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Bareilly News: गांधी का चरखा...कच्चे माल की कमी से ठिठका
Sat, 08 Aug 2026 03:00 AM IST
बरेली ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बरेली
संवाद न्यूज एजेंसी, बरेली
Updated Sat, 08 Aug 2026 03:00 AM IST
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बरेली। आजादी के बाद 79 वर्षों में तकनीकी बदली, चरखे बदले, बुनकरों की संख्या बढ़ी, लेकिन खादी उत्पादन की तस्वीर नहीं बदली। पूंजी और कच्चे माल की कमी से गांधी का चरखा बार-बार ठिठकता रहा। क्षेत्रीय श्री गांधी आश्रम के सचिव अनिल कुमार ने बताया कि वर्तमान में 25 सोलर चरखे और 421 बुनकर हैं, लेकिन कच्ची रुई की खरीद न हो पाने से बिक्री के सापेक्ष उत्पादन नहीं हो पा रहा है।
अनिल के अनुसार, पहले एक बुनकर को एक किलो सूत तैयार करने में पूरा दिन लग जाता था। अब सोलर चरखे पर एक साथ नौ तकले चलने से रोज 20 किलो तक सूत तैयार किया जा सकता है। इससे समय की बचत होती है। धागा लंबा और मजबूत बनता है। इससे बने कपड़े की फिनिशिंग और गुणवत्ता बेहतर होती है, लेकिन पूंजी की कमी के कारण रुई पर्याप्त मात्रा में नहीं खरीदी जाती। इससे सूत का उत्पादन कम होता है। नतीजा, 25 में से 11 सोलर चरखे ही संचालित हैं।
अनिल ने बताया कि कच्ची रूई रायबरेली से खरीदी जाती है। बरेली में उससे सूत तैयार होता है।
रंगाई, बुनाई और ढलाई का काम उत्तराखंड के काशीपुर में होता है, जबकि धुलाई पिलखुआ और मेरठ में कराई जाती है। इस कारण खादी के वस्त्र महंगे होते हैं, लेकिन इससे कई जिलों के परिवारों को रोजगार मिलता है। वर्तमान में बुनकरों की संख्या 250 से घटकर 25 रह गई है। पांच साल में खादी बिक्री केंद्र 50 से घटकर 15 रह गए हैं। कर्मचारियों की संख्या भी 300 से 30 पर सिमट गई है। संवाद
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अनिल के अनुसार, पहले एक बुनकर को एक किलो सूत तैयार करने में पूरा दिन लग जाता था। अब सोलर चरखे पर एक साथ नौ तकले चलने से रोज 20 किलो तक सूत तैयार किया जा सकता है। इससे समय की बचत होती है। धागा लंबा और मजबूत बनता है। इससे बने कपड़े की फिनिशिंग और गुणवत्ता बेहतर होती है, लेकिन पूंजी की कमी के कारण रुई पर्याप्त मात्रा में नहीं खरीदी जाती। इससे सूत का उत्पादन कम होता है। नतीजा, 25 में से 11 सोलर चरखे ही संचालित हैं।
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अनिल ने बताया कि कच्ची रूई रायबरेली से खरीदी जाती है। बरेली में उससे सूत तैयार होता है।
रंगाई, बुनाई और ढलाई का काम उत्तराखंड के काशीपुर में होता है, जबकि धुलाई पिलखुआ और मेरठ में कराई जाती है। इस कारण खादी के वस्त्र महंगे होते हैं, लेकिन इससे कई जिलों के परिवारों को रोजगार मिलता है। वर्तमान में बुनकरों की संख्या 250 से घटकर 25 रह गई है। पांच साल में खादी बिक्री केंद्र 50 से घटकर 15 रह गए हैं। कर्मचारियों की संख्या भी 300 से 30 पर सिमट गई है। संवाद
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