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पेट की खातिर आज भी सिर पर मैला ढो रही सुनीता
बरेली।
Updated Sat, 18 Nov 2017 02:16 AM IST
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सुनीता
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राष्ट्रीय स्वच्छता मिशन के तहत शहर के हर एक घर में शौचालय बनवाकर लोगों को खुले में शौच से मुक्त (ओडीएफ) करना है। बरेली शहर को ओडीएफ करने के लिए नगर आयुक्त और उनकी टीम पूरी शिद्दत से लगने का दावा कर रही है, लेकिन सैदपुर हॉकिंस की सुनीता आज भी सिर पर मैला ढोकर अपना परिवार पालती है। कोई सरकारी अधिकारी, कर्मचारी या समाजसेवी सुनीता से पूछने तक नहीं गया कि मैला ढोने के पीछे उसकी क्या मजबूरी है, जबकि सिर पर मैला ढोना अब कानूनन जुर्म भी है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सपना देश के हर व्यक्ति को खुले में शौच से मुक्त करना है। इसके लिए सरकार 12 हजार रुपये की मदद भी कर रही है। विज्ञापनों के जरिये भी सरकार लोगों को जागरूक करने में अरबों रुपया खर्च कर रही है, लेकिन सैदपुर हॉकिंस में मोदी के स्वच्छता अभियान का सुनीता पर कोई असर नहीं है। वह रोजाना सुबह सात बजे ही सिर पर मैला ढोने के लिए घर से निकल जाती है। सुनीता सैदपुर हॉकिंस में ही बर्फखाने के पास रहने वाले इशहाक, इकबाल, चांद बाबू, अनीस, सुर्रा आदि करीब आठ घरों से मैला उठाती है और उसे नदी किनारे फेंकने जाती है। इसके बदले हर घर से सुनीता को महीने में 100 रुपये मिलते हैं। इसी से सुनीता के परिवार का खर्च चलता है।
ससुर रेलवे में नौकरी करते थे। उस समय सास मैला ढोने का काम करती थीं। पति राकेश बीमार रहते हैं। बेटा कुछ काम कर लेता है, लेकिन उससे परिवार नहीं चल पाता। यह सब मैं खुशी से तो नहीं करती। पांच बच्चे हैं। बीमार पति है। मजबूरी में मैला ढोती हूं। सरकार को मेरे बारे में सोचना चाहिए। सुनीता, स्वच्छकार
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सिर पर मैला ढोना गंभीर मामला है। स्वच्छकारों के लिए तमाम योजनाएं हैं। मैं सुनीता के बारे में जानकारी कराने के बाद उसके लिए अवश्य कुछ करूंगा। शहर में ऐसे कुछ लोग भी होेंगे जो सुनीता की मदद के लिए आगे आएंगे, उनका भी सहयोग लिया जाएगा। - आरके श्रीवास्तव, नगर आयुक्त
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सपना देश के हर व्यक्ति को खुले में शौच से मुक्त करना है। इसके लिए सरकार 12 हजार रुपये की मदद भी कर रही है। विज्ञापनों के जरिये भी सरकार लोगों को जागरूक करने में अरबों रुपया खर्च कर रही है, लेकिन सैदपुर हॉकिंस में मोदी के स्वच्छता अभियान का सुनीता पर कोई असर नहीं है। वह रोजाना सुबह सात बजे ही सिर पर मैला ढोने के लिए घर से निकल जाती है। सुनीता सैदपुर हॉकिंस में ही बर्फखाने के पास रहने वाले इशहाक, इकबाल, चांद बाबू, अनीस, सुर्रा आदि करीब आठ घरों से मैला उठाती है और उसे नदी किनारे फेंकने जाती है। इसके बदले हर घर से सुनीता को महीने में 100 रुपये मिलते हैं। इसी से सुनीता के परिवार का खर्च चलता है।
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ससुर रेलवे में नौकरी करते थे। उस समय सास मैला ढोने का काम करती थीं। पति राकेश बीमार रहते हैं। बेटा कुछ काम कर लेता है, लेकिन उससे परिवार नहीं चल पाता। यह सब मैं खुशी से तो नहीं करती। पांच बच्चे हैं। बीमार पति है। मजबूरी में मैला ढोती हूं। सरकार को मेरे बारे में सोचना चाहिए। सुनीता, स्वच्छकार
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सिर पर मैला ढोना गंभीर मामला है। स्वच्छकारों के लिए तमाम योजनाएं हैं। मैं सुनीता के बारे में जानकारी कराने के बाद उसके लिए अवश्य कुछ करूंगा। शहर में ऐसे कुछ लोग भी होेंगे जो सुनीता की मदद के लिए आगे आएंगे, उनका भी सहयोग लिया जाएगा। - आरके श्रीवास्तव, नगर आयुक्त