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बांसमंडी में भी घायल मिला दुर्लभ बर्न प्रजाति का उल्लू
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बरेली। जिला अस्पताल में घायल मिले दुर्लभ बर्न प्रजाति के उल्लू का इलाज करने में टालमटोल कर रहे वन कर्मियों को डीएफओ ने जमकर फटकार लगाई। इसके बाद आनन-फानन में टीम जिला अस्पताल पहुुंची और मरहम पट्टी करने के बाद उल्लू को छोड़ दिया। इधर, शनिवार को बांसमंडी में भी बर्न प्रजाति का ही एक उल्लू घायल मिला। यह उड़ नहीं पा रहा था। बांसमंडी के दुकानदारों ने उल्लू मिलने की सूचना वन विभाग को दी। देर शाम वनकर्मियों ने उसे नीलकंठ नर्सरी ले गए। वहां उसका इलाज किया जा रहा है।
डीएफओ भरतलाल ने बताया कि जिला अस्पताल और बांसमंडी में मिला उल्लू आमतौर पर इस क्षेत्र में नहीं दिखता है। यह हिमालय के अर्द्ध पहाड़ी क्षेत्र धार के जंगलों में मिलता है जो दुर्लभ प्रजाति का बर्न आउल है। घने जंगलों में अपना आशियाना बना कर रहने वाले इस उल्लू की प्रजाति देश में विलुप्त होने के कगार पर है। वहीं, इसके शिकार करने का ढंग भी दूसरे पक्षियों से अलग है। श्रवण शक्ति तेज रखने वाला ये उल्लू हलकी सी आवाज आने पर भी अपने शिकार को दबोच लेता है। चूहे, मछली और मेंढक इसका मुख्य रूप से भोजन हैं। इस उल्लू को वन विभाग लगभग खत्म मान चुका है। डीएफओ ने कहा कि इस दुर्लभ प्रजाति के उल्लू मिलने से यह स्पष्ट है कि इस प्रजाति के उल्लू अभी मौजूद हैं, लेकिन ये किन वजहों से हिमालयी क्षेत्र से मैदान की ओर आए हैं, इस पर अभी कुछ नहीं कहा जा सकता है।
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डीएफओ भरतलाल ने बताया कि जिला अस्पताल और बांसमंडी में मिला उल्लू आमतौर पर इस क्षेत्र में नहीं दिखता है। यह हिमालय के अर्द्ध पहाड़ी क्षेत्र धार के जंगलों में मिलता है जो दुर्लभ प्रजाति का बर्न आउल है। घने जंगलों में अपना आशियाना बना कर रहने वाले इस उल्लू की प्रजाति देश में विलुप्त होने के कगार पर है। वहीं, इसके शिकार करने का ढंग भी दूसरे पक्षियों से अलग है। श्रवण शक्ति तेज रखने वाला ये उल्लू हलकी सी आवाज आने पर भी अपने शिकार को दबोच लेता है। चूहे, मछली और मेंढक इसका मुख्य रूप से भोजन हैं। इस उल्लू को वन विभाग लगभग खत्म मान चुका है। डीएफओ ने कहा कि इस दुर्लभ प्रजाति के उल्लू मिलने से यह स्पष्ट है कि इस प्रजाति के उल्लू अभी मौजूद हैं, लेकिन ये किन वजहों से हिमालयी क्षेत्र से मैदान की ओर आए हैं, इस पर अभी कुछ नहीं कहा जा सकता है।
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