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500 में बिकने वाली खाल इस बार 15-20 रुपये में बिकेगी
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बरेली। एक्सपोर्ट बंद होने से कुर्बानी के जानवर की खाल के दाम इस बार बहुत गिर गए है। लोग यह सोचने पर मजबूर हैं कि खाल को बेचे या फेंके। खाल से मिलने वाले पैसे को लोग मदरसों के छात्रों, मस्जिदों के खर्च या मिस्कीनों और जरूरतमंदों को मदद के तौर देते हैं। इसे लेकर मदरसों के प्रबंधक और मस्जिदों के मुतवल्ली भी फिक्रमंद हैं।
खाल कारोबारियों की माने तो खाल की कीमत घटने की वजह एक्सपोर्ट बंद होना है। देश भर के तमाम शहरों से कुर्बानी की खाल आम तौर कानपुर, कोलकाता, मुंबई और चेन्नई जाया करती थी। वहीं से खालें एक्सपोर्ट होती थीं, जो अब लगभग बंद है। लिहाजा कारोबारी इसे औने पोने में ही बेचेंगे। नुकसान न उठाना पड़े, इसलिए इस बार वह 15 से 20 रुपये में ही खाल उठाने का दाम तय कर चुके हैं। पिछले साल भी खाल के दाम बहुत कम थे। फ्रेश खाल 50 रुपये और कट लगी खाल 40-45 रुपये में बिकी थी। इस बार और भी खराब स्थिति है। आम तौर दो साल पहले तक यही खाल 500 से 550 रुपये तक में बिका करती थे। हालांकि कुछ लोगों का यह भी मानना है कि एक्सपोर्ट बंद होने की वजह अपनी जगह है, मगर इसमें खाल कारोबारियों की मोनोपोली भी लगती है।
खाल भी जमीन में दफन कर दें
आईएमसी मुखिया मौलाना तौकीर रजा खां ने पिछले दिनों एक बयान भी जारी किया था। उन्होंने साफ कहा है कि एक्सपोर्ट बंद होना वजह हो सकती है मगर इसमें खाल करोबारियों की मोनोपोली भी लगती है। इतने कम दाम में खाल बेचने की क्या जरूरत है। इससे बेहतर है कुर्बानी के अलाइज के साथ खाल भी मिट्टी में दफन कर दी जाय। उन्होंने कहा है कि खाल का जो पैसा मदरसों या जहां भी लोग देना चाहते हैं, उसकी जगह अपनी तरफ से पैसे दे दें।
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खाल कारोबारियों की माने तो खाल की कीमत घटने की वजह एक्सपोर्ट बंद होना है। देश भर के तमाम शहरों से कुर्बानी की खाल आम तौर कानपुर, कोलकाता, मुंबई और चेन्नई जाया करती थी। वहीं से खालें एक्सपोर्ट होती थीं, जो अब लगभग बंद है। लिहाजा कारोबारी इसे औने पोने में ही बेचेंगे। नुकसान न उठाना पड़े, इसलिए इस बार वह 15 से 20 रुपये में ही खाल उठाने का दाम तय कर चुके हैं। पिछले साल भी खाल के दाम बहुत कम थे। फ्रेश खाल 50 रुपये और कट लगी खाल 40-45 रुपये में बिकी थी। इस बार और भी खराब स्थिति है। आम तौर दो साल पहले तक यही खाल 500 से 550 रुपये तक में बिका करती थे। हालांकि कुछ लोगों का यह भी मानना है कि एक्सपोर्ट बंद होने की वजह अपनी जगह है, मगर इसमें खाल कारोबारियों की मोनोपोली भी लगती है।
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खाल भी जमीन में दफन कर दें
आईएमसी मुखिया मौलाना तौकीर रजा खां ने पिछले दिनों एक बयान भी जारी किया था। उन्होंने साफ कहा है कि एक्सपोर्ट बंद होना वजह हो सकती है मगर इसमें खाल करोबारियों की मोनोपोली भी लगती है। इतने कम दाम में खाल बेचने की क्या जरूरत है। इससे बेहतर है कुर्बानी के अलाइज के साथ खाल भी मिट्टी में दफन कर दी जाय। उन्होंने कहा है कि खाल का जो पैसा मदरसों या जहां भी लोग देना चाहते हैं, उसकी जगह अपनी तरफ से पैसे दे दें।
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