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लागत दोगुनी से भी ज्यादा हुई पर सात साल में भी नहीं बनी फोरेंसिक लैब
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बरेली। अपराधियों पर समय से शिकंजा कस जाए। पीड़ितों को समय से पहले न्याय मिले। इसी को ध्यान में रखकर शासन ने सात साल पहले फोरेंसिक लैब का प्रोजेक्ट मंजूर किया लेकिन निर्माण अब तक नहीं हो सका है। इस प्रोजेक्ट की लागत 23.11 करोड़ से बढ़कर 48 करोड़ तक पहुंच गई है। वर्तमान में प्रयोगशाला के मुख्य भवन का कार्य लगभग बंद पड़ा है। गेस्ट हाउस का निर्माण कराया जा रहा है। प्रयोगशाला के निर्माण में अभी एक साल का समय और लगेगा।
सपा शासनकाल में वर्ष 2015-16 में बरेली के लिए फोरेंसिक लैब का प्रस्ताव मंजूर किया गया। इस कार्य के लिए 23.11 करोड़ की मंजूरी मिली। इस लैब निर्माण की जिम्मेदारी उत्तर प्रदेश राजकीय निर्माण निगम को सौंपी गई। इसके लिए स्थल चयन पर मंथन शुरू हुआ। तय हुआ कि बड़ा बाईपास स्थित ट्यूलिया गांव की 7910 वर्ग मीटर जमीन पर यह प्रोजेक्ट उतारा जाएगा। पता लगा कि यह जमीन ग्रीनबेल्ट में है, इसे शासन की ओर से बदला गया और कुछ समय बाद काम शुरू करा दिया गया। काम तेजी से चला लेकिन बाद में धीरे-धीरे नीचे आता गया। एक साल पहले प्रोजेक्ट की लागत बढ़कर 40 करोड़ पहुंची। यह प्रस्ताव शासन को गया लेकिन मंजूरी नहीं मिली। कुछ दिनों पहले फिर रिवाइज इस्टीमेेट तैयार हुआ। बताते हैं कि बजट बढ़कर 48 करोड़ पहुंच गया। इस बढ़े बजट को शासन की ओर से स्वीकृति नहीं दी गई। बताते हैं कि कार्यदायी संस्था रिवाइज बजट का प्रस्ताव बनाने में जिस तरह दिलचस्पी ले रही थी, उसी तरह यदि काम किया जाता तो वर्ष 2020-21 में यह कार्य पूरा हो जाता।
गेस्ट हाउस की जल्दी, मुख्य भवन का काम रुका
बड़ा बाईपास से कुछ दूरी पर ही फोरेंसिक लैब बनाई जा रही है। रास्ता कच्चा है। बारिश के कारण दलदल हो गई। यहां कार्यदायी संस्था ने अपने तीन लोगों को मॉनिटरिंग के लिए रखा है। एक चौकीदार तैनात है। गार्ड रूम का प्रयोग कार्यालय के रूप में किया जा रहा है। मुख्य भवन में 30 से अधिक बड़े हॉल बनाए गए हैं। यह भवन तीन मंजिला है। 10 से अधिक हॉल में टाइल लगाई गई हैं। जगह-जगह सरिया, रेता पड़ा था। राजकीय निर्माण निगम के यहां तैनात किए गए एक कर्मचारी ने बताया कि मुख्य भवन का काम बंद है। गेस्ट हाउस दस दिन में तैयार करके देना है। ऐसे में उसी पर जोर दिया जा रहा है। गेस्ट रूम में छह कमरे हैं।
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बोर्ड मलबे में तब्दील
कोई भी निर्माण शुरू होता है तो उसके लिए बाकायदा साइड पर बोर्ड लगा होता है, जिस पर पूरे कार्यों का लेखाजोखा होता है लेकिन यहां कोई बोर्ड नहीं मिला। काफी खोजने के बाद झाड़ियों के बीच में बोर्ड मिला जो मलबे की तरह हो गया। बोर्ड के ऊपरी हिस्से में कोई जानकारी अंकित नहीं है। सवाल खड़ा ये है कि आखिर यह जानकारी साइड पर क्यों छिपाई गई।
कुर्सियां, आलमारी मंगवाईं
भवन का निर्माण भले ही सात साल में पूरा नहीं हुआ हो लेकिन दूसरी मंजिल पर एक हॉल में कुर्सियां व आलमारी रखी हुई थीं। यह सामान पहले ही मंगवा लिया गया। बताते हैं कि गेस्ट हाउस में यह सामान रखवाया जाएगा। साथ ही तीन से चार कमरों को तैयार करके प्रारंभिक प्रयोगशाला शुरू करने की तैयारी चल रही है। गार्ड रूम में भी इस प्रयोगशाला को प्रारंभ में शुरू किया जा सकता है।
मैंने राजकीय निर्माण निगम के अधिकारियों से वार्ता की है। कार्य में देरी हुई है लेकिन जल्द पूरा करने के निर्देश दिए गए हैं। प्रोजेक्ट की लागत जो बढ़ी है वह राशि मंजूर नहीं हुई है। - जग प्रवेश, सीडीओ
