लोकसभा चुनाव 2024: बरेली में कसौटी पर होंगे नेता... स्थानीय मुद्दे लेंगे कड़ा इम्तिहान
आंवला संसदीय क्षेत्र में लंबे समय से स्थानीय मुद्दे गौण हैं। कई समस्याएं वर्षों से हैं, लेकिन उनके निराकरण में अबतक किसी ने ठोस दिलचस्पी नहीं दिखाई।
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बरेली में लोकसभा चुनाव को लेकर सियासत तेज होते ही स्थानीय मुद्दे भी उठने लगे हैं। चुनाव मैदान में उतर रहे नेताओं का ये मुद्दे इम्तिहान लेंगे। आंवला संसदीय क्षेत्र की बात करें तो यहां लंबे समय से स्थानीय मुद्दे गौण हैं। कई समस्याएं वर्षों से हैं, लेकिन उनके निराकरण में अबतक किसी ने ठोस दिलचस्पी नहीं दिखाई।
यही कारण है कि सड़क, पुल, अस्पताल, शिक्षा, सिंचाई के साधन, पेयजल, महिला कॉलेज समेत अन्य ज्वलंत स्थानीय मुद्दे एक बार फिर मुंह बाये खड़े हैं। लोगों का कहना है कि इस बार उम्मीद है कि चुनाव में इन मुद्दों पर ध्यान दिया जाएगा और उनके ठोस निराकरण की बात होगी। क्या हैं लोगों की नजर में आंवला संसदीय क्षेत्र के प्रमुख स्थानीय मुद्दे? इसी पर अभिषेक मिश्रा की रिपोर्ट...
तहसील क्षेत्र में है मात्र एक राजकीय डिग्री कॉलेज
आंवला तहसील क्षेत्र में कई बड़े कस्बे हैं। इसके बावजूद यहां एक ही राजकीय डिग्री कॉलेज है। मजबूरी में विद्यार्थियों को महंगे खर्च पर निजी संस्थानों में प्रवेश लेना पड़ता है। सिरौली सहित अन्य जगहों के जो छात्र राजकीय डिग्री कॉलेज में प्रवेश लेते हैं, उन्हें लंबा सफर तय करके कॉलेज पहुंचना पड़ता है। तहसील क्षेत्र में एक भी इंजीनियरिंग कॉलेज नहीं है।
पितांबरपुर क्रॉसिंग पर जाम में फंसकर जान गंवा रहे मरीज
पितांबरपुर रेलवे क्रॉसिंग पर ओवरब्रिज न होने की वजह से रोजाना जाम लगता है। बड़ी संख्या में लोग सीएचसी भी इसी रास्ते से पहुंचते हैं। जाम की वजह से अब तक दर्जनभर से ज्यादा लोगों की मौत एंबुलेंस में ही हो चुकी है। पैदल क्रॉसिंग पार करते समय ट्रेन से कटकर भी कई लोगों की जान जा चुकी है। वर्ष 2009 में आंवला से चुनाव लड़ीं मेनका गांधी ने ओवरब्रिज निर्माण का भरोसा दिया था, लेकिन यह मांग उनके कार्यकाल में पूरी नहीं हो पाई। बीते दिनों ही प्रोजेक्ट के लिए बजट मिला है लेकिन, रेलवे की ओर से एनओसी न मिलने की वजह से काम शुरू नहीं हो पा रहा।
महंगी सिंचाई मजबूरी बनी
रामगंगा बैराज परियोजना 12 वर्ष बाद भी पूरी नहीं हो पाई है। करीब 332 करोड़ रुपये की मूल लागत वाले प्रोजेक्ट की लागत बढ़कर करीब 2100.15 करोड़ रुपये पहुंच गई है। चौबारी में बांध बनने के बाद भी नहरें न बनने से किसानों को सिंचाई के लिए पानी नहीं मिल पा रहा। अगर प्रोजेक्ट के लिए बजट मिल भी जाता है तो जमीन अधिग्रहण से लेकर नहरों की खोदाई तक में लंबा वक्त लगेगा। ऐसे में अगले कुछ सालों तक किसानों को महंगे दाम पर डीजल खर्च कर सिंचाई करना मजबूरी है।
फसल चौपट करने के साथ जान भी ले रहे छुट्टा पशु
आंवला क्षेत्र के मतदाताओं में दो तिहाई ग्रामीण पृष्ठभूमि से हैं। इसलिए खेती-किसानी से जुड़े मसले चुनावों के बिना भी हमेशा हावी रहते हैं। किसानों के सामने सबसे बड़ी समस्या छुट्टा पशु हैं। जगह-जगह गो आश्रय स्थल बनाए जरूर गए हैं, मगर इनमें से ज्यादातर बदहाल हैं। छुट्टा पशु खेतों में फसल बर्बाद कर रहे हैं। किसानों को रात-रात भर जागकर निगरानी करनी पड़ रही है।
सर्दी-गर्मी और बरसात के हर मौसम में किसान निगरानी करने के लिए मजबूर हैं। अगर एक भी दिन चूक हो जाए तो छुट्टा पशु पूरी साल की मेहनत बर्बाद कर जाते हैं। कई किसान फसल की निगरानी करते हुए ही छुट्टा पशुओं के हमले में जान गंवा चुके हैं। बिशारतगंज क्षेत्र में छुट्टा पशुओं को एक-दूसरे के खेत में घुसाने के विवाद में दो गांव के किसानों के बीच हुए खूनी संघर्ष में एक किसान की मौत भी हो चुकी है।
फरीदपुर तहसील क्षेत्र में एक भी मंडी नहीं है। कई बार मांग भी उठ चुकी मगर समाधान नहीं हुआ।
फरीदपुर के पुराने अस्पताल की जगह ट्रॉमा सेंटर का निर्माण।
आंवला- वजीरगंज रोड का निर्माण लंबे समय से फाइलों में फंसा।
आंवला-अलीगंज रोड पर हाल के दिनों में कई कारखानों का निर्माण हुआ है इसके बाद भी सड़क मरम्मत पर ध्यान नहीं दिया जा रहा।
कपूरपुर, गूजर गौटिया, गौसगंज, गोपालपुर, गोविंदपुर, मंझा, अखा, खजुआई में छुट्टा पशुओं की संख्या ज्यादा है। कई बार ज्ञापन देने के बाद भी सुनवाई नहीं हो रही। - रवि नागर, किसान नेता
नरियावल मोड़ से मनपुरिया दलेल तक की करीब डेढ़ किलोमीटर लंबी सड़क खराब है। गड्ढों की वजह से कई बार हादसे भी हो चुके हैं। कई बार इसकी शिकायत की गई मगर सड़क अब तक नहीं बनी है। - शकील, ठिरिया निजावत खां
पितांबरपुर रेलवे क्रॉसिंग पर ओवरब्रिज न होने की वजह से करीब 50 हजार लोग प्रतिदिन प्रभावित होते हैं। शिलान्यास हुए एक साल बीतने को है। अब तक यहां काम शुरू नहीं हुआ है। - हरवंश सिंह चौहान, फरीदपुर