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बेंत कारोबार: कभी विदेशों तक थी मांग.. आज वजूद का संकट

Mon, 03 Feb 2020 01:47 AM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Mon, 03 Feb 2020 01:47 AM IST
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Cane Business: There was a demand even till abroad .. Today's existential crisis
बरेली में बड़े स्तर पर होता है बेंत का सामान बनाने का काम। - फोटो : अमर उजाला, बरेली
बरेली। बेंत के फ र्नीचर की कभी देश भर में मांग थी लेकिन फिलहाल यह कारोबार बरेली में वजूद के संकट से जूझ रहा है। अब यह कारोबार बमुश्किल एक हजार कारीगरों तक सिमट गया है। कारीगरों का कहना है कि नोटबंदी से इस उद्योग को तगड़ा झटका लगा जिससे किसी तरह उसने उबरने की कोशिश की लेकिन जीएसटी ने उसे धराशायी कर दिया। एक जनपद, एक उत्पाद योजना से भी इस कारोबार का कोई भला नहीं हुआ।
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पुराना शहर के बेंत कारीगर आसिफ का कहना है कि वह कारोबार भी करते हैं और कारीगरी भी। पहले उनके पास पांच से छह कारीगर थे। अब एक ही कारीगर है और वह खुद फर्नीचर बनाते हैं। वह कहते हैं कि पहले सोफे, कुर्सी की बहुत डिमांड थी। अब डिमांड ही खत्म हो गई है। आर्डर पर ही वह फर्नीचर तैयार करते हैं। इस समय सिर्फ गमला स्टैंड, मैग्जीन स्टैंड और टेबल जैसा मामूली काम रह गया है। पिछले छह महीने से कारोबार लगभग पूरी तरह ठप पड़ा है। दुलारे मीर कहते हैं कि 2015 तक उनके पास बीस कारीगर थे, अब दो से ही काम चला रहे हैं। ज्यादातर कारीगर यह काम छोड़कर मजदूरी कर रहे हैं।
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कारीगराें की मांग
बेंत कारोबार पर जीएसटी खत्म हो, कच्चे माल की उपलब्धता बढ़ाई जाए और सब्सिडी पर लोन दिया जाए। उनके लिए डिजायनिंग सेंटर खुले, 18 फीसदी टैक्स खत्म किया जाए।
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जरी कारोबार: एक बार धागे खुले तो जुड़ ही नहीं पाए
बरेली। एक समय था जब बरेली के जरी उद्योग की दूर-दूर तक धाक थी। पंजाब, पाकिस्तान और बांग्लादेश में होने वाली शादियाें में बरेली की जरी की तूती बोलती थी। नोटबंदी और फिर जीएसटी की मार ने इस कारोबार को भी तबाह कर दिया। नेताओं और अफसरों ने तमाम सपने दिखाए जो पूरे नहीं हो पाए। छोटे व्यापारियों का काम बंद हो गया है और हजारों लोग बेरोजगार हो गए हैं। इस बार बजट से आस थी जो पूरी नहीं हुई।
पुराना शहर के जरी कारीगर राजा का कहना है कि पहले सिर्फ वही पंद्रह सौ से अधिक साड़ियां और सूट पंजाब में सप्लाई करते थे। बीते चार सालों से इस बाजार में मंदी आनी शुरु हुई जो आज तक बनी हुई है। कारोबार इससे उबर नहीं पा रहा है। पहले एक-एक कारीगर सालभर में 10 लाख से एक करोड़ तक का व्यापार कर लेता था। अब दस लाख का कारोबार करने वाला एक लाख तक नहीं पहुंच पा रहा है। उन्हें बजट से भी उम्मीदें थी लेकिन उन्हें इससे कुछ नहीं मिला। जावेद का कहना है कि पहले वह सूरत में व्यापारियों को माल सप्लाई करते थे। उनके पास आर्डर लगे रहते थे, अब स्थितियां अलग हैं। सिर्फ सहालग में कारोबार कुछ रफ्तार पकड़ता है और फिर पूरी तरह से ठंडा पड़ जाता है। बताया कि वह सूरत में एक व्यापारी को दीवाली से पहले माल देकर आए थे जिसका पैसा अभी तक नहीं मिला है, कह रहे हैं कि माल बिका ही नहीं है। पहले यह स्थितियां कभी नहीं रहीं।

हजारों महिलाओं के हाथ खाली
घराें में जरी का ज्यादातर काम महिलाएं भी करती हैं। कई घरों में आदमी काम नहीं करते, घर महिलाएं और बच्चों के जरी की मेहनत से चलता था, अब दो समय की रोटी जोड़ना मुश्किल है। शहर के कुछ मोहल्लों में पूरा का पूरा परिवार इस कारोबार से जुड़ा है। महिलाएं घर के काम के साथ साथ जरी के काम को करती थीं। जरी का काम उनके आय का जरिया था, लेकिन अब महिलाएं बेरोजगार होती जा रही हैं।
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