लैंड यूज परिवर्तन में काफी समय लग गया। साथ ही कोरोना से भी काम प्रभाति रहा। इससे प्रोजेक्ट की लागत बढ़ गई। भवन का अधिकांश कार्य पूरा हो गया है। बाकी कार्य भी जल्द पूरा किया जाएगा। - सतेंद्र कुमार, प्रोजेक्ट मैनेजर, राजकीय निर्माण निगम
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सपा शासनकाल में वर्ष 2015-16 में बरेली के लिए फोरेंसिक लैब का प्रस्ताव मंजूर किया गया। इस कार्य के लिए 23.11 करोड़ की मंजूरी मिली। इस लैब निर्माण की जिम्मेदारी उत्तर प्रदेश राजकीय निर्माण निगम को सौंपी गई। इसके लिए स्थल चयन पर मंथन शुरू हुआ। तय हुआ कि बड़ा बाईपास स्थित ट्यूलिया गांव की 7910 वर्ग मीटर जमीन पर यह प्रोजेक्ट उतारा जाएगा। पता लगा कि यह जमीन ग्रीनबेल्ट में है, इसे शासन की ओर से बदला गया और कुछ समय बाद काम शुरू करा दिया गया। काम तेजी से चला लेकिन बाद में धीरे-धीरे नीचे आता गया। एक साल पहले प्रोजेक्ट की लागत बढ़कर 40 करोड़ पहुंची। यह प्रस्ताव शासन को गया लेकिन मंजूरी नहीं मिली। कुछ दिनों पहले फिर रिवाइज इस्टीमेेट तैयार हुआ। बताते हैं कि बजट बढ़कर 48 करोड़ पहुंच गया। इस बढ़े बजट को शासन की ओर से स्वीकृति नहीं दी गई। बताते हैं कि कार्यदायी संस्था रिवाइज बजट का प्रस्ताव बनाने में जिस तरह दिलचस्पी ले रही थी, उसी तरह यदि काम किया जाता तो वर्ष 2020-21 में यह कार्य पूरा हो जाता।
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गेस्ट हाउस की जल्दी, मुख्य भवन का काम रुका
बड़ा बाईपास से कुछ दूरी पर ही फोरेंसिक लैब बनाई जा रही है। रास्ता कच्चा है। बारिश के कारण दलदल हो गई। यहां कार्यदायी संस्था ने अपने तीन लोगों को मॉनिटरिंग के लिए रखा है। एक चौकीदार तैनात है। गार्ड रूम का प्रयोग कार्यालय के रूप में किया जा रहा है। मुख्य भवन में 30 से अधिक बड़े हॉल बनाए गए हैं। यह भवन तीन मंजिला है। 10 से अधिक हॉल में टाइल लगाई गई हैं। जगह-जगह सरिया, रेता पड़ा था। राजकीय निर्माण निगम के यहां तैनात किए गए एक कर्मचारी ने बताया कि मुख्य भवन का काम बंद है। गेस्ट हाउस दस दिन में तैयार करके देना है। ऐसे में उसी पर जोर दिया जा रहा है। गेस्ट रूम में छह कमरे हैं।
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बोर्ड मलबे में तब्दील
कोई भी निर्माण शुरू होता है तो उसके लिए बाकायदा साइड पर बोर्ड लगा होता है, जिस पर पूरे कार्यों का लेखाजोखा होता है लेकिन यहां कोई बोर्ड नहीं मिला। काफी खोजने के बाद झाड़ियों के बीच में बोर्ड मिला जो मलबे की तरह हो गया। बोर्ड के ऊपरी हिस्से में कोई जानकारी अंकित नहीं है। सवाल खड़ा ये है कि आखिर यह जानकारी साइड पर क्यों छिपाई गई।
कुर्सियां, आलमारी मंगवाईं
भवन का निर्माण भले ही सात साल में पूरा नहीं हुआ हो लेकिन दूसरी मंजिल पर एक हॉल में कुर्सियां व आलमारी रखी हुई थीं। यह सामान पहले ही मंगवा लिया गया। बताते हैं कि गेस्ट हाउस में यह सामान रखवाया जाएगा। साथ ही तीन से चार कमरों को तैयार करके प्रारंभिक प्रयोगशाला शुरू करने की तैयारी चल रही है। गार्ड रूम में भी इस प्रयोगशाला को प्रारंभ में शुरू किया जा सकता है।
मैंने राजकीय निर्माण निगम के अधिकारियों से वार्ता की है। कार्य में देरी हुई है लेकिन जल्द पूरा करने के निर्देश दिए गए हैं। प्रोजेक्ट की लागत जो बढ़ी है वह राशि मंजूर नहीं हुई है। - जग प्रवेश, सीडीओ
लैंड यूज परिवर्तन में काफी समय लग गया। साथ ही कोरोना से भी काम प्रभाति रहा। इससे प्रोजेक्ट की लागत बढ़ गई। भवन का अधिकांश कार्य पूरा हो गया है। बाकी कार्य भी जल्द पूरा किया जाएगा। - सतेंद्र कुमार, प्रोजेक्ट मैनेजर, राजकीय निर्माण निगम