा ने अपनी राय में साफ कहा है कि यह मजहब में हस्तक्षेप होगा और इसके लागू होने से अराजकता फैल जाएगी।
दरगाह आला हजरत से जुड़े संगठन जमात रजा मुस्तफा के राष्ट्रीय महासचिव मौैलाना शहाबउद्दीन रजवी ने कहा कि सामान्य नागरिक संहिता शरियत के खिलाफ है। इसे मुसलमान कुबूल नहीं कर सकता। इसका खुल कर विरोध होगा। उन्होंने कहा कि इससे समाज में अव्यवस्था फैल जाएगी। समाजी ढांचा चरमरा जाएगा क्योंकि इस्लाम में बहुत से ऐसे अरकान हैं जिसकी मजहबी अहमियत घट जाएगी। इस लिए यह संभव नहीं है।
शाही जामा मस्जिद के इमाम और शहर इमाम मुफ्ती खुर्शीद आलम का कहना है कि मसला सिर्फ पिता की जायदाद का ही हो तो बेटा बेटी का हक बराबर कैसे हो सकता है। ऐसे फैसले में कुरान की मुखालफत नहीं कर सकते। शरियत का कानून अटल है। इसके खिलाफ मौलवी हो या कोर्ट फैसला नहीं दे सकते। रहा सवाल तलाक का तो इसकी भी अलग-अलग कंडीशन की होती है। तलाक के मामले का हल सिर्फ दारुल कजा में हो सकता है।
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सूफी मत की खानकाह नियाजिया के मुंतजिम सिबतैन हसन नियाजी उर्फ शब्बू मियां के अनुसार सामन्य नागरिक संहिता का सवाल आता है तो उससे पहले लोगों को कनवेंस करने की जरूरत है। अगर हम देश के हर वर्ग और नागरिक की बात कर रहे हैं जिसमें सब को शैक्षिक, समाजिक, आर्थिक और व्यवसायिक रूप से समान अधिकार देने बात है तो ठीक है। इसके विपरीत यदि धर्म और उसके कानून में बदलाव की बात है तो उसमें कोई दखल नहीं दे सकता चाहे वह कोई सियासी जमात हो या हुकूमत। यह मुमकिन नहीं इसमें बहुत दिक्कतें पैदा होंगी।
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दरगाह आला हजरत से जुड़े संगठन जमात रजा मुस्तफा के राष्ट्रीय महासचिव मौैलाना शहाबउद्दीन रजवी ने कहा कि सामान्य नागरिक संहिता शरियत के खिलाफ है। इसे मुसलमान कुबूल नहीं कर सकता। इसका खुल कर विरोध होगा। उन्होंने कहा कि इससे समाज में अव्यवस्था फैल जाएगी। समाजी ढांचा चरमरा जाएगा क्योंकि इस्लाम में बहुत से ऐसे अरकान हैं जिसकी मजहबी अहमियत घट जाएगी। इस लिए यह संभव नहीं है।
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शाही जामा मस्जिद के इमाम और शहर इमाम मुफ्ती खुर्शीद आलम का कहना है कि मसला सिर्फ पिता की जायदाद का ही हो तो बेटा बेटी का हक बराबर कैसे हो सकता है। ऐसे फैसले में कुरान की मुखालफत नहीं कर सकते। शरियत का कानून अटल है। इसके खिलाफ मौलवी हो या कोर्ट फैसला नहीं दे सकते। रहा सवाल तलाक का तो इसकी भी अलग-अलग कंडीशन की होती है। तलाक के मामले का हल सिर्फ दारुल कजा में हो सकता है।
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सूफी मत की खानकाह नियाजिया के मुंतजिम सिबतैन हसन नियाजी उर्फ शब्बू मियां के अनुसार सामन्य नागरिक संहिता का सवाल आता है तो उससे पहले लोगों को कनवेंस करने की जरूरत है। अगर हम देश के हर वर्ग और नागरिक की बात कर रहे हैं जिसमें सब को शैक्षिक, समाजिक, आर्थिक और व्यवसायिक रूप से समान अधिकार देने बात है तो ठीक है। इसके विपरीत यदि धर्म और उसके कानून में बदलाव की बात है तो उसमें कोई दखल नहीं दे सकता चाहे वह कोई सियासी जमात हो या हुकूमत। यह मुमकिन नहीं इसमें बहुत दिक्कतें पैदा होंगी।