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सिर चढ़कर बोला गुनाह.. अपने ही जाल में फंस गए दरिंदे
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पुलिस की छानबीन शुरू होने के बाद जिस शख्स से की मदद की गुहार, उसी की गवाही के आधार पर अदालत ने सुनाई मौत की सजा
मेडिकल परीक्षण के दौरान भी किया था जुर्म का इकबाल, डॉक्टर ने भी दी गवाही
घटना का न चश्मदीद गवाह न ठोस सबूत, चुपचाप बैठे रहते तो शायद बच जाते
बरेली। कहते हैं कि गुनाह का भले ही कोई सबूत न हो लेकिन वह खुद सिर चढ़कर बोलता है, नवाबगंज के गांव में 12 साल की बच्ची के साथ वहशियाना दरिंदगी करने वाले मुरारीलाल और उमाकांत के साथ भी ऐसा ही हुआ। उनके गुनाह का कोई चश्मदीद गवाह नहीं था न सबूत ही बहुत ज्यादा पुख्ता थे लेकिन पुलिस की छानबीन शुरू होने के साथ जैसे-जैसे उन्होंने अपने बचाव की कोशिश की, वैसे-वैसे फंसते गए। दो ऐसे लोगों ने उनके खिलाफ अदालत में गवाही दी जिनके सामने उन्होंने अपना गुनाह कबूल करते हुए बचाने की गुहार की थी।
अदालत ने शुक्रवार को मुरारीलाल और उमाकांत को मौत की सजा सुनाते वक्त एक्स्ट्रा ज्यूडिशियल कन्फेशन को ही आधार बनाया। एक्स्ट्रा ज्यूडिशियल कन्फेशन का मतलब है कि किसी ऐसे शख्स के सामने अपने जुर्म का इकबाल करना जिसे कानूनन गवाही सुनने का अधिकार नहीं होता। दरअसल पुलिस ने बच्ची की लाश मिलने के बाद जब विवेचना शुरू की तो घटना का कोई चश्मदीद गवाह न मिलने की वजह से उलझ गई। घटनास्थल पर मिले सबूत भी ऐसे नहीं थे जो कोई साफ इशारा करते हों। पुलिस को दरिंदों के बारे में पहला क्लू तब मिला जब घटना के अगले ही दिन 30 जनवरी को मुरारीलाल और उमाकांत गांव के ही रामचंद्र के पास पहुंचे और उन्हें अपना गुनाह बताने के बाद पुलिस में उनकी जान-पहचान का वास्ता देते हुए बचाने की गुहार की। यह भी कहा कि कुछ खर्च करने की जरूरत पड़ी तो वह खर्च भी कर देंगे।
रामचंद्र ने मुरारीलाल को फिर आने की बात कहकर उस वक्त टाल दिया लेकिन उनकी दरिंदगी की वजह से उनकी मदद न करने का भी फैसला कर लिया। उसी दिन उन्हें रास्ते में नवाबगंज के तत्कालीन इंस्पेक्टर आरके सिंह मिले तो उन्होंने उन्हें यह बात बता दी। पुलिस ने यह सुराग मिलते ही मुरारीलाल और उमाकांत को गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद दोनों अभियुक्तों ने मेडिकल परीक्षण के दौरान मदद की उम्मीद में एक बार फिर यही बात डॉ. जगवीर सिंह वर्मा को भी बताई। डॉ. वर्मा के मुताबिक मुरारीलाल ने उन्हें बताया कि वह और उमाशंकर बुखारपुरा से दारू लाए थे। अपने घर में दारू पीने के बाद वे टहलने निकले। रास्ते में बच्ची को सरसों के खेत में घास काटते देखा तो उमाकांत के अंदर का दरिंदा जाग गया। पहले मुरारीलाल और फिर उमाकांत ने बच्ची से दुष्कर्म करके उसकी हत्या कर दी। पुलिस ने अभियुक्तों के गांव के रामचंद्र और डॉ. जगवीर सिंह वर्मा को भी गवाह बनाया था। एक्स्ट्रा ज्यूडिशियल कन्फेशन के तहत अदालत ने इन दोनों की गवाही को मान्यता देते हुए मुरारीलाल और उमाकांत को शुक्रवार को मौत की सजा सुनाई।
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बच्ची ने पहचान लिया इसलिए मार डाला
मुरारीलाल और उमाकांत ने दुष्कर्म के बाद पोल खुलने के डर से बच्ची की हत्या की। मुरारीलाल ने पुलिस को दिए बयान में भी यह बात कही जिसका उल्लेख अदालत ने अपने फैसले में किया। मुरारीलाल ने कहा कि उमाकांत ने बच्ची को जबरन सरसों के खेत में खींच लिया था। दुष्कर्म के बाद रोती-कराहती बच्ची ने मुरारीलाल को अपने घरवालों से शिकायत करने की धमकी दी तो दोनों डर गए। इसके बाद दोनों ने गला दबाकर उसकी हत्या कर दी।
