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Bareilly News: बनारसी हों या कांजीवरम... चमक रहा बरेली का रेशम
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बरेली। देश-विदेश तक निर्यात हो रही बनारसी और कांजीवरम साड़ियाें में बरेली का रेशम चमक रहा है। इस वर्ष 850 किलो रेशम के धागे बनारस, मुबारकपुर और तमिलनाडु भेजे जाने की तैयारी है। रेशम के कच्चे धागे कई परिवारों की आर्थिक मजबूती का जरिया बन रहे हैं।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश की इकलौती रेशम धागा फैक्टरी पीलीभीत में संचालित है। इसका क्रियान्वयन औद्योगिक रेशम धागा उत्पादन समूह कर रहा है। रेशम विकास अधिकारी एमके गौतम के मुताबिक 90 के दशक में यहां फैक्टरी स्थापित हुई थी। इसी दौरान बरेली, शाहजहांपुर, बदायूं में भी राजकीय रेशम कीट पालन केंद्र बने। इसी केंद्र से मुरादाबाद, रामपुर, अमरोहा भी संबद्ध हैं। इन स्थानों से यहां ककून आते हैं।
कई वर्षों तक घाटे की वजह से धागा उत्पादन बंद रहा। वर्ष 2019 में उत्पादन शुरू करने के लिए नई मशीन लगाई गई। सालभर बाद दोबारा रेशम के कच्चे धागों का उत्पादन शुरू हुआ। इसे बनारस, मुबारकपुर और तमिलनाडु के कारोबारी खरीदते हैं। यहां रेशम के वस्त्र तैयार किए जा सकें, इस पर भी मंथन हो रहा है। तीन वर्ष पूर्व पीलीभीत के तत्कालीन जिलाधिकारी पुलकित खरे ने वस्त्र उत्पादन के लिए मशीन स्थापित करने पर सहमति जताई थी।
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किस जिले में कितना हो रहा उत्पादन
बरेली मंडल के चारों जिलों से इस वर्ष 1.93 लाख किलो ककून का उत्पादन हुआ। पीलीभीत में सर्वाधिक 99,463 किलो उत्पादन रहा। बरेली में फरीदपुर स्थित रेशम पालन केंद्र से 38,538 किलो, शाहजहांपुर से 48,842 किलो, बदायूं से 6,463 किलो ककून प्राप्त हुआ। इससे 850 किलो रेशम के धागे तैयार किए जा चुके हैं। इससे पीलीभीत के 1,396 परिवारों की आजीविका जुड़ी है।
फैक्टरी से बरेली मंडल के चार और मुरादाबाद मंडल के तीन जिले संबद्ध हैं। कच्चा माल बनारस, मुबारकपुर और तमिलनाडु में बेचा जा रहा है। इससे तैयार साड़ियां व अन्य वस्त्र देश-विदेश में अपनी पहचान बना रहे हैं। - एनके सिंह, सहायक निदेशक रेशम विकास
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सिल्क सदाबहार... युवतियों को लुभा रहीं रेडी-टू-वियर साड़ियां
फोटो
संवाद न्यूज एजेंसी
बरेली। साड़ियां केवल वस्त्र नहीं, यह हमारी सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक हैं। प्राचीन काल से लेकर वर्तमान की चकाचौंध तक, हर दौर में साड़ियां प्रासंगिक रहीं हैं। वैश्विक मंच पर साड़ियों से भारतीय नारी की पहचान होती है। समय के साथ इसमें बदलाव जरूर आए, पर सिल्क की साड़ियों का क्रेज हर दौर में रहा। वर्तमान में युवा पीढ़ी को डिजाइनर और रेडी-टू-वियर साड़ियां खूब लुभा रहीं हैं।
समय के साथ सिल्क की साड़ियों की डिजाइन में बदलाव जरूर आए, लेकिन नए नाम और फैब्रिक्स के साथ बाजार में उनकी पकड़ बरकरार रही। विशेष अवसरों पर बनारसी और कांजीवरम साड़ियां पहनी जाती हैं, वहीं रोजमर्रा में कॉटन और सिल्क की साड़ियां प्रचलन में हैं। समय के साथ-साथ साड़ियों को तैयार करने की प्रक्रिया में भी बदलाव आया है। पहले साड़ियों पर पूरा काम हाथ से होता था। इसमें महीनों लग जाते थे। आधुनिक युग में मशीन वर्क ने इस प्रक्रिया को आसान, तेज और किफायती बना दिया है।
कपड़ा व्यापारी नरेंद्र गुप्ता ने बताया कि सिल्क साड़ी का क्रेज हमेशा रहा है। बनारसी और कांजीवरम की मांग आज भी वैसी ही है, जैसे दो दशक पहले थी। साड़ी कारोबारी मोहम्मद नईम के मुताबिक साड़ियों की डिजाइन में बदलाव होते रहते हैं, लेकिन कई पुरानी डिजाइन दोहराई जा रहीं हैं। साड़ियां कभी भी आउट ऑफ फैशन नहीं होतीं। पुराने पैटर्न को बस नई तकनीक और मॉडर्न टच के साथ पेश किया जाता है।
अजीत प्रताप सिंह
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पश्चिमी उत्तर प्रदेश की इकलौती रेशम धागा फैक्टरी पीलीभीत में संचालित है। इसका क्रियान्वयन औद्योगिक रेशम धागा उत्पादन समूह कर रहा है। रेशम विकास अधिकारी एमके गौतम के मुताबिक 90 के दशक में यहां फैक्टरी स्थापित हुई थी। इसी दौरान बरेली, शाहजहांपुर, बदायूं में भी राजकीय रेशम कीट पालन केंद्र बने। इसी केंद्र से मुरादाबाद, रामपुर, अमरोहा भी संबद्ध हैं। इन स्थानों से यहां ककून आते हैं।
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कई वर्षों तक घाटे की वजह से धागा उत्पादन बंद रहा। वर्ष 2019 में उत्पादन शुरू करने के लिए नई मशीन लगाई गई। सालभर बाद दोबारा रेशम के कच्चे धागों का उत्पादन शुरू हुआ। इसे बनारस, मुबारकपुर और तमिलनाडु के कारोबारी खरीदते हैं। यहां रेशम के वस्त्र तैयार किए जा सकें, इस पर भी मंथन हो रहा है। तीन वर्ष पूर्व पीलीभीत के तत्कालीन जिलाधिकारी पुलकित खरे ने वस्त्र उत्पादन के लिए मशीन स्थापित करने पर सहमति जताई थी।
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किस जिले में कितना हो रहा उत्पादन
बरेली मंडल के चारों जिलों से इस वर्ष 1.93 लाख किलो ककून का उत्पादन हुआ। पीलीभीत में सर्वाधिक 99,463 किलो उत्पादन रहा। बरेली में फरीदपुर स्थित रेशम पालन केंद्र से 38,538 किलो, शाहजहांपुर से 48,842 किलो, बदायूं से 6,463 किलो ककून प्राप्त हुआ। इससे 850 किलो रेशम के धागे तैयार किए जा चुके हैं। इससे पीलीभीत के 1,396 परिवारों की आजीविका जुड़ी है।
फैक्टरी से बरेली मंडल के चार और मुरादाबाद मंडल के तीन जिले संबद्ध हैं। कच्चा माल बनारस, मुबारकपुर और तमिलनाडु में बेचा जा रहा है। इससे तैयार साड़ियां व अन्य वस्त्र देश-विदेश में अपनी पहचान बना रहे हैं। - एनके सिंह, सहायक निदेशक रेशम विकास
सिल्क सदाबहार... युवतियों को लुभा रहीं रेडी-टू-वियर साड़ियां
फोटो
संवाद न्यूज एजेंसी
बरेली। साड़ियां केवल वस्त्र नहीं, यह हमारी सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक हैं। प्राचीन काल से लेकर वर्तमान की चकाचौंध तक, हर दौर में साड़ियां प्रासंगिक रहीं हैं। वैश्विक मंच पर साड़ियों से भारतीय नारी की पहचान होती है। समय के साथ इसमें बदलाव जरूर आए, पर सिल्क की साड़ियों का क्रेज हर दौर में रहा। वर्तमान में युवा पीढ़ी को डिजाइनर और रेडी-टू-वियर साड़ियां खूब लुभा रहीं हैं।
समय के साथ सिल्क की साड़ियों की डिजाइन में बदलाव जरूर आए, लेकिन नए नाम और फैब्रिक्स के साथ बाजार में उनकी पकड़ बरकरार रही। विशेष अवसरों पर बनारसी और कांजीवरम साड़ियां पहनी जाती हैं, वहीं रोजमर्रा में कॉटन और सिल्क की साड़ियां प्रचलन में हैं। समय के साथ-साथ साड़ियों को तैयार करने की प्रक्रिया में भी बदलाव आया है। पहले साड़ियों पर पूरा काम हाथ से होता था। इसमें महीनों लग जाते थे। आधुनिक युग में मशीन वर्क ने इस प्रक्रिया को आसान, तेज और किफायती बना दिया है।
कपड़ा व्यापारी नरेंद्र गुप्ता ने बताया कि सिल्क साड़ी का क्रेज हमेशा रहा है। बनारसी और कांजीवरम की मांग आज भी वैसी ही है, जैसे दो दशक पहले थी। साड़ी कारोबारी मोहम्मद नईम के मुताबिक साड़ियों की डिजाइन में बदलाव होते रहते हैं, लेकिन कई पुरानी डिजाइन दोहराई जा रहीं हैं। साड़ियां कभी भी आउट ऑफ फैशन नहीं होतीं। पुराने पैटर्न को बस नई तकनीक और मॉडर्न टच के साथ पेश किया जाता है।
अजीत प्रताप सिंह