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Bareilly News: घरों में नहीं थम रहे प्रसव... किलकारियों पर मंडरा रहा खतरा
Fri, 11 Aug 2023 02:27 AM IST
बरेली ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बरेली
संवाद न्यूज एजेंसी, बरेली
Updated Fri, 11 Aug 2023 02:27 AM IST
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बरेली। गर्भवती महिलाओं की सेहत, सुरक्षित प्रसव और नवजात का जीवन सुरक्षित रखने के लिए चल रही कई योजनाओं के बावजूद घरों पर जोखिमपूर्ण ढंग से प्रसव के मामले कम नहीं हो रहे हैं। इसकी पुष्टि नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-5 के आंकड़े कर रहे हैं। हाल ही में करीब दर्जन भर ऐसे केस सरकारी अस्पतालों में पहुंचे हैं, जहां घर पर प्रसव की कोशिश में गर्भवतियों की जान सांसत में पड़ी।
महिला अस्पताल की सीएमएस डॉ. पुष्पलता के मुताबिक, लोग अक्सर गंभीर हालत में गर्भवती को लेकर पहुंचते हैं। कई गर्भवतियों का नियमित टीकाकरण और स्वास्थ्य जांच न होने से वे बेहद कमजोर और एनीमिक हो जाती हैं। कुछ गर्भवती हेपेटाइटिस से भी ग्रसित मिलती हैं। महिला अस्पताल में वेंटिलेटर की सुविधा न होने से गंभीर गर्भवतियों की डिलीवरी करने से महिला चिकित्सक भी घबराती हैं। लिहाजा हायर सेंटर रेफर करना ही विकल्प होता है। कई बार डॉक्टरों के हाथ खड़े करने पर गर्भवती को लेकर परिजन निजी अस्पतालों का चक्कर काटते हैं।
एनएफएचएस-5 के आंकड़ों पर गौर करें तो जिले में सलाना करीब 60 हजार प्रसव होते हैं। इसमें से चार फीसदी यानी करीब ढाई हजार गर्भवती के प्रसव की कोशिश घरों पर होती है। जिन मामलों में केस बिगड़ते हैं, तब परिजन 102 एंबुलेंस को कॉल करते हैं। प्रसव पीड़ा बढ़ने से हालत गंभीर होने की स्थिति में एंबुलेंस के ईएमटी और परिचालक समेत मौजूद आशा कार्यकर्ता की सूझबूझ से रास्ते में ही प्रसव होते हैं।
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एंबुलेंस में प्रतिमाह हो रहे करीब पांच प्रसव
रीजनल मैनेजर मनोज कुमार शर्मा के मुताबिक गर्भवतियों की हालत गंभीर होने पर कॉल होने पर कई बार रास्ते में ही ईएमटी को प्रसव कराना पड़ता है। प्रसव के बाद जच्चा, बच्चा को स्वास्थ्य केंद्र पर भर्ती कराते हैं। बरेली में प्रतिमाह करीब पांच से छह प्रसव एंबुलेंस में हो रहे हैं। वहीं, बदायूं, पीलीभीत, शाहजहांपुर में भी लगभग यही स्थिति है।
कई परिवार नहीं देते सूचना, जागरूकता जरूरी
सीएमओ डॉ. बलवीर सिंह के मुताबिक मातृत्व स्वास्थ्य को सुदृढ़ बनाने के लिए सरकार, स्वास्थ्य विभाग का पूरा जोर है। प्रत्येक जरूरी बिंदुओं का ख्याल रखते हुए जच्चा-बच्चा को सुरक्षित बनाने की हरसंभव कोशिश हो रही है। सभी ग्राम पंचायत स्तर पर आशा सक्रिय हैं। उनसे संपर्क कर स्थानीय लोग योजनाओं का लाभ ले सकते हैं। कुछ मामलों में परिजन सूचना नहीं देते हैं। उन्हें जागरूक किया जा रहा है।
एनएफएचएस-5 रिपोर्ट एक नजर में
- 77.8 फीसदी प्रसव विशेषज्ञ की निगरानी में
- 75 फीसदी प्रसव निजी अस्पतालों में हो रहे
- 40.3 फीसदी प्रसव सरकारी अस्पतालों में
- 37.9 फीसदी सिजेरियन निजी अस्पताल में
- 15.5 फीसदी सिजेरियन सरकारी अस्तपाल में
- 5.7 फीसदी प्रसव फर्स्ट रेफरल यूनिटों पर
- 21 फीसदी प्रसव घरों पर विशेषज्ञ निगरानी में
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महिला अस्पताल की सीएमएस डॉ. पुष्पलता के मुताबिक, लोग अक्सर गंभीर हालत में गर्भवती को लेकर पहुंचते हैं। कई गर्भवतियों का नियमित टीकाकरण और स्वास्थ्य जांच न होने से वे बेहद कमजोर और एनीमिक हो जाती हैं। कुछ गर्भवती हेपेटाइटिस से भी ग्रसित मिलती हैं। महिला अस्पताल में वेंटिलेटर की सुविधा न होने से गंभीर गर्भवतियों की डिलीवरी करने से महिला चिकित्सक भी घबराती हैं। लिहाजा हायर सेंटर रेफर करना ही विकल्प होता है। कई बार डॉक्टरों के हाथ खड़े करने पर गर्भवती को लेकर परिजन निजी अस्पतालों का चक्कर काटते हैं।
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एनएफएचएस-5 के आंकड़ों पर गौर करें तो जिले में सलाना करीब 60 हजार प्रसव होते हैं। इसमें से चार फीसदी यानी करीब ढाई हजार गर्भवती के प्रसव की कोशिश घरों पर होती है। जिन मामलों में केस बिगड़ते हैं, तब परिजन 102 एंबुलेंस को कॉल करते हैं। प्रसव पीड़ा बढ़ने से हालत गंभीर होने की स्थिति में एंबुलेंस के ईएमटी और परिचालक समेत मौजूद आशा कार्यकर्ता की सूझबूझ से रास्ते में ही प्रसव होते हैं।
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एंबुलेंस में प्रतिमाह हो रहे करीब पांच प्रसव
रीजनल मैनेजर मनोज कुमार शर्मा के मुताबिक गर्भवतियों की हालत गंभीर होने पर कॉल होने पर कई बार रास्ते में ही ईएमटी को प्रसव कराना पड़ता है। प्रसव के बाद जच्चा, बच्चा को स्वास्थ्य केंद्र पर भर्ती कराते हैं। बरेली में प्रतिमाह करीब पांच से छह प्रसव एंबुलेंस में हो रहे हैं। वहीं, बदायूं, पीलीभीत, शाहजहांपुर में भी लगभग यही स्थिति है।
कई परिवार नहीं देते सूचना, जागरूकता जरूरी
सीएमओ डॉ. बलवीर सिंह के मुताबिक मातृत्व स्वास्थ्य को सुदृढ़ बनाने के लिए सरकार, स्वास्थ्य विभाग का पूरा जोर है। प्रत्येक जरूरी बिंदुओं का ख्याल रखते हुए जच्चा-बच्चा को सुरक्षित बनाने की हरसंभव कोशिश हो रही है। सभी ग्राम पंचायत स्तर पर आशा सक्रिय हैं। उनसे संपर्क कर स्थानीय लोग योजनाओं का लाभ ले सकते हैं। कुछ मामलों में परिजन सूचना नहीं देते हैं। उन्हें जागरूक किया जा रहा है।
एनएफएचएस-5 रिपोर्ट एक नजर में
- 77.8 फीसदी प्रसव विशेषज्ञ की निगरानी में
- 75 फीसदी प्रसव निजी अस्पतालों में हो रहे
- 40.3 फीसदी प्रसव सरकारी अस्पतालों में
- 37.9 फीसदी सिजेरियन निजी अस्पताल में
- 15.5 फीसदी सिजेरियन सरकारी अस्तपाल में
- 5.7 फीसदी प्रसव फर्स्ट रेफरल यूनिटों पर
- 21 फीसदी प्रसव घरों पर विशेषज्ञ निगरानी में