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आठ दिन, दो शिकार, 35 लोगों की टीम के हाथ नहीं आ सकी बाघिन

Sun, 26 Jun 2022 01:33 AM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Sun, 26 Jun 2022 01:33 AM IST
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Eight days, two hunts... the tigress is not coming to the hands of the team of 35 people
बाघ - फोटो : LAKHIMPUR
तिकुनिया। आठ दिन के अंदर महंत, किशोर और जानवरों छह का शिकार करने वाली बाघिन बेहद चालाक है। दो बार वन विभाग की टीम को चकमा दे चुकी है। खैरटिया मंझरा पूरब में महंत की कुटी के पास लगाए गए पिंजरे में वन विभाग ने पड्डा बांधा था। बाघिन आई और पड्डे को उठा भी ले गई मगर टीम को खबर तक नहीं लगी। इससे पहले बांधे गए पड्डे को भी बाघिन ने आसानी से अपना शिकार बना लिया था। वन विभाग के 35 लोगों की टीम बाघिन के पीछे लगी है मगर सफलता अब तक नहीं मिली।
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लखनऊ से बाघिन को बेहोश करने के लिए आई विशेषज्ञों की टीम ने बाघिन के पगमार्ग देखकर बताया कि इस इलाके में एक नहीं बल्कि दो बाघिन सक्रिय हैं। इनमें कौन सी बाघिन इंसानों का शिकार कर रही है, इस बाबत अभी कुछ कहा नहीं जा सकता। फिलहाल बाघिन को बेहोश करने के लिए वनाधिकारियों ने मुहिम और तेज कर दी है। लखनऊ की टीम के साथ आए अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक केपी दुबे ने बताया कि बाघिन के पगमार्क लिए गए हैं। दो बाघिनों के सक्रिय होने की आशंका जताई गई है, हालांकि इसकी अभी जांच चल रही है।
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शुक्रवार की रात महंत की कुटी के पास लगे पिंजरे में शिकार के लिए पड्डा बांधा गया था। बाघिन आई, पड्डे को खाकर चली भी गई। इस बीच वन कर्मचारी और अधिकारी एक बार फिर चूक गए। केपी दुबे ने बताया कि बाघिन आदमखोर हो चुकी है, इसलिए किसी भी कीमत पर इसे पकड़ना अनिवार्य है। बाघिन को बेहोश करने के लिए पांच विशेषज्ञों और बाघिन का पता लगाने के लिए 35 कर्मचारी लगाए गए हैं। घटनास्थल पर मुख्य वन संरक्षक संजय पाठक, डीएफओ सुंदरेशा रेंजर विमलेश कुमार सहित बड़ी संख्या में वन कर्मचारी मौजूद रहे।
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18 जून को बाघिन ने खैरटिया स्थित मंदिर के महंत को मार डाला।
19 जून को एक गाय और उसके बछड़े को शिकार बनाया।
30 जून को पशु चरा रहे एक किशोर को हमलाकर मार दिया।
02 पड्डे खींच ले गई वो भी पिंजरे से।
घायल या वृद्ध बाघ बन जाते हैं आदमखोर
लखीमपुर खीरी। दुधवा टाइगर रिजर्व के फील्ड डायरेक्टर संजय पाठक का कहना है कि प्राय: घायल और वृद्ध बाघ आदमखोर बनते हैं। क्योंकि इंसान उनके लिए आसान शिकार होता है, लेकिन अक्सर युवा बाघ भी इंसानों का शिकार करते देखे गए हैं। कई बार बाघ को शारीरिक दिक्कत होती है, या फिर उसके दांत टूटे हुए होते हैं। इस वजह से भी वह इंसानों, बच्चों और मवेशियों को अपना शिकार बनाता है। अशक्त होने की दशा में बाघ आसान शिकार तलाशता है। खीरी जिले में इससे पहले मैलानी रेंज के छेदीपुर सहित दो जगहों से और किशनपुर सेंक्चुरी के कांपटांडा में बाघों को आदमखोर घोषित कर पकड़ा जा चुका है। जिले के पांच बाघ इन दिनों चिड़ियाघर में रह रहे हैं।
इस तरह बाघों को घोषित किया जाता है आदमखोर
बाघ को आदमखोर घोषित करने के संबंध वाइल्ड लाइफ एक्ट 1972 के सेक्शन 11 में विस्तार से बताया गया है। एक्ट के अनुसार जो जानवर डेंजरस टू ह्यूमन लाइफ यानी इंसानों के लिए खतरनाक होता है, उसे हटाने या शिकार करने की अनुमति दी जाती है। इसके लिए भी एक प्रक्रिया अपनाई जाती है। जैसे बाघ, तेंदुआ हाथी आदि जानवर जब इंसानी जिंदगी के लिए खतरा बन जाते हैं तो इन्हें हटाने की अनुमति है, जो जानवर इंसानी इलाकों में लगातार आता है और इंसानों की जान लेता है उसे आदमखोर कहा जा सकता है। स्थानीय अधिकारियों को यह ठोस वजह बतानी होती है कि बाघ इंसानों के लिए पूरी तरह खतरनाक हो चुका है। इसे प्रभावित स्थान से हटाना जरूरी है।

प्रधान मुख्य वन संरक्षक देते है बाघ को हटाने का आदेश
दुधवा टाइगर रिजर्व के फील्ड डायरेक्टर संजय पाठक बताते हैं किसी भी जानवर को मारने का आदेश प्रधान मुख्य वन संरक्षक देते हैं। किसी विशेष जानवर को ‘आदमखोर’ घोषित करने के लिए पर्याप्त वजह होना जरूरी है जैसे जो बाघ या तेंदुआ मानव जीवन के लिए खतरनाक हो जाते हैं। बाघ को जीवित पकड़ कर चिड़ियाघर में भेजने का नियम है। यदि आदमखोर बाघ को बेहोश करना संभव न हो तो उसका शिकार किया जा सकता हैै। बाघ का उन्मूलन एक विभागीय कर्मियों द्वारा किया जाना चाहिए जो वांछित दक्षता रखते हैं।
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