{"_id":"645aafc51fca5a90160d49f6","slug":"earlier-there-used-to-be-a-battle-of-ideas-now-the-poison-of-hatred-is-being-spread-bareilly-news-c-4-1-149572-2023-05-10","type":"story","status":"publish","title_hn":"Bareilly News: पहले होती थी विचारों की लड़ाई, अब फैलाया जा रहा नफरत का जहर","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Bareilly News: पहले होती थी विचारों की लड़ाई, अब फैलाया जा रहा नफरत का जहर
विज्ञापन
कालिंद्री चतुर्वेदी, कर्मचारी नगर
बरेली। समय के साथ सियासत की तस्वीर बदरंग हुई है। पहले जहां मेलजोल, दुआ-सलाम, प्रत्याशी की विचारधारा और चरित्र पर वोट मिलते थे, अब पैसों से चुनाव का रुख तय हो रहा है। यह कहना है शहर के बुजुर्ग मतदाताओं का। बीते चार दशक में लोकतंत्र के हर उत्सव में भागीदारी निभाने वाले शहर के कुछ मतदाताओं ने अमर उजाला की टीम के साथ अपने अनुभव साझा किए।
उन्होंने कहा कि समय के साथ सियासत का स्याह रंग चटख होता गया। जनता के मुद्दे गुम हो गए हैं। विकास, रोजगार, स्वास्थ्य, शिक्षा आदि बुनियादी जरूरतों पर सिर्फ बातें होती हैं। चुनाव का रुख तो पैसों से ही तय होता है। जातिवाद, क्षेत्रवाद, परिवारवाद भी चरम पर है। उन्होंने शहर के विकास के लिए निष्पक्ष होकर मतदान करने की जरूरत बताई।
-- --
चार दशक पहले हम ईमानदार प्रत्याशी को वोट देते थे। क्षेत्रीय प्रत्याशी को वरीयता देते थे। हम इस बात पर जोर देते थे कि जनप्रतिनिधि ऐसा हो जो वक्त पर हमारी बात सुने और समस्याओं का निस्तारण कराए। मिलनसार व नियमित दुआ-सलाम करने वाले व्यक्ति को भी चुन लिया जाता था। - भगवान दयाल मिश्रा, मढ़ीनाथ
विज्ञापन
आज से 30-40 साल पहले बेरोजगारी, विकास जैसी चीजों को चुनावी मुद्दा नहीं बनाया जाता था। उस वक्त में जिस प्रत्याशी की विचारधारा सही हो, बड़े-छोटे का सम्मान करता हो, जिस तक लोग आसानी से अपनी बात पहुंचा सकें, उसी को चुन लिया जाता था। अब प्रत्याशी निजी मतलब से चुनाव मेें ही जनता के बीच आते हैं। -रानी मिश्रा, मढ़ीनाथ
उस दौर में कम महिलाएं ही वोट डालने जाती थीं। कोई जानने वाला व्यक्ति चुनाव लड़ रहा है और परिजनों ने कहा तो ही वे वोट डालने जाती थीं। तब महिलाओं के खास मुद्दे नहीं हुआ करते थे, लेकिन यह जरूर ध्यान रखा जाता था कि जिसे वोट दे रहे हैं वो जरूरत पड़ने पर हमारे लिए आसानी से उपलब्ध रहे। -कालिंद्री चतुर्वेदी, कर्मचारी नगर
पहले जो लोग किसी पार्टी की विचारधारा को पसंद करते थे, वे उसी को वोट देते थे। बाकी समाज दो वर्गों में बंटा रहता था। कम पढ़े-लिखे लोग जातिवाद को ज्यादा तरजीह देते थे। शिक्षित वर्ग ऐसे व्यक्ति को चुनना पसंद करता था जो समाज में सेवाभाव से काम कर सके। लोगों का आदर करता हो, जिसे लोग पसंद करते हों। - केपी सक्सेना, जगाती मोहल्ला
बैलेट पर हावी होती थी बुलेट
लोगों ने बताया कि पुराने दौर में भी बाहुबल का बोलबाला रहता था। दबंग प्रवृत्ति के लोग बूथ कैप्चरिंग करते थे। बैलेट पर बुलेट हावी हो जाती थी। मतदाताओं की जगह दबंग लोग खुद ही वोट डालते थे। मतपत्रों के जरिये चुनाव होते थे तो स्याही इधर-उधर लगने से मत अवैध हो जाते थे। अब इसमें कमी आई है।
विज्ञापन
उन्होंने कहा कि समय के साथ सियासत का स्याह रंग चटख होता गया। जनता के मुद्दे गुम हो गए हैं। विकास, रोजगार, स्वास्थ्य, शिक्षा आदि बुनियादी जरूरतों पर सिर्फ बातें होती हैं। चुनाव का रुख तो पैसों से ही तय होता है। जातिवाद, क्षेत्रवाद, परिवारवाद भी चरम पर है। उन्होंने शहर के विकास के लिए निष्पक्ष होकर मतदान करने की जरूरत बताई।
विज्ञापन
चार दशक पहले हम ईमानदार प्रत्याशी को वोट देते थे। क्षेत्रीय प्रत्याशी को वरीयता देते थे। हम इस बात पर जोर देते थे कि जनप्रतिनिधि ऐसा हो जो वक्त पर हमारी बात सुने और समस्याओं का निस्तारण कराए। मिलनसार व नियमित दुआ-सलाम करने वाले व्यक्ति को भी चुन लिया जाता था। - भगवान दयाल मिश्रा, मढ़ीनाथ
विज्ञापन
आज से 30-40 साल पहले बेरोजगारी, विकास जैसी चीजों को चुनावी मुद्दा नहीं बनाया जाता था। उस वक्त में जिस प्रत्याशी की विचारधारा सही हो, बड़े-छोटे का सम्मान करता हो, जिस तक लोग आसानी से अपनी बात पहुंचा सकें, उसी को चुन लिया जाता था। अब प्रत्याशी निजी मतलब से चुनाव मेें ही जनता के बीच आते हैं। -रानी मिश्रा, मढ़ीनाथ
उस दौर में कम महिलाएं ही वोट डालने जाती थीं। कोई जानने वाला व्यक्ति चुनाव लड़ रहा है और परिजनों ने कहा तो ही वे वोट डालने जाती थीं। तब महिलाओं के खास मुद्दे नहीं हुआ करते थे, लेकिन यह जरूर ध्यान रखा जाता था कि जिसे वोट दे रहे हैं वो जरूरत पड़ने पर हमारे लिए आसानी से उपलब्ध रहे। -कालिंद्री चतुर्वेदी, कर्मचारी नगर
पहले जो लोग किसी पार्टी की विचारधारा को पसंद करते थे, वे उसी को वोट देते थे। बाकी समाज दो वर्गों में बंटा रहता था। कम पढ़े-लिखे लोग जातिवाद को ज्यादा तरजीह देते थे। शिक्षित वर्ग ऐसे व्यक्ति को चुनना पसंद करता था जो समाज में सेवाभाव से काम कर सके। लोगों का आदर करता हो, जिसे लोग पसंद करते हों। - केपी सक्सेना, जगाती मोहल्ला
बैलेट पर हावी होती थी बुलेट
लोगों ने बताया कि पुराने दौर में भी बाहुबल का बोलबाला रहता था। दबंग प्रवृत्ति के लोग बूथ कैप्चरिंग करते थे। बैलेट पर बुलेट हावी हो जाती थी। मतदाताओं की जगह दबंग लोग खुद ही वोट डालते थे। मतपत्रों के जरिये चुनाव होते थे तो स्याही इधर-उधर लगने से मत अवैध हो जाते थे। अब इसमें कमी आई है।

कालिंद्री चतुर्वेदी, कर्मचारी नगर

कालिंद्री चतुर्वेदी, कर्मचारी नगर

कालिंद्री चतुर्वेदी, कर्मचारी नगर