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Bareilly News: बायो एक्टिव जाल के बाद अब वैज्ञानिकों ने बनाया बोन ग्लू
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बरेली। दुर्घटना में घायल पशुओं की हड्डियों को जोड़ने के लिए अब प्लेट, रॉड या पेच लगाने की जरूरत नहीं होगी। भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (आईवीआरआई) के वैज्ञानिकों ने बायो एक्टिव जाल के बाद अब बोन ग्लू तैयार किया है। दस किलो से कम वजन वाले 30 पशुओं पर इसका परीक्षण सफल रहा।
सर्जरी डिवीजन की प्रधान वैज्ञानिक डॉ. रेखा पाठक के मुताबिक, बोन ग्लू में हड्डी को जोड़ने वाले सहायक तत्व के तौर पर भैंस के ऊतकों का इस्तेमाल किया गया है। हड्डी के कई खंड में टूटने पर उसके टुकड़ों को जोड़ने में कठिनाई होती है। रेफरल पॉलीक्लीनिक में ऐसे कई मामले आते हैं। ऐसी स्थिति में बोन ग्लू कारगर साबित होने की उम्मीद है। फील्ड ट्रायल के तौर पर 30 पशुओं की हड्डियां जोड़कर देख चुके हैं। यह ग्लू जख्मी स्थान पर लेप लगाने के बाद ठोस हो जाता है।
डॉ. रेखा के मुताबिक जम्मू और जबलपुर के पशु चिकित्सा कॉलेजों में इसका प्रयोग रहा। शोध कार्य तीन चरणों में पूरा हुआ। पहला वैकल्पिक हड्डी तैयार कर दूसरे चरण में बायो एक्टिव जाल बनाया, जो हार्निया के इलाज में कारगर रहा। तीसरे चरण में बोन ग्लू बनाया गया है। ब्यूरो
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सर्जरी डिवीजन की प्रधान वैज्ञानिक डॉ. रेखा पाठक के मुताबिक, बोन ग्लू में हड्डी को जोड़ने वाले सहायक तत्व के तौर पर भैंस के ऊतकों का इस्तेमाल किया गया है। हड्डी के कई खंड में टूटने पर उसके टुकड़ों को जोड़ने में कठिनाई होती है। रेफरल पॉलीक्लीनिक में ऐसे कई मामले आते हैं। ऐसी स्थिति में बोन ग्लू कारगर साबित होने की उम्मीद है। फील्ड ट्रायल के तौर पर 30 पशुओं की हड्डियां जोड़कर देख चुके हैं। यह ग्लू जख्मी स्थान पर लेप लगाने के बाद ठोस हो जाता है।
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डॉ. रेखा के मुताबिक जम्मू और जबलपुर के पशु चिकित्सा कॉलेजों में इसका प्रयोग रहा। शोध कार्य तीन चरणों में पूरा हुआ। पहला वैकल्पिक हड्डी तैयार कर दूसरे चरण में बायो एक्टिव जाल बनाया, जो हार्निया के इलाज में कारगर रहा। तीसरे चरण में बोन ग्लू बनाया गया है। ब्यूरो
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