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बरेली में तो बसपा का कैडर भी हिल गया!
बरेली।
Updated Sun, 12 Mar 2017 12:57 AM IST
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Bareilly's cadre was also shaken in Bareilly!
- फोटो : बरेली, अमर उजाला
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बरेली जिले के नतीजों पर गौर करें तो एक बात दिख रही है कि कहीं सीटों पर बसपा का कैडर वोट कहा जाने वाला वर्ग भी उसके साथ नहीं रह पाया तो कहीं मुस्लिम वोटरों ने सपा-कांग्रेस को बेहतर विकल्प मान कर उसकी रणनीति फेल कर दी। जिन सीटों पर बसपा कुछ लड़ती हुई दिखायी थी वहां इस लड़ाई की वजह लड़ने वाले का अपना कद था। जो लोग मायावती को अपना निर्विवाद नेता मानते हैं दलित वर्ग के ऐसे वोटरों को बाकी वोटरों ने इस तरह अलग कर दिया कि अब उन्हें अपने राजनीतिक अस्तित्व के बारे में चिंता होने लगी है। युवा नेता अगम मौर्य, नसीम अहमद सुल्तान बेग और वीरेंद्र सिंह ने पार्टी की लाज बचाने की बहुत कोशिश की लेकिन पार्टी के खिलाफ माहौल इनके सपनों को ले डूबा।
जोनल कोआर्डिनेटर ब्रह्मस्वरूप बुरी तरह फेल साबित हुए। बरेली मंडल में बसपा के लचर संगठन और नेताओं की मनमानी बहुजन समाज पार्टी को कुछ ज्यादा ही भारी पड़ गई। जिस तरह पीलीभीत में फूलबाबू और शाहजहांपुर को पार्टी छोड़ने के लिए मजबूर किया गया और खीरी में भाजपा के टिकट पर जीते तीन नेताओं को जाने दिया गया वह बसपा के दूसरी लाइन के नेताओं की मनमानी और गलत फीडिंग का ही नतीजा था। संगठन के जोलन और जिला प्रभारी अपने वोटबैंक को भी एकजुट नहीं रख पाए। जिले की नौ सीटों में से तीन प्रत्याशी जमानत नहीं बचा पाए। मंडल की 25 सीटों में से चारों सुरक्षित सीटें भी खो दीं। कार्यकर्ता खुले तौर पर सामने नहीं आ रहे हैं लेकिन उनका कहना है कि पार्टी के पुराने और निष्ठावान लोगों को दर किनार करना भी भारी पड़ा।
चुनाव से पहले टिकट की कीमत, फिर रैली के नाम पर वसूली और नोटबंदी के दौर में प्रत्याशियों पर पड़े दबाव की चर्चा चुनाव भर रही। पार्टी का संगठन देख रहे लोग धन व्यवस्था में तो काफी सक्रिय दिखे लेकिन धरातल पर दिख रहे संकट को यह कह कर हवा में उड़ाते रहे कि बसपा का वोटर साइलेंट फैसला देता है उनके लिए बहन जी का आदेश बड़ी चीज है। प्रत्याशियों को कहां मदद की जरूरत है। दलित वोटों के इतर बाकी लोगों को कैसे समझाना है इस पर संगठन ने ध्यान ही नहीं दिया। ले-देकर नसीमुद्दीन सिद्दीकी और उनके बेटे को कुछ प्रत्याशी प्रचार के लिए ला पाए। न कोई स्टार प्रचारक न कोई रणनीति ऐसे में बसपा की हार बहुत अप्रत्याशित नहीं है।
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मंडल में फरीदपुर, पुवायां, बिसौली और पूरनपुर सुरक्षित सीटें हैं। माना जा रहा था कि इन सुरक्षित सीटों पर बसपा जरूर जीतेगी लेकिन स्थिति यह रही कि पुवायां में पूर्व आईपीएस अफसर गुरुबचन लाल प्रत्याशी थे जो किसी तरह अपनी जमानत बचा पाए। फरीदपुर से विजयपाल, पूरनपुर में के के अरविंद और बिसौली से कैलाश सागर मुकाबले में आ ही नहीं पाए। सबसे बुरी स्थित बरेली शहर और कैंट में देखने को मिली, पार्टी ने राजेंद्र गुप्ता को वैश्य समाज और व्यापारी नेता के रूप में प्रोजेक्ट किया।अनीस अहमद की भी पुराना प्रत्याशी बता कर खूब तारीफ की गई थी लेकिन वह बमुश्किल 9046 वोट पा सके। दोनों नेताओं की जमानत ही जब्त हो गई। नवाबगंज में बसपा प्रत्याशी वीरेंद्र गंगवार की जमानत जब्त हो गई। बरखेड़ा में शैलेंद्र गंगवार भी जमानत नहीं बचा सके। बिल्सी, सहसवान, मीरगंज और बहेड़ी में बसपा प्रत्याशी दूसरे स्थान पर रहे।
हमारी राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने ईवीएम में गड़बड़ी की बात कही है। हम भी वही कह रहे हैं। ये चुनाव गड़बड़ी करके जीता गया है। चुनाव आयोग में शिकायत की गई है। आंदोलन के बारे में हाईकमान से निर्देश मिलने का इंतजार है।
-ब्रह्मस्वरूप सागर, जोन कोआर्डिनेटर बसपा
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जोनल कोआर्डिनेटर ब्रह्मस्वरूप बुरी तरह फेल साबित हुए। बरेली मंडल में बसपा के लचर संगठन और नेताओं की मनमानी बहुजन समाज पार्टी को कुछ ज्यादा ही भारी पड़ गई। जिस तरह पीलीभीत में फूलबाबू और शाहजहांपुर को पार्टी छोड़ने के लिए मजबूर किया गया और खीरी में भाजपा के टिकट पर जीते तीन नेताओं को जाने दिया गया वह बसपा के दूसरी लाइन के नेताओं की मनमानी और गलत फीडिंग का ही नतीजा था। संगठन के जोलन और जिला प्रभारी अपने वोटबैंक को भी एकजुट नहीं रख पाए। जिले की नौ सीटों में से तीन प्रत्याशी जमानत नहीं बचा पाए। मंडल की 25 सीटों में से चारों सुरक्षित सीटें भी खो दीं। कार्यकर्ता खुले तौर पर सामने नहीं आ रहे हैं लेकिन उनका कहना है कि पार्टी के पुराने और निष्ठावान लोगों को दर किनार करना भी भारी पड़ा।
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चुनाव से पहले टिकट की कीमत, फिर रैली के नाम पर वसूली और नोटबंदी के दौर में प्रत्याशियों पर पड़े दबाव की चर्चा चुनाव भर रही। पार्टी का संगठन देख रहे लोग धन व्यवस्था में तो काफी सक्रिय दिखे लेकिन धरातल पर दिख रहे संकट को यह कह कर हवा में उड़ाते रहे कि बसपा का वोटर साइलेंट फैसला देता है उनके लिए बहन जी का आदेश बड़ी चीज है। प्रत्याशियों को कहां मदद की जरूरत है। दलित वोटों के इतर बाकी लोगों को कैसे समझाना है इस पर संगठन ने ध्यान ही नहीं दिया। ले-देकर नसीमुद्दीन सिद्दीकी और उनके बेटे को कुछ प्रत्याशी प्रचार के लिए ला पाए। न कोई स्टार प्रचारक न कोई रणनीति ऐसे में बसपा की हार बहुत अप्रत्याशित नहीं है।
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मंडल में फरीदपुर, पुवायां, बिसौली और पूरनपुर सुरक्षित सीटें हैं। माना जा रहा था कि इन सुरक्षित सीटों पर बसपा जरूर जीतेगी लेकिन स्थिति यह रही कि पुवायां में पूर्व आईपीएस अफसर गुरुबचन लाल प्रत्याशी थे जो किसी तरह अपनी जमानत बचा पाए। फरीदपुर से विजयपाल, पूरनपुर में के के अरविंद और बिसौली से कैलाश सागर मुकाबले में आ ही नहीं पाए। सबसे बुरी स्थित बरेली शहर और कैंट में देखने को मिली, पार्टी ने राजेंद्र गुप्ता को वैश्य समाज और व्यापारी नेता के रूप में प्रोजेक्ट किया।अनीस अहमद की भी पुराना प्रत्याशी बता कर खूब तारीफ की गई थी लेकिन वह बमुश्किल 9046 वोट पा सके। दोनों नेताओं की जमानत ही जब्त हो गई। नवाबगंज में बसपा प्रत्याशी वीरेंद्र गंगवार की जमानत जब्त हो गई। बरखेड़ा में शैलेंद्र गंगवार भी जमानत नहीं बचा सके। बिल्सी, सहसवान, मीरगंज और बहेड़ी में बसपा प्रत्याशी दूसरे स्थान पर रहे।
हमारी राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने ईवीएम में गड़बड़ी की बात कही है। हम भी वही कह रहे हैं। ये चुनाव गड़बड़ी करके जीता गया है। चुनाव आयोग में शिकायत की गई है। आंदोलन के बारे में हाईकमान से निर्देश मिलने का इंतजार है।
-ब्रह्मस्वरूप सागर, जोन कोआर्डिनेटर बसपा