कहानी उस रामलीला की: जिसे देखने सुरंग से आती थीं रानी महालक्ष्मीबाई, 457 साल पुराना है इतिहास
बरेली के चौधरी तालाब की रामलीला का इतिहास 457 साल पुराना है। लखना स्टेट के राजा जसवंत राव ने पुत्री महालक्ष्मीबाई के नाम पर यहां रामलीला का मंचन शुरू कराया था। वह प्रभु श्रीराम की अनन्य भक्त थीं। चौधरी तालाब पर होने वाले मंचन को देखने के लिए उन्होंने महल से रामलीला स्थल तक दो किमी लंबी सुरंग बनवाई थी।
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बरेली में मर्यादा का मंचन और राम का किरदार शहरवासियों की सांसों संग कदमताल कर रहा है। दर्जनभर स्थानों पर रामलीला का मंचन किया जा रहा है, लेकिन चौधरी तालाब की रामलीला इनमें सबसे अलग है। 457 साल से इसकी ओट में राजा वसंतराव की पत्नी रानी महालक्ष्मीबाई का किरदार भी सांस ले रहा है। वर्ष 1567 में इसका शुभारंभ कराने वाले राजा जसवंत राव भले ही लोगों के स्मृति पटल से विस्मृत हो गए हों, लेकिन रानी का नाम सबको याद है।
इसका कारण है, रामलीला से उनका जुड़ाव। वह प्रभु श्रीराम की अनन्य भक्त थीं। चौधरी तालाब पर होने वाले मंचन को देखने के लिए उन्होंने महल (रानी साहब का फाटक) से रामलीला स्थल तक दो किमी लंबी सुरंग बनवाई थी। यह सुरंग तालाब के पास स्थित प्रसिद्ध होलका देवी मंदिर में निकलती है। यह मंदिर भी उन्हीं का बनवाया है। बताते हैं कि होलका उनकी कुलदेवी थीं। इस सुरंग के अवशेष आज भी लोगों को रानी के किरदार का अहसास कराते हैं। आसपास के क्षेत्रों के लोग उनको कुलदेवी के रूप में पूजते हैं।
तीन जगह होता है मंचन
18 दिनों तक चलने वाली रामलीला का मंचन तीन जगह किया जाता है। पहले आठ दिन चौधरी तालाब, इसके बाद आठ दिन बड़ा बाग में मंचन होता है। एक दिन शोभायात्रा निकाली जाती है। वहीं, अंतिम दिन रानी साहब के फाटक पर भव्य राजतिलक का आयोजन किया जाता है। यही कारण है कि यह ऐतिहासिक रामलीला देशभर में प्रसिद्ध है।
श्री रानी महालक्ष्मीबाई रामलीला समिति के कोषाध्यक्ष प्रभु नारायण तिवारी बताते हैं कि तीन जगह होने वाली यह प्रदेश की पहली रामलीला है। साथ ही, यह देश की सबसे पुरानी तीन रामलीलाओं में भी शामिल है। सबसे पहली अयोध्या, दूसरी काशी रामनगर और तीसरी बरेली के चौधरी तालाब की रामलीला है। इस बार अयोध्या और बिहार के 24 कलाकार इसका मंचन करेंगे।
समिति के पूर्व पदाधिकारी 85 वर्षीय कृष्ण शंकर त्रिपाठी ने बताया कि मुगल शासक औरंगजेब ने रामलीला को बंद करवाने की कोशिश की थी। भारत-पाक के बीच युद्ध के दौरान जब देशभर में ब्लैकआउट हुआ था, तब भी यहां परंपरा निभाई गई। हाल ही में कोरोना महामारी के दौरान भी यहां परंपरा को जीवित रखा गया। यहां निर्मित अस्थायी अयोध्यापुरी और लंका की दूरी मात्र चार किलोमीटर है। दरअसल, समिति ने चौधरी तालाब को अयोध्या व बड़ा बाग को लंका का नाम दिया है। प्रसंग के अनुसार दोनों स्थानों पर लीलाओं का मंचन होता है।
उपहार स्वरूप मिला था गुलाबनगर का तिवारीपुरा
समिति के अध्यक्ष रामगोपाल मिश्रा ने बताया कि वर्ष 1567 में लखना स्टेट के राजा जसवंत राव ने अपनी पुत्री राजकुमारी महालक्ष्मीबाई के नाम पर रामलीला का मंचन शुरू कराया था। राजकुमारी के विवाह के बाद उनके पति वसंतराव ने परंपरा को आगे बढ़ाया। वर्ष 1920 के करीब दूसरे समुदाय के लोगों ने रामलीला में बाधा डाली थी। उस समय राजा वसंतराव ने निर्णय लिया था कि अलखनाथ अखाड़े में दोनों पक्षों की कुश्ती होगी, जो विजयी होगा उसकी बात मानी जाएगी।
उस समय ब्राह्मण परिवार के तीन सगे भाइयों ने प्रतियोगिता को जीता था। राजा ने उपहार स्वरूप उन्हें गुलाबनगर का तिवारीपुरा दिया था। 457 वर्ष के इतिहास के पीछे वजह यह है कि समिति में युवाओं को भागीदार बनाया जाता है, जो परंपरा को आगे बढ़ाते हैं। इस समय भी पांच से दस युवा समिति में जुड़े हुए हैं। झारखंड के राज्यपाल संतोष गंगवार भी पूर्व में इस समिति के अध्यक्ष रह चुके हैं। उन्होंने 15 साल तक जिम्मेदारी निभाई।