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नोटा की भी हवा है फिजा में
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नोटा की भी हवा है फिजा में
- फोटो : अमर उजाला, बरेली
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बरेली। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद 27 सितंबर 2013 को भारतीय नागरिकों को ‘नोटा’ का अधिकार मिला और अगले कुछ ही सालों में ‘नोटा’ देश के कई राजनीतिक दलों के समानांतर खड़ा हो गया। 2017 में उत्तर प्रदेश समेत पांच राज्यों में हुए चुनाव में नोटा ने पहली बार अपनी धमक दिखाई। इसके बाद 2018 में भी कई राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में जब ‘नोटा’ के खाते में आए वोट कई दलों को मिले वोटों से कहीं ज्यादा निकले तो साबित हो गया कि देश के मतदाताओं को जिस मंशा से यह महत्वपूर्ण अधिकार दिया गया है, आने वाले वक्त में वह उसे पूरा करके दिखाएगा। नोटा की हवा इस बार भी चुनावी फिजा में है। लिहाजा यह उम्मीद करने में कहीं कोई संदेह नजर नहीं आता कि नोटा एक बार फिर राजनीतिक दलों को यह हिसाब लगाने पर मजबूर करेगा कि जनता की अपेक्षाओं खरा न उतरना उन्हें कितना भारी पड़ा है।
नोटा यानी ‘इन उम्मीदवारों में से कोई नहीं’। अमेरिका में यह प्रयोग पहली बार 1978 में किया गया था। भारत में निर्वाचन आयोग की ओर से 2009 में सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दी गई कि मतदाता को ‘कोई नहीं’ का विकल्प चुनने का अधिकार दिया जाए ताकि उन्हें अयोग्य उम्मीदवारों को खारिज करने का अधिकार मिल सके। हालांकि सरकार नोटा के पक्ष में नहीं थी। नोटा की पैरवी पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टी नाम के एक गैरसरकारी संगठन ने की। आखिरकार 27 सितंबर 2013 को सुप्रीम कोर्ट ने नोटा को लागू करने का आदेश जारी कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि नोटा का विकल्प दिए जाने से चुनाव में सकारात्मक परिवर्तन होगा जो राजनीतिक दलों को बेहतर उम्मीदवार चुनाव में उतारने के लिए मजबूर करेगा। आपराधिक और अनैतिक पृष्ठभूमि वाले लोगों के पास चुनाव लड़ने से बचने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा क्योंकि नोटा के जरिये मतदाता उन्हें अस्वीकार कर सकेंगे। चुनाव आयोग की व्यवस्था के मुताबिक अगर नोटा को पड़े वोटों की संख्या सर्वाधिक वोट पाने वाले उम्मीदवार से ज्यादा होगी तो उस निर्वाचन क्षेत्र में दोबारा चुनाव कराया जाएगा। हालांकि नोटा के कई नकारात्मक प्रभाव सामने आने के बाद यह विकल्प देने वाले कई देश अब इसे खत्म कर चुके हैं।
दो राज्यों के चुनाव नतीजों ने भाजपा को दिया झटका
सितंबर 2013 यानी बमुश्किल पांच साल पहले ईवीएम का हिस्सा बनने वाले नोटा ने 2018 में ही पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में अपनी ताकत दिखाकर बड़े उलटफेर कर दिए। इन पांचों राज्यों में नोटा के खाते में अच्छे-खासे वोट गए। चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक मध्यप्रदेश में 1.4 प्रतिशत, राजस्थान में दो प्रतिशत, तेलंगाना में 1.1 प्रतिशत, मिजोरम में 0.5 प्रतिशत और मिजोरम में 2917 वोट नोटा को मिले। राजस्थान और मध्य प्रदेश में भाजपा और कांग्रेस को मिले वोटों का अंतर नोटा को मिले वोटों से कम था। यानी दोनों राज्यों में लाखों मतदाताओं ने भाजपा और कांग्रेस में से किसी को नहीं चुना। भाजपा इस नतीजे से सकते में थी।
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बरेली मंडल में भी असरदार होता गया नोटा
2014 के लोकसभा चुनाव में नोटा सिर्फ एक साल का हुआ था, लेकिन इसके बावजूद उसने बरेली मंडल में भी अच्छी-खासी धमक दिखाई। बरेली संसदीय क्षेत्र नोटा का बटन दबाने वाले मतदाताओं की संख्या 0.66 प्रतिशत थी। यहां कुल 1662880 लोगों ने मतदान किया था। नोटा के पक्ष में सर्वाधिक मतदान बरेली मंडल के पीलीभीत संसदीय क्षेत्र में हुआ था जहां मेनका गांधी जैसी चर्चित राजनीतिक हस्ती चुनाव मैदान में थी। यहां 1.10 प्रतिशत मतदाताओं ने मतदान किया था। मतदान करने वालों की कुल संख्या 1669835 थी। यानी नोटा पर 17 हजार से ज्यादा लोगों ने वोट डाला था। आंवला संसदीय क्षेत्र में भी नोटा पर 1.05 प्रतिशत मतदाताओं ने नोटा पर अपना वोट डाला। यहां मतदान करने वालों की कुल संख्या 1652063 थी। बदायूं में नोटा का प्रतिशत सबसे कम 0.61 रहा। यहां मतदान 1767738 लोगों ने किया था। इसके अलावा शाहजहांपुर संसदीय क्षेत्र में 0.88 प्रतिशत मतदाताओं ने नोटा के पक्ष में मतदान किया। यहां मतदान करने वाले लोगों की कुल संख्या मंडल में सर्वाधिक 1978119