पॉक्सो कोर्ट: तीन महीने में 600 गवाही
बच्चों के साथ बढ़ते यौन अपराधों पर त्वरित कार्रवाई के लिए वर्ष 2012 में पॉक्सो एक्ट बनाने के साथ सुनवाई के लिए विशेष अदालतें भी बनाई गईं। पॉक्सो कोर्ट के सरकारी वकील रीतराम राजपूत ने बताया कि इन अदालतों में मुकदमों की त्वरित सुनवाई होती है। पिछले तीन महीने में पॉक्सो कोर्ट में छह सौ गवाहों के बयान लिखे गए। इसके अलावा अक्तूबर में 54, नवंबर में 48 और दिसंबर में 21 जमानत अर्जी खारिज की गईं।
फैसला सुनने अदालत पहुंचे तमाम लोग
अदालत के फैसले का वकीलों के साथ ही आम लोगों को भी इंतजार था। शुक्रवार को पॉक्सो कोर्ट के बाहर फैसला सुनने के लिए तमाम लोगों भीड़ इकट्ठी थी। तमाम वकील भी मौजूद थे। दोपहर करीब साढ़े 12 बजे अभियुक्तों को जेल से अदालत में लाया गया। ठीक एक बजकर सात मिनट पर न्यायाधीश अदालत में पहुंचे। उन्होंने मुकदमे के तथ्यों और अपने फैसले में सजा का आधार बताते हुए दोनों अभियुक्तों की मौत की सजा का एलान किया। इस पूरे घटनाक्रम में सिर्फ तीन मिनट लगे।
पहले भी दो बार हो चुकी है फांसी
शहर के इतिहास में फांसी की सजा का आदेश तीसरी बार हुआ है। पहली बार पांच अगस्त 2003 को बहेड़ी में सरे बाजार चार लोगों की हत्या के मामले में फांसी की सजा सुनाई गई थी। इसमें तत्कालीन एडीजे आदित्य प्रकाश शर्मा ने बाप-बेटे समेत चार लोगों को फांसी की सजा का आदेश सुनाया था। दूसरा मामला थाना सुभाषनगर क्षेत्र में हुई हत्या का था। यह आदेश एक फरवरी 2010 को हुआ था। इस मामले में तत्कालीन एडीजे ओपी दीक्षित ने दो लोगों को फांसी की सजा सुनाई थी।
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मेडिकल परीक्षण के दौरान भी किया था जुर्म का इकबाल, डॉक्टर ने भी दी गवाही
घटना का न चश्मदीद गवाह न ठोस सबूत, चुपचाप बैठे रहते तो शायद बच जाते
बरेली। कहते हैं कि गुनाह का भले ही कोई सबूत न हो लेकिन वह खुद सिर चढ़कर बोलता है, नवाबगंज के गांव में 12 साल की बच्ची के साथ वहशियाना दरिंदगी करने वाले मुरारीलाल और उमाकांत के साथ भी ऐसा ही हुआ। उनके गुनाह का कोई चश्मदीद गवाह नहीं था न सबूत ही बहुत ज्यादा पुख्ता थे लेकिन पुलिस की छानबीन शुरू होने के साथ जैसे-जैसे उन्होंने अपने बचाव की कोशिश की, वैसे-वैसे फंसते गए। दो ऐसे लोगों ने उनके खिलाफ अदालत में गवाही दी जिनके सामने उन्होंने अपना गुनाह कबूल करते हुए बचाने की गुहार की थी।
अदालत ने शुक्रवार को मुरारीलाल और उमाकांत को मौत की सजा सुनाते वक्त एक्स्ट्रा ज्यूडिशियल कन्फेशन को ही आधार बनाया। एक्स्ट्रा ज्यूडिशियल कन्फेशन का मतलब है कि किसी ऐसे शख्स के सामने अपने जुर्म का इकबाल करना जिसे कानूनन गवाही सुनने का अधिकार नहीं होता। दरअसल पुलिस ने बच्ची की लाश मिलने के बाद जब विवेचना शुरू की तो घटना का कोई चश्मदीद गवाह न मिलने की वजह से उलझ गई। घटनास्थल पर मिले सबूत भी ऐसे नहीं थे जो कोई साफ इशारा करते हों। पुलिस को दरिंदों के बारे में पहला क्लू तब मिला जब घटना के अगले ही दिन 30 जनवरी को मुरारीलाल और उमाकांत गांव के ही रामचंद्र के पास पहुंचे और उन्हें अपना गुनाह बताने के बाद पुलिस में उनकी जान-पहचान का वास्ता देते हुए बचाने की गुहार की। यह भी कहा कि कुछ खर्च करने की जरूरत पड़ी तो वह खर्च भी कर देंगे।
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रामचंद्र ने मुरारीलाल को फिर आने की बात कहकर उस वक्त टाल दिया लेकिन उनकी दरिंदगी की वजह से उनकी मदद न करने का भी फैसला कर लिया। उसी दिन उन्हें रास्ते में नवाबगंज के तत्कालीन इंस्पेक्टर आरके सिंह मिले तो उन्होंने उन्हें यह बात बता दी। पुलिस ने यह सुराग मिलते ही मुरारीलाल और उमाकांत को गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद दोनों अभियुक्तों ने मेडिकल परीक्षण के दौरान मदद की उम्मीद में एक बार फिर यही बात डॉ. जगवीर सिंह वर्मा को भी बताई। डॉ. वर्मा के मुताबिक मुरारीलाल ने उन्हें बताया कि वह और उमाशंकर बुखारपुरा से दारू लाए थे। अपने घर में दारू पीने के बाद वे टहलने निकले। रास्ते में बच्ची को सरसों के खेत में घास काटते देखा तो उमाकांत के अंदर का दरिंदा जाग गया। पहले मुरारीलाल और फिर उमाकांत ने बच्ची से दुष्कर्म करके उसकी हत्या कर दी। पुलिस ने अभियुक्तों के गांव के रामचंद्र और डॉ. जगवीर सिंह वर्मा को भी गवाह बनाया था। एक्स्ट्रा ज्यूडिशियल कन्फेशन के तहत अदालत ने इन दोनों की गवाही को मान्यता देते हुए मुरारीलाल और उमाकांत को शुक्रवार को मौत की सजा सुनाई।
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बच्ची ने पहचान लिया इसलिए मार डाला
मुरारीलाल और उमाकांत ने दुष्कर्म के बाद पोल खुलने के डर से बच्ची की हत्या की। मुरारीलाल ने पुलिस को दिए बयान में भी यह बात कही जिसका उल्लेख अदालत ने अपने फैसले में किया। मुरारीलाल ने कहा कि उमाकांत ने बच्ची को जबरन सरसों के खेत में खींच लिया था। दुष्कर्म के बाद रोती-कराहती बच्ची ने मुरारीलाल को अपने घरवालों से शिकायत करने की धमकी दी तो दोनों डर गए। इसके बाद दोनों ने गला दबाकर उसकी हत्या कर दी।
पॉक्सो कोर्ट: तीन महीने में 600 गवाही
बच्चों के साथ बढ़ते यौन अपराधों पर त्वरित कार्रवाई के लिए वर्ष 2012 में पॉक्सो एक्ट बनाने के साथ सुनवाई के लिए विशेष अदालतें भी बनाई गईं। पॉक्सो कोर्ट के सरकारी वकील रीतराम राजपूत ने बताया कि इन अदालतों में मुकदमों की त्वरित सुनवाई होती है। पिछले तीन महीने में पॉक्सो कोर्ट में छह सौ गवाहों के बयान लिखे गए। इसके अलावा अक्तूबर में 54, नवंबर में 48 और दिसंबर में 21 जमानत अर्जी खारिज की गईं।
फैसला सुनने अदालत पहुंचे तमाम लोग
अदालत के फैसले का वकीलों के साथ ही आम लोगों को भी इंतजार था। शुक्रवार को पॉक्सो कोर्ट के बाहर फैसला सुनने के लिए तमाम लोगों भीड़ इकट्ठी थी। तमाम वकील भी मौजूद थे। दोपहर करीब साढ़े 12 बजे अभियुक्तों को जेल से अदालत में लाया गया। ठीक एक बजकर सात मिनट पर न्यायाधीश अदालत में पहुंचे। उन्होंने मुकदमे के तथ्यों और अपने फैसले में सजा का आधार बताते हुए दोनों अभियुक्तों की मौत की सजा का एलान किया। इस पूरे घटनाक्रम में सिर्फ तीन मिनट लगे।
पहले भी दो बार हो चुकी है फांसी
शहर के इतिहास में फांसी की सजा का आदेश तीसरी बार हुआ है। पहली बार पांच अगस्त 2003 को बहेड़ी में सरे बाजार चार लोगों की हत्या के मामले में फांसी की सजा सुनाई गई थी। इसमें तत्कालीन एडीजे आदित्य प्रकाश शर्मा ने बाप-बेटे समेत चार लोगों को फांसी की सजा का आदेश सुनाया था। दूसरा मामला थाना सुभाषनगर क्षेत्र में हुई हत्या का था। यह आदेश एक फरवरी 2010 को हुआ था। इस मामले में तत्कालीन एडीजे ओपी दीक्षित ने दो लोगों को फांसी की सजा सुनाई थी।