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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Bareilly News ›   Bareilly: Seven hundred rupees have been recovered from us in trouble .. If they do not destroy life, then say

बरेलीः मुसीबत में हमसे जो सात सौ रुपये वसूले हैं.. वो जिंदगी न तबाह कर दें तो कहना

Sun, 10 May 2020 01:09 AM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Sun, 10 May 2020 01:09 AM IST
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Bareilly: Seven hundred rupees have been recovered from us in trouble .. If they do not destroy life, then say
गुजरात से लौटने वाले श्रमिकों के परिवारों ने सुनाई अपनी व्यथा। - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, बरेली

चेहरों पर घर लौटने की खुशी और जुबान पर ठेकेदारों के लिए बददुआएं, मजदूरों ने कहा- लॉकडाउन ने क्या-क्या नहीं दिखाया

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बरेली। तंगहाली और फाकाकशी के लंबे दौर के साथ इंसानी तकाजों को तहस-नहस होता देखकर गुजरात से लौटे ईंट भट्ठा मजदूरों के चेहरों पर राहत और खुशी के भाव साफ दिखाई दिए। जंक्शन के बाहर अमर उजाला ने उनसे बातचीत की तो लॉकडाउन शुरू होने के बाद तमाम कड़वे तजुर्बों की यादें जुबान पर आ गईं। मजदूरों ने बताया कि लॉकडाउन होते ही ठेकेदारों के लिए वे जैसे बोझ बन गए। वे भूखे रहे या बीमार न किसी ने मदद की न हाल पूछा। चलते-चलते ट्रेन के उस टिकट के नाम पर भी हर मजदूर से सात सौ रुपये की वसूली कर ली जो सरकार की ओर से मुफ्त दिया गया था। मजदूरों की जुबान से बद्दुआएं भी निकलीं। बोले, कठिन वक्त में उनके साथ बुरा बर्ताव करने वालों की खुद की भी जिंदगी तबाह होने से बचेगी नहीं।

गुजरात में अब गुजर नहीं, सिर्फ बचा सामान लेने जाएंगे

उझानी (बदायूं) के गांव फूलपुर के रहने वाले नन्हे मियां पत्नी के साथ बदायूं की बस में बैठ गए। उन्होंने बताया कि गुजरात के काकोसी में ईट भट्ठे पर उनके साथ 113 लोग काम करते थे। दो महीने से सभी खाली बैठे थे। ईटें पाथने के बदले में उन्हें दो से ढाई सौ रुपये रोज के हिसाब से काम मिलता था जो बंद हो गया तो पूरा वक्त दूसरों के रहम पर गुजारना पड़ा। अब अपना बचा सामान लेने ही गुजरात जाएंगे। गुजर-बसर यहीं मजदूरी करके करेंगे।
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490 का टिकट, ठेकेदार ने बच्चों तक के वसूले सात सौ रुपये

बिनावर के जाटव गौंटिया में रहने वाले शिव सिंह का परिवार भी 50 दूसरे भट्ठा मजदूरों के साथ गुजरात से लौटकर आया। उन्होंने बताया कि डेढ़ महीने से भट्ठे के एक छोटे से कमरे में कैद थे। बाहर निकलो तो पुलिस पीटती थी। लौटते वक्त मालिक ने बच्चों तक का पूरा सात सौ रुपया किराया वसूला लेकिन स्टेशन पहुंचे तो सिर्फ 490 का टिकट हाथ में थमाया। एक बिस्किट का पैकेट देकर ट्रेन में बैठा दिया गया। अपना खाना साथ न लाते तो भूखे मर जाते।
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किसका गुजरात.. अब कारचोबी का पुराना धंधा जिंदाबाद
फरीदपुर के फर्रखपुर मोहल्ले में रहने वाले इरशाद अपने परिवार के साथ ट्रेन से उतरे तो बताया कि उनके परिवार के सात लोग छह महीने के लिए गुजरात में ईंट भट्ठे पर जाते थे तो बाकी छह महीने अपने गांव लौटकर कारचोबी का काम करते थे। गुजरात तो परदेस है, अब वहां नहीं जाएंगे, गांव में ही कारचोबी के काम को आगे बढ़ाएंगे। फरीदपुर के ही गांव जेढ़ के बन्ने ने बताया कि डेढ़ महीने बहुत बुरी तरह कटे। अल्लाह ये दिन दोबारा न दिखाए।

घर जाने को बस में बैठते ही बच्चे चहके

बहेड़ी का एक परिवार जब ट्रेन से उतरकर बस में बैठा तो बच्चों के चेहरे पर खुशी आ गई। वह खिड़की से झांकते हुए यह कहकर किलकारी मारने लगे कि अब घर आने वाला है। शबाना नाम की बच्ची छोटे भाई को हाथ से पैकेट में मिली खिचड़ी खिलाने लगी। बोली, अब थोड़ी देर में घर पहुंच जाएंगे।

मजदूरों ने कई पैकेट लिए, यहां-वहां फेंके

जंक्शन पर उतने वाले मजदूरों को थर्मल स्क्रीनिंग के बाद गेट पर कम्युनिटी किचन में बने खाने के पैकेट और पानी की बोतल दी गईं। रेलवे की ओर से लगातार अनाउंस किया जाता रहा कि मजदूरों को खाने का कोई पैसा नहीं देना है, कोई पैसा मांगे तो शिकायत करें। मजदूरों ने कई-कई पैकेट ले लिए। इनमें उड़द की खिचड़ी थी। कई पैकेट खाने के बाद लोगों ने यहां वहां फेंक दिए। कुछ लोगों की शिकायत थी कि खिचड़ी कच्ची थी।
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