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बदायूं में कभी नहीं चल पाई गठबंधन की गाड़ी
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बदायूं। बदायूं लोकसभा क्षेत्र से इस बार भाजपा प्रत्याशी ने जीत हासिल की है, जबकि गठबंधन प्रत्याशी धर्मेंद्र यादव को हार का सामना करना पड़ा। वर्ष 1996 से सपा का खड़ा किला इस बार मोदी की सुनामी में ढह गया। धर्मेंद्र की हार के कारणों के पीछे हर व्यक्ति अपने कयास लगा रहा है, लेकिन राजनीतिक जानकारों का यह भी कहना है कि यहां गठबंधन होना भी उनकी हार का एक कारण रहा है। पिछले दो चुनाव का ही रिकॉर्ड उठाकर देखें तो यहां किसी भी पार्टी का गठबंधन कामयाब नहीं हो पाया।
लोकसभा चुनाव में इस बार भाजपा से डॉ. संघमित्रा मौर्य, कांग्रेस से सलीम शेरवानी व गठबंधन से धर्मेंद्र यादव मैदान में थे। हालांकि मुख्य मुकाबला भाजपा व गठबंधन में ही माना जा रहा था, लेकिन कांग्रेस भी इसे त्रिकोणीय बनाए हुए थी। धर्मेंद्र जहां अपने पुराने कार्यकाल में कराए गए कामों को याद दिलाकर जनता को रिझाने का प्रयास कर रहे थे, वहीं संघमित्रा भी सरकार की योजनाओं को लेकर जनता के बीच थीं। अन्तत: जनता ने भाजपा प्रत्याशी के हाथ में विजय पताका थमा दी और गठबंधन के धर्मेंद्र लगभग 18 हजार वोटों से हार गए। धर्मेंद्र की हार के कारणों को राजनीतिक जानकार अपनी-अपनी तरह से व्याख्या दे रहे हैं, लेकिन कुछ जानकारों का यह भी कहना है कि यहां से कभी गठबंधन प्रत्याशी जीत नहीं पाया।
2009 : चौथे नंबर पर रहा था गठबंधन प्रत्याशी
- ज्यादा पुराने समय पर न जाकर यदि वर्ष 2009 का ही जिक्र करें तो यहां भाजपा ने जद यू से गठबंधन किया था। तब सपा से धर्मेंद्र यादव, बसपा से डीपी यादव, कांग्रेस से सलीम शेरवानी और भाजपा-जदयू गठबंधन से डीके भारद्वाज प्रत्याशी थे। इस चुनाव में धर्मेंद्र यादव विजयी हुए थे, जबकि गठबंधन प्रत्याशी भारद्वाज को कड़ी हार का सामना करना पड़ा था और वे 74079 वोट पाकर चौथे स्थान पर रहे थे।
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2014 : जमानत तक जब्त हो गई थी गठबंधन प्रत्याशी की
- वर्ष 2014 के चुनाव में कांग्रेस ने महानदल से गठबंधन किया और पगलानंद को मैदान में उतारा। इस चुनाव में पगलानंद की करारी हार हुई और उनकी जमानत तक जब्त हो गई। उन्हें केवल 5748 वोट ही मिल पाए थे। इसमें भी सपा के धर्मेंद्र विजयी हुए थे।
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लोकसभा चुनाव में इस बार भाजपा से डॉ. संघमित्रा मौर्य, कांग्रेस से सलीम शेरवानी व गठबंधन से धर्मेंद्र यादव मैदान में थे। हालांकि मुख्य मुकाबला भाजपा व गठबंधन में ही माना जा रहा था, लेकिन कांग्रेस भी इसे त्रिकोणीय बनाए हुए थी। धर्मेंद्र जहां अपने पुराने कार्यकाल में कराए गए कामों को याद दिलाकर जनता को रिझाने का प्रयास कर रहे थे, वहीं संघमित्रा भी सरकार की योजनाओं को लेकर जनता के बीच थीं। अन्तत: जनता ने भाजपा प्रत्याशी के हाथ में विजय पताका थमा दी और गठबंधन के धर्मेंद्र लगभग 18 हजार वोटों से हार गए। धर्मेंद्र की हार के कारणों को राजनीतिक जानकार अपनी-अपनी तरह से व्याख्या दे रहे हैं, लेकिन कुछ जानकारों का यह भी कहना है कि यहां से कभी गठबंधन प्रत्याशी जीत नहीं पाया।
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2009 : चौथे नंबर पर रहा था गठबंधन प्रत्याशी
- ज्यादा पुराने समय पर न जाकर यदि वर्ष 2009 का ही जिक्र करें तो यहां भाजपा ने जद यू से गठबंधन किया था। तब सपा से धर्मेंद्र यादव, बसपा से डीपी यादव, कांग्रेस से सलीम शेरवानी और भाजपा-जदयू गठबंधन से डीके भारद्वाज प्रत्याशी थे। इस चुनाव में धर्मेंद्र यादव विजयी हुए थे, जबकि गठबंधन प्रत्याशी भारद्वाज को कड़ी हार का सामना करना पड़ा था और वे 74079 वोट पाकर चौथे स्थान पर रहे थे।
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2014 : जमानत तक जब्त हो गई थी गठबंधन प्रत्याशी की
- वर्ष 2014 के चुनाव में कांग्रेस ने महानदल से गठबंधन किया और पगलानंद को मैदान में उतारा। इस चुनाव में पगलानंद की करारी हार हुई और उनकी जमानत तक जब्त हो गई। उन्हें केवल 5748 वोट ही मिल पाए थे। इसमें भी सपा के धर्मेंद्र विजयी हुए थे।