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किसी का भी कत्ल करना नाजायज चाहे गुस्ताख-ए-रसूल क्यों न हो

Thu, 07 Jul 2022 02:18 AM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Thu, 07 Jul 2022 02:18 AM IST
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fatwa of ala hazrat on udaypur incident
बरेली। किसी भी मुल्क में कानून हाथ में लेकर किसी का कत्ल करना नाजायज है और ऐसा करने वाला शरीयत के मुताबिक सख्त सजा का हकदार है, चाहे मामला पैगंबरे इस्लाम के खिलाफ गुस्ताखी का क्यों न हो। सुन्नी विचारधारा के सबसे बड़े धर्मगुरु माने जाने वाले आला हजरत का सन् 1906 में दिया यह फतवा उदयपुर की घटना के बाद माहनामा आला हजरत में प्रकाशित किया गया है।
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दरगाह आला हजरत की ओर से हर महीने माहनामा प्रकाशित किया जाता है जिसके संपादक दरगाह प्रमुख मौलाना सुब्हान रजा खां उर्फ सुब्हानी मिया हैं। जुलाई के माहनामा में आला हजरत के फतवे को मुफ्ती सलीम नूरी ने लेखबद्ध किया है। इसमें साफ किया गया है कि आला हजरत इमाम अहमद रजा खां फाजिले बरेलवी से 1906 में हजयात्रा के दौरान अरब के लोगों ने यह सवाल करते हुए फतवा मांगा था कि क्या किसी गुस्ताखे रसूल को कत्ल कर देना चाहिए। आला हजरत ने शरीयत का हवाला देते हुए नाजायज बताया था। फतवे में उन्होंने कहा था कि किसी भी इस्लामी या गैर इस्लामी मुल्क में ऐसे शख्स को सजा देने का हक सिर्फ उस मुल्क के बादशाह या अदालत को है।
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माहनामा में प्रकाशित लेख में आला हजरत के फतवे के आधार पर लिखा गया है कि बाहरी नारों और खूंखार विचारों से प्रभावित होकर यह मानना नाजायज है कि पैगंबर की शान में गुस्ताखी करने वालों का सर तन से जुदा करना इस्लामी नजरिए से सवाब का काम है। यह जुर्म है और ऐसा कोई भी शख्स शरीयत के हिसाब से गुनहगार है जिसे अदालत से सजा मिलनी चाहिए।
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आला हजरत के फतवे के मुताबिक लोकतांत्रिक देशों में हर किसी की जिम्मेदारी है कि वह मुजरिम के जुर्म से घृणा करे। उसके साथ रहने से आम लोगों को बचाए और न्यायपालिका के माध्यम से उसे सजा दिलाने की कोशिश करे। किसी इस्लामिक देश में जहां ईशनिंदा की सजा मौत है, वहां भी कोई आम आदमी किसी की जान ले तो उसे कातिल और गुनहगार माना जाना चाहिए और हुकूमत और अदालत के जरिए सजा मिलनी चाहिए। मुफ्ती सलीम नूरी ने लेख में लिखा है कि सर तन से जुदा के नारे का इस्लाम से कोई ताल्लुक नहीं है। आला हजरत को अमन और सुन्नियत का पैरोकार बताया गया है।
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