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Bareilly News: नहाय खाय के साथ छठ पूजा कल से
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बरेली। सूर्य उपासना के महापर्व छठ की शुरुआत पांच नवंबर को नहाय-खाय से होगी। भगवान सूर्य और छठी मैया को समर्पित महापर्व छठ हर वर्ष कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी को मनाया जाता है। इस बार यह पूजा पांच नवंबर से शुरू होगी, जो आठ नवंबर को अर्घ्य देने के साथ समाप्त होगी।
इस दौरान महिलाएं बच्चों के स्वास्थ्य, सफलता और दीर्घायु के लिए 36 घंटे उपवास करती हैं। उत्सव के अवसर पर शहर में तमाम जगहों पर दिनभर महिलाएं तैयारियों में जुटी रहीं। छठ पूजा के लिए कैंट स्थित धोपेश्वर नाथ मंदिर के सरोवर में विशेष तैयारियां चल रही हैं। छठ पूजा के लिए रोशनी और साफ-सफाई कराई जा रही है। इज्जतनगर स्थित शिव पार्वती मंदिर में भी साफ-सफाई की जा रही है। इसके साथ रंगाई-पुताई का कार्य भी जारी है। मंदिर को सुंदर और रंग बिरंगी रोशनियों से सजाने का काम भी चल रहा है। रुहेलखंड विश्वविद्यालय में भी छठ पूजा की तैयारियां जोरों पर हैं। तालाब की साफ-सफाई का कार्य चल रहा है और मंदिर की मनमोहक फूलों और झालरों से सजावट की जा रही है।
इस अवसर पर शहर में लोगों की ओर से घरों में विधि विधान पूर्वक पूजा अर्चना की जाती है। कॉलोनी में एक घर में ही छठ पूजा का आयोजन किया जाता है, जिसमें आस पास के लोग एकत्रित होते हैं और सूर्य भगवान को अर्घ्य देते हैं। लोग घरों में टब में जल रखकर पूजा करते हैं। वह इसे आम की पत्तियों, फूलों और रंग बिरंगी लाइटों से सजाते हैं और विधि विधान के साथ पूजा करते हैं।
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छठ पूजा का मुहूर्त
ज्योतिषाचार्य कृष्ण के. शर्मा के अनुसार हर साल छठ पूजा दिवाली से छह दिन बाद की जाती है, इस वर्ष कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि सात नवंबर की देर रात 12 बजकर 41 मिनट पर शुरू होगी और इसका समापन आठ नवंबर की देर रात 12 बजकर 34 मिनट पर होगा। ऐसे में सात नवंबर, बृहस्पतिवार के दिन ही संध्याकाल का अर्घ्य दिया जाएगा और सुबह का अर्घ्य अगले दिन आठ नवंबर को दिया जाएगा।
नहाय-खाय तिथि : नहाय-खाय मंगलवार को होगा। इस दिन श्रद्धालुओं की ओर से साफ सफाई कर नदी में स्नान के बाद नए वस्त्र धारण कर शाकाहारी भोजन ग्रहण किया जाएगा। इस दिन व्रती के भोजन ग्रहण करने के बाद ही घर के बाकी सदस्य भोजन ग्रहण करते हैं।
खरना तिथि : खरना छठ पूजा का दूसरा दिन होता है। खरना के दिन व्रती एक समय मीठा भोजन करते हैं। इस दिन गुड़ से बनी चावल की खीर खाई जाती है। इसके उपरांत 36 घंटे का निर्जला व्रत भी प्रारंभ हो जाता है।
तीसरा दिन छठ पूजा का विशेष दिन होता है, इस दिन डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है और सूरज की विधिवत पूजा की जाती है। रात में छठी मैया के मंगल गीतों का गायन किया जाता है और इस व्रत की कथा सुनी जाती है। अर्घ्य के लिए ठेकुआ, चावल के लड्डू जैसी कई मिठाइयां बनाई जाती है। मिठाइयों और फलों को रखकर टोकरी या सूप में सजाया जाता है।
चौथा दिन छठ पूजा का आखिरी दिन होता है, इस दिन व्रती महिलाएं सूर्योदय से पहले नदी-तालाबों के घाटों पर पहुंचतीं हैं और उगते हुए सूर्य को कच्चे दूध में गंगा जल मिलाकर अर्घ्य देती हैं। इस दिन व्रत का पारण होता है, इसके साथ ही छठ पूजा का समापन होता है।
इसलिए होती है छठ पूजा
छठ पूजा का वर्णन ब्रह्मवैवर्त पुराण में मिलता है। कथा के अनुसार जब राजा मनु के पुत्र प्रियव्रत को कोई संतान नहीं हुई तो महर्षि कश्यप के कहने पर उन्होंने महायज्ञ किया। परिणामस्वरूप रानी गर्भवती हुई। मगर दुर्भाग्यवश बच्चे का देहांत गर्भ में ही हो गया। अजन्में शिशु की मौत की खबर सुनकर प्रजा शोक में डूब गई। इसी समय आसमान में छठी मइया प्रकट हुईं। राजा प्रियव्रत की प्रार्थना से उन्होंने बच्चे को जीवित कर दिया। मान्यता है कि तभी से यह त्योहार मनाया जाता है। संवाद
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इस दौरान महिलाएं बच्चों के स्वास्थ्य, सफलता और दीर्घायु के लिए 36 घंटे उपवास करती हैं। उत्सव के अवसर पर शहर में तमाम जगहों पर दिनभर महिलाएं तैयारियों में जुटी रहीं। छठ पूजा के लिए कैंट स्थित धोपेश्वर नाथ मंदिर के सरोवर में विशेष तैयारियां चल रही हैं। छठ पूजा के लिए रोशनी और साफ-सफाई कराई जा रही है। इज्जतनगर स्थित शिव पार्वती मंदिर में भी साफ-सफाई की जा रही है। इसके साथ रंगाई-पुताई का कार्य भी जारी है। मंदिर को सुंदर और रंग बिरंगी रोशनियों से सजाने का काम भी चल रहा है। रुहेलखंड विश्वविद्यालय में भी छठ पूजा की तैयारियां जोरों पर हैं। तालाब की साफ-सफाई का कार्य चल रहा है और मंदिर की मनमोहक फूलों और झालरों से सजावट की जा रही है।
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इस अवसर पर शहर में लोगों की ओर से घरों में विधि विधान पूर्वक पूजा अर्चना की जाती है। कॉलोनी में एक घर में ही छठ पूजा का आयोजन किया जाता है, जिसमें आस पास के लोग एकत्रित होते हैं और सूर्य भगवान को अर्घ्य देते हैं। लोग घरों में टब में जल रखकर पूजा करते हैं। वह इसे आम की पत्तियों, फूलों और रंग बिरंगी लाइटों से सजाते हैं और विधि विधान के साथ पूजा करते हैं।
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छठ पूजा का मुहूर्त
ज्योतिषाचार्य कृष्ण के. शर्मा के अनुसार हर साल छठ पूजा दिवाली से छह दिन बाद की जाती है, इस वर्ष कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि सात नवंबर की देर रात 12 बजकर 41 मिनट पर शुरू होगी और इसका समापन आठ नवंबर की देर रात 12 बजकर 34 मिनट पर होगा। ऐसे में सात नवंबर, बृहस्पतिवार के दिन ही संध्याकाल का अर्घ्य दिया जाएगा और सुबह का अर्घ्य अगले दिन आठ नवंबर को दिया जाएगा।
नहाय-खाय तिथि : नहाय-खाय मंगलवार को होगा। इस दिन श्रद्धालुओं की ओर से साफ सफाई कर नदी में स्नान के बाद नए वस्त्र धारण कर शाकाहारी भोजन ग्रहण किया जाएगा। इस दिन व्रती के भोजन ग्रहण करने के बाद ही घर के बाकी सदस्य भोजन ग्रहण करते हैं।
खरना तिथि : खरना छठ पूजा का दूसरा दिन होता है। खरना के दिन व्रती एक समय मीठा भोजन करते हैं। इस दिन गुड़ से बनी चावल की खीर खाई जाती है। इसके उपरांत 36 घंटे का निर्जला व्रत भी प्रारंभ हो जाता है।
तीसरा दिन छठ पूजा का विशेष दिन होता है, इस दिन डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है और सूरज की विधिवत पूजा की जाती है। रात में छठी मैया के मंगल गीतों का गायन किया जाता है और इस व्रत की कथा सुनी जाती है। अर्घ्य के लिए ठेकुआ, चावल के लड्डू जैसी कई मिठाइयां बनाई जाती है। मिठाइयों और फलों को रखकर टोकरी या सूप में सजाया जाता है।
चौथा दिन छठ पूजा का आखिरी दिन होता है, इस दिन व्रती महिलाएं सूर्योदय से पहले नदी-तालाबों के घाटों पर पहुंचतीं हैं और उगते हुए सूर्य को कच्चे दूध में गंगा जल मिलाकर अर्घ्य देती हैं। इस दिन व्रत का पारण होता है, इसके साथ ही छठ पूजा का समापन होता है।
इसलिए होती है छठ पूजा
छठ पूजा का वर्णन ब्रह्मवैवर्त पुराण में मिलता है। कथा के अनुसार जब राजा मनु के पुत्र प्रियव्रत को कोई संतान नहीं हुई तो महर्षि कश्यप के कहने पर उन्होंने महायज्ञ किया। परिणामस्वरूप रानी गर्भवती हुई। मगर दुर्भाग्यवश बच्चे का देहांत गर्भ में ही हो गया। अजन्में शिशु की मौत की खबर सुनकर प्रजा शोक में डूब गई। इसी समय आसमान में छठी मइया प्रकट हुईं। राजा प्रियव्रत की प्रार्थना से उन्होंने बच्चे को जीवित कर दिया। मान्यता है कि तभी से यह त्योहार मनाया जाता है। संवाद