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तीन साल में 37 लाख में लगाए गए ड्यूल डस्टबिन हो गए कबाड़

Sat, 27 Nov 2021 01:18 AM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Sat, 27 Nov 2021 01:18 AM IST
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duel dustbin damage in three years
अपर जिला अधिकारी निवास के पास कबाड़ हुए ड्यूल डस्टबिन।
बरेली। नगर निगम की राष्ट्रीय स्तर पर स्वच्छता रैंकिंग इस बार गिरी है। इसमें कूड़ा निस्तारण न होना सबसे बड़ी बाधा बनकर सामने आया है। शहर में नगर निगम ने सड़क किनारे जो कूड़ेदान लगाए थे, उनमें से आधे से ज्यादा गायब हो चुके हैं। जो बचे हैं वे गल गए हैं, उनमें कूड़ा ही नहीं डाला जा रहा है। नगर निगम तीन सालों में 37 लाख रुपये के डस्टबिन लगवा चुका है।
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नगर निगम ने शहर में सड़कों के किनारे 960 ड्यूल डस्टबिन (स्टैंड पर एक साथ गीला और सूखा कूड़ा डालने के लिए अलग-अलग लगाए जाने वाले कूड़ेदान) लगवाए हैं। 37 लाख रुपये से लगवाए गए यह डस्टविन इतनी हल्की चादर के थे कि इनमें से नब्बे फीसदी तो एक-डेढ़ साल में ही गल गए और फिर आधे से ज्यादा गायब हो गए। अब लोग कूड़ा सड़क के किनारे फेंक रहे हैं। नगर निगम ने वर्ष 2018 में 12.33 लाख रुपये से 260 ड्यूल डस्टबिन खरीदे थे। यह सभी गल चुके हैं। वर्ष 2020 में 20.70 लाख से 500 सौ और फिर 2021 में 4.61 लाख से दो सौ ड्यूल डस्टबिन खरीदे गए। इनमें से अब बमुश्किल दस फीसदी ही बचे हैं।
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इतनी जल्दी कैसे खराब हो रहे कूड़ेदान
सड़क किनारे लगाए जा रहे ड्यूल डस्टबिन में एक में सूखा कूड़ा डालने के निर्देश हैं और दूसरे में गीला कूड़ा। पहली बात तो यह है कि जानकारी के अभाव में शहर के लोग गीला कूड़ा और सूखा कूड़ा अलग-अलग नहीं डालते हैं। दूसरा यह कूड़ेदानों से नियमित कूड़ा नहीं उठ रहा है। कूड़ेदानों की चादर भी बहुत हल्की होती है, जो कुछ ही दिनों में गलने लगती है।
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स्मार्ट सड़कों पर ही कबाड़ हो रहे कूड़ेदान
शहर में अपर जिलाधिकारी आवास से पहले ही सड़क किनारे ड्यूल डस्टबिन लगा है। यह पूरी तरह गल चुका है। पटेल चौक पर लगे डस्टबिन भी गल चुके हैं। पटेल चौक से चौकी चौराहा जाने वाली सड़क की दोनों लेन पर लगाए गए कूड़ेदान भी गल गए हैं। चौकी चौराहा से कंपनी बाग तक सड़क किनारे रखे गए कूड़ेदान और ड्यूल डस्टबिन पूरी तरह गल चुके हैं।

लोहे के कूड़ेदान होते हैं। खुले में लगाए जाते हैं। धूल, बारिश और कूड़ा पड़ने से उनमें जंग लगती रहती है। इससे गल जाते हैं। उन्हें समय-समय पर बदलवाया भी जाता है। - संजीव प्रधान, पर्यावरण अभियंता
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