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जानवरों की सेवा को बनाया जिंदगी का मकसद
ब्ययूराो, अमर उजाला बरेली।
Updated Tue, 27 Sep 2016 01:31 AM IST
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बरेली के 35 साल के धीरज पाठक सन् 2003 से ही जानवरों का जीवन बचाने में लगे हैं। उन्होंने इस सेवा को ही जिंदगी का मकसद बना लिया है। शहर में कहीं भी घायल जानवर पड़ा हो फोन करिए, धीरज तुरंत वहां हाजिर होते हैं। वे घायल जानवर को अपने शेल्टर होम ले जाते हैं जहां उसका इलाज किया जाता है।
बकौल धीरज बहुत पहले एक चुहिया अचानक जलेबी की चाशनी में गिर गई। संयोग से मां सुधा पाठक भी वहीं पर थीं। बोलीं- मर जाएगी ये, बचाओ इसे कैसे भी। धीरज ने चुहिया को चाशनी से निकाला, उसकी जान बचा ली। यहीं से धीरज जानवरों की जिंदगी बचाने में जुट गए। पिता होटल के व्यवसाय में थे। मां की मौत के बाद धीरज को होटल का कारोबार संभालना था। मगर, किसी घायल जानवर की सूचना मिलते ही ये तुरंत वहां पहुंच जाते। उसे उठाकर लाते और खुद के पैसे से इलाज कराते। धीरे-धीरे यह हुआ कि समय नहीं दे पाने की वजह से होटल का उनका धंधा ठप हो गया। आमदनी के स्रोत बंद हो गए, लेकिन धीरज ने जानवरों की सेवा नहीं छोड़ी।
जानवरों की सेवा के लिए समर्पित धीरज ने शादी न करने का फैसला किया है। उनके शेल्टर होम में 50 से 60 घायल जानवर हर समय मौजूद रहते हैं। तीन साल पहले कार की टक्कर से एक कुत्ते के पैर बेकार हो गए। धीरज ने उसका ऑपरेशन कराया। पैर खराब होने से अब वह चल नहीं पाता। धीरज के चार साथी उसकी प्रतिदिन सेवा करते हैं। हाल ही में सड़क पर कोई पैर कटी भैंस छोड़ गया। अब वह शेल्टर होम में है। कसाइयों से बचाकर लाए गए गाय के सात बछड़े एक साल से शेल्टर होम में हैं। शाहजहांपुर में सड़क हादसे का शिकार हुआ एक बछड़ा तीनों पैर गवां चुका है। अब उसको लेटे-लेटे ही चारा खिलाया जाता है।
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लोगों को बनाया मुरीद
छह भाई बहनों में चौथे नंबर के धीरज की इस दिवानगी पर पहले तो लोग हंसते थे। मगर उनकी लगन देखकर शिक्षक राजकुमार त्रिपाठी, निरुपम शर्मा समेत पशु चिकित्सालयों के डॉक्टर भी जानवरों के इलाज में मदद करने लगे। संस्था ‘पीपुल्स फॉर एनीमल’ भी जानवरों के इलाज के लिए हर महीने 20 हजार रुपये की मदद करती है। छोटे जानवरों को शेल्टर होम तक लाने के लिए समाजसेवी लोगों ने धीरज को स्कूटर दे रखा है। आईवीआरआई के डॉक्टर जानवरों का मुफ्त ऑपरेशन करते हैं।
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कोट-
‘धीरज बड़ी लगन से पशु पक्षियों का इलाज कराते हैं। मैं खुद उनके लाए जानवरों का इलाज मुफ्त में करता हूं। उनके पास पैसे नहीं होते हैं तो मैं खुद दवाएं भी मंगा देता हूं। मैंने अपने अन्य केंद्रों पर भी कह रखा है कि अगर किसी घायल जानवर को इलाज के लिए लाया जाए तो उसका इलाज किया जाए।’
- डॉ. रामलखन (पशु चिकित्साधिकारी)
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बकौल धीरज बहुत पहले एक चुहिया अचानक जलेबी की चाशनी में गिर गई। संयोग से मां सुधा पाठक भी वहीं पर थीं। बोलीं- मर जाएगी ये, बचाओ इसे कैसे भी। धीरज ने चुहिया को चाशनी से निकाला, उसकी जान बचा ली। यहीं से धीरज जानवरों की जिंदगी बचाने में जुट गए। पिता होटल के व्यवसाय में थे। मां की मौत के बाद धीरज को होटल का कारोबार संभालना था। मगर, किसी घायल जानवर की सूचना मिलते ही ये तुरंत वहां पहुंच जाते। उसे उठाकर लाते और खुद के पैसे से इलाज कराते। धीरे-धीरे यह हुआ कि समय नहीं दे पाने की वजह से होटल का उनका धंधा ठप हो गया। आमदनी के स्रोत बंद हो गए, लेकिन धीरज ने जानवरों की सेवा नहीं छोड़ी।
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जानवरों की सेवा के लिए समर्पित धीरज ने शादी न करने का फैसला किया है। उनके शेल्टर होम में 50 से 60 घायल जानवर हर समय मौजूद रहते हैं। तीन साल पहले कार की टक्कर से एक कुत्ते के पैर बेकार हो गए। धीरज ने उसका ऑपरेशन कराया। पैर खराब होने से अब वह चल नहीं पाता। धीरज के चार साथी उसकी प्रतिदिन सेवा करते हैं। हाल ही में सड़क पर कोई पैर कटी भैंस छोड़ गया। अब वह शेल्टर होम में है। कसाइयों से बचाकर लाए गए गाय के सात बछड़े एक साल से शेल्टर होम में हैं। शाहजहांपुर में सड़क हादसे का शिकार हुआ एक बछड़ा तीनों पैर गवां चुका है। अब उसको लेटे-लेटे ही चारा खिलाया जाता है।
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छह भाई बहनों में चौथे नंबर के धीरज की इस दिवानगी पर पहले तो लोग हंसते थे। मगर उनकी लगन देखकर शिक्षक राजकुमार त्रिपाठी, निरुपम शर्मा समेत पशु चिकित्सालयों के डॉक्टर भी जानवरों के इलाज में मदद करने लगे। संस्था ‘पीपुल्स फॉर एनीमल’ भी जानवरों के इलाज के लिए हर महीने 20 हजार रुपये की मदद करती है। छोटे जानवरों को शेल्टर होम तक लाने के लिए समाजसेवी लोगों ने धीरज को स्कूटर दे रखा है। आईवीआरआई के डॉक्टर जानवरों का मुफ्त ऑपरेशन करते हैं।
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कोट-
‘धीरज बड़ी लगन से पशु पक्षियों का इलाज कराते हैं। मैं खुद उनके लाए जानवरों का इलाज मुफ्त में करता हूं। उनके पास पैसे नहीं होते हैं तो मैं खुद दवाएं भी मंगा देता हूं। मैंने अपने अन्य केंद्रों पर भी कह रखा है कि अगर किसी घायल जानवर को इलाज के लिए लाया जाए तो उसका इलाज किया जाए।’
- डॉ. रामलखन (पशु चिकित्साधिकारी)