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15 लाख छिनने की छटपटाहट थी ठिरिया बवाल के पीछे
न्यूज डेस्क,अमर उजाला,बरेली
Updated Fri, 16 Mar 2018 11:40 PM IST
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thiria
ठिरिया नगर पंचायत की राजनीति में स्लॉटर हाउस के अवैध संचालन का अहम रोल था। नगर पंचायत की राजनीति ही इसके इर्द गिर्द घूमती थी। इसकी वजह यहां से हर महीने होने वाली करीब 15 लाख रुपये की अवैध कमाई थी। जब इस खेल पर चोट हुई तो उस पर अपनी राजनीतिक बिसात सजाए बैठे लोग निकलकर मैदान में आ गए। इसी के चलते पुलिस ने चेयरमैन, उनके पति एवं बेटे और पूर्व चेयरमैन के दो बेटों को भी इस मामले में नामजद किया है। मौके पर यह सभी लोग पत्थरबाजों के साथ ही नजर आए थे।
प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (पीसीबी) ठिरिया के इस स्लॉटर हाउस को अगस्त 2015 से बंद कराने की कागजी कवायद कर रहा था। मगर इसका संचालन बंद नहीं हुआ, न ही इसकी अनुपालन रिपोर्ट पीसीबी को भेजी गई। अमर उजाला ने जब इस विषय को उठाया तो कार्रवाई की नौबत आई और बृहस्पतिवार को अवैध स्लॉटर हाउस को ध्वस्त कर दिया गया। स्लॉटर हाउस ध्वस्त करने की कार्रवाई के दौरान उपद्रवियों ने सुनियोजित रूप से वहां हमला किया। जब इसकी पड़ताल की गई तो सामने आया कि इस बवाल के पीछे 15 लाख रुपये महीने की कमाई छिनने की छटपटाहट थी।
मोटी कमाई के आगे फेल हुए बंदी के आदेश
बताया जाता है कि अवैध स्लॉटर हाउस में होने वाले कटान के लिए प्रति जानवर एक हजार रुपये वसूले जाते थे। प्रतिदिन यहां करीब 40 जानवर काटे जाते थे और इस तरह यहां से होने वाली 15 लाख रुपये की कमाई इस बवाल के पीछे अहम वजह थी। इसको लेकर नगर पंचायत पर सवाल उठा रहे हैं क्योंकि बार-बार आदेश होने के बावजूद इसे बंद कराने की कवायद नहीं की गई। स्लॉटर हाउस पर जेसीबी चली तो कमाई और रुतबे दोनों पर चोट पड़ी। यही वजह रही कि लोगों की भीड़ हमलावर हो गई। मौजूदा चेयरमैन तारा बी, उनके पति महफूज ठेकेदार, बेटा तहसीन और पूर्व चेयरमैन के बेटे इमरान एवं इफ्तेखार खां को भी पुलिस ने नामजद किया।
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40-50 जानवर कटते थे हर रात
लोगों की मानें तो अवैध कटान से पहले ठिरिया में ही रात के अंधेरे में एक नखाशा लगता था। इसमें लगभग 40-50 जानवर ही आते थे और रात में ही सभी की खरीद-फरोख्त होने के बाद उन्हें काट दिया जाता था। इसके बाद मांस की सप्लाई हो जाती थी। मगर यहां के मांस को लेकर अभी भी सवाल उठ रहे हैं कि इतने जानवरों का मांस आखिर जाता कहां था क्योंकि इतने जानवरों के मांस की खपत वहां तो संभव नहीं है।
ये ‘इस्लाम’ कौन है!
रात में तीन से पांच बजे के बीच चलने वाले अवैध स्लॉटर हाउस के पीछे उगाही का एक सिस्टम भी काम करता था। बताया जाता है कि कोई ‘इस्लाम’ नाम का व्यक्ति ही यह सिस्टम चलाता था और वहां से वसूली करके हर हिस्सेदार को पहुंचाता था। अधिकारियों को भी यहां होने वाले खूनी खेल की जानकारी थी लेकिन हिस्सेदारी के चलते इस पर कभी आंच नहीं आई।
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प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (पीसीबी) ठिरिया के इस स्लॉटर हाउस को अगस्त 2015 से बंद कराने की कागजी कवायद कर रहा था। मगर इसका संचालन बंद नहीं हुआ, न ही इसकी अनुपालन रिपोर्ट पीसीबी को भेजी गई। अमर उजाला ने जब इस विषय को उठाया तो कार्रवाई की नौबत आई और बृहस्पतिवार को अवैध स्लॉटर हाउस को ध्वस्त कर दिया गया। स्लॉटर हाउस ध्वस्त करने की कार्रवाई के दौरान उपद्रवियों ने सुनियोजित रूप से वहां हमला किया। जब इसकी पड़ताल की गई तो सामने आया कि इस बवाल के पीछे 15 लाख रुपये महीने की कमाई छिनने की छटपटाहट थी।
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मोटी कमाई के आगे फेल हुए बंदी के आदेश
बताया जाता है कि अवैध स्लॉटर हाउस में होने वाले कटान के लिए प्रति जानवर एक हजार रुपये वसूले जाते थे। प्रतिदिन यहां करीब 40 जानवर काटे जाते थे और इस तरह यहां से होने वाली 15 लाख रुपये की कमाई इस बवाल के पीछे अहम वजह थी। इसको लेकर नगर पंचायत पर सवाल उठा रहे हैं क्योंकि बार-बार आदेश होने के बावजूद इसे बंद कराने की कवायद नहीं की गई। स्लॉटर हाउस पर जेसीबी चली तो कमाई और रुतबे दोनों पर चोट पड़ी। यही वजह रही कि लोगों की भीड़ हमलावर हो गई। मौजूदा चेयरमैन तारा बी, उनके पति महफूज ठेकेदार, बेटा तहसीन और पूर्व चेयरमैन के बेटे इमरान एवं इफ्तेखार खां को भी पुलिस ने नामजद किया।
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40-50 जानवर कटते थे हर रात
लोगों की मानें तो अवैध कटान से पहले ठिरिया में ही रात के अंधेरे में एक नखाशा लगता था। इसमें लगभग 40-50 जानवर ही आते थे और रात में ही सभी की खरीद-फरोख्त होने के बाद उन्हें काट दिया जाता था। इसके बाद मांस की सप्लाई हो जाती थी। मगर यहां के मांस को लेकर अभी भी सवाल उठ रहे हैं कि इतने जानवरों का मांस आखिर जाता कहां था क्योंकि इतने जानवरों के मांस की खपत वहां तो संभव नहीं है।
ये ‘इस्लाम’ कौन है!
रात में तीन से पांच बजे के बीच चलने वाले अवैध स्लॉटर हाउस के पीछे उगाही का एक सिस्टम भी काम करता था। बताया जाता है कि कोई ‘इस्लाम’ नाम का व्यक्ति ही यह सिस्टम चलाता था और वहां से वसूली करके हर हिस्सेदार को पहुंचाता था। अधिकारियों को भी यहां होने वाले खूनी खेल की जानकारी थी लेकिन हिस्सेदारी के चलते इस पर कभी आंच नहीं आई।