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Bareilly News: मुर्गे नहीं होंगे बीमार, इम्युनिटी बढ़ाएगा कलौंजी का अर्क
Fri, 01 Mar 2024 01:41 AM IST
बरेली ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बरेली
संवाद न्यूज एजेंसी, बरेली
Updated Fri, 01 Mar 2024 01:41 AM IST
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बरेली। जिले में पोल्ट्री फॉर्म का रोज करोड़ों का कारोबार होता है। रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने की वजह से मुर्गे-मुर्गियां बार-बार बीमार पड़ जाती हैं। इससे फार्म संचालकों को नुकसान उठाना पड़ता है। बरेली कॉलेज के जंतु विज्ञान के शोधार्थी ने इसका हल ढूंढ निकाला है। उन्होंने पाया कि कलौंजी का मेथनॉलिक अर्क मुर्गे की रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्युनिटी) बढ़ाने में कारगर है। इससे मुर्गे कम बीमार होंगे और फार्म संचालकों को इसका सीधा लाभ होगा।
योगेंद्र ने बताया कि कलौंजी के बीज और तेल का आयुर्वेद और यूनानी चिकित्सा पद्धति में व्यापक इस्तेमाल किया जाता रहा है। कलौंजी (निगेला सैटिवा) को आमतौर पर काला जीरा के रूप में जाना जाता है। यह रेनुनकुलेसी परिवार से संबंधित है। शोधार्थी ने अध्ययन के लिए इन विट्रो प्रणाली स्थापित की। इसमें मुर्गे के पीबीएमसी (पैरीफेरल ब्लड मोनोन्यूक्लियर सेल्स) पर कलौंजी के मेथनॉलिक अर्क की जांच की। इसमें अर्क ने प्रतिरक्षा प्रदान करने वाले एंटीवायरल जीन (आईएल-1बीटा, आईएल-10 और आईएल-12) को बढ़ाने का काम किया। उन्होंने पाया कि अर्क को मुर्गे में किसी भी वैक्सीन या एंटीजन के साथ सहायक के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।
योगेंद्र ने यह शोध बरेली कॉलेज के जंतु विज्ञान विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर बीनम सक्सेना व आईवीआरआई (भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान) के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. आर सरवानन के निर्देशन में पांच वर्ष में पूरा किया है।
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शोधार्थी ने गहन अध्ययन के बाद यह निष्कर्ष निकाला है। शोध मुर्गों की कोशिकाओं पर हुआ है। कलौंजी का अर्क प्रतिरक्षा प्रदान करने वाले जीन्स में वृद्धि करता है। इसका इस्तेमाल बीमारियों को दूर रखने में किया जा सकता है। - डॉ. बीनम सक्सेना, एसोसिएट प्रोफेसर, जंतु विज्ञान विभाग, बरेली कॉलेज
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योगेंद्र ने बताया कि कलौंजी के बीज और तेल का आयुर्वेद और यूनानी चिकित्सा पद्धति में व्यापक इस्तेमाल किया जाता रहा है। कलौंजी (निगेला सैटिवा) को आमतौर पर काला जीरा के रूप में जाना जाता है। यह रेनुनकुलेसी परिवार से संबंधित है। शोधार्थी ने अध्ययन के लिए इन विट्रो प्रणाली स्थापित की। इसमें मुर्गे के पीबीएमसी (पैरीफेरल ब्लड मोनोन्यूक्लियर सेल्स) पर कलौंजी के मेथनॉलिक अर्क की जांच की। इसमें अर्क ने प्रतिरक्षा प्रदान करने वाले एंटीवायरल जीन (आईएल-1बीटा, आईएल-10 और आईएल-12) को बढ़ाने का काम किया। उन्होंने पाया कि अर्क को मुर्गे में किसी भी वैक्सीन या एंटीजन के साथ सहायक के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।
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योगेंद्र ने यह शोध बरेली कॉलेज के जंतु विज्ञान विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर बीनम सक्सेना व आईवीआरआई (भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान) के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. आर सरवानन के निर्देशन में पांच वर्ष में पूरा किया है।
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शोधार्थी ने गहन अध्ययन के बाद यह निष्कर्ष निकाला है। शोध मुर्गों की कोशिकाओं पर हुआ है। कलौंजी का अर्क प्रतिरक्षा प्रदान करने वाले जीन्स में वृद्धि करता है। इसका इस्तेमाल बीमारियों को दूर रखने में किया जा सकता है। - डॉ. बीनम सक्सेना, एसोसिएट प्रोफेसर, जंतु विज्ञान विभाग, बरेली कॉलेज