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एक औरत जो खुद कहानी बन गई

Sat, 23 Jan 2016 01:07 AM IST
बरेली
बरेली Updated Sat, 23 Jan 2016 01:07 AM IST
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A woman who became a story itself
असली और नकली पति के बीच उलझी कहानी है नाग मंडल। जो एक औरत के इर्द गिर्द घूमती है। जो अपनी कहानी बताते-बताते खुद एक कहानी बन जाती है।
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गिरीश करनाड के लिखे नाटक नाग मंडल की कहानी रूहों से शुरू होती है। उन्हीं के बीच एक महिला की रूह अपनी कहानी सुनाती है। इसमें निर्देशक ने प्रस्तुतिकरण के एतबार से एक महिला के दो रूप को दिखाने के लिए एक महिला के स्थान पर दो महिलाओं को लिया है। एक रूप घरेलू होता है तो दूसरा कल्पना में। उसे अपने पति के प्रेम की उम्मीद होती है।
दरसअसल पति अपनी नव विवाहिता पत्नी को शुरू से नजरअंदाज करता है। दो-दो रोज घर के बाहर रहता है। आता भी है तो दिन में और रात कहीं और गुजारता है। इसी बीच एक भिखारी महिला (ताई) उस नई ब्याही महिला के घर मिलने आती है। तब उसे पता चलता है कि उसका पति उसे नजरअंदाज कर रहा है। वह बूटी देकर उसे पीस कर खिलाने की बात कहती है। पत्नी बूटी उसे दूध में पिला देती है। उसे पीकर पति बेहोश हो जाता है, मगर उस पर प्रेम का कोई असर नहीं होता।
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कुछ दिनों बाद ताई फिर आती है। पता चलता है कि उसकी बूटी का असर नहीं हुआ तो वह और शक्तिशाली बूटी देकर खिलाने को कह जाती है। पत्नी उस दवा पीस कर तैयार करती है, मगर उसे लगता है कि एक बार पति बेहोश हो चुका है। इस कहीं कुछ और न हो जाए। इस ख्याल से वह दवा सांप (शेष नाग)  के बिल में डाल देती है। उसका शेष नाग पर असर हो जाता है और वह उस महिला के पास पुरुष के रूप में आता है।  
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यहां पर महिला की अपनी कल्पना कहें यह मानेे की उसके पति के ही रूप में वह आता है। यहां कहानी में थोड़ा धुंधलापन है। बहरहाल कहानी आगे बढ़ती है और महिला उस शेष नाग को पति समझ कर उसके स्पर्श में जाती है। उससे गर्भवती भी हो जाती है। इसका उसके पति को पता चलता है तो वह बताती है यह तुम्हारा ही अंश है। मगर पति इस बात को गांव की पंचायत में ले जाता है। जहां महिला को शेषनाग की परीक्षा में लाया जाता है। तब नाग उसके सिर पर बैठ जाता है। इस करिश्मे को देख गांव के लोग उसे देवी मान लेते हैं। इस तरह उसकी परीक्षा पूरी होती है।
असल में इस कहानी को यहीं पर पूरा कर दिया गया है मगर यह आगे तक जाती है। जहां वह पति के साथ तो रहने लगती है मगर नाग उकसे बालों में फूल बन कर अपना बसेरा बना लेता है। एक दिन पति के सामने इसका राज भी खुलता है। कुल मिलाकर डा. नीलम मान सिंह चौधरी के निर्देशन में मंचित नाटक का प्रस्तुतिकरण शानदार रहा। कहानी बेहद उलझी और पंजाबी भाषा में होने के बावजूद दर्शकों को बांधने में सफल रहती है। नाटक में संगीत का भरपूर इस्तेमाल किया गया है। इसके गीत बेहद प्रभावशाली है जो नाटक को गीत देने और संवारने में अहम भूमिका निभाते हैं। प्रकाश और वेश भूषा सुंदर और पूरी तरह नाटक की कहानी और पात्रों के अनुरूप रही।

अंत में मुख्य अतिथि आईजी विजय सिंह मीना ने नाटक निर्देशक डा. नीलम मान सिंह को शाल और बुके के साथ सम्मानित किया। डा. ब्रजेश्वर सिंह ने आभार व्यक्त किया। संचालन शिखा सिंह ने किया।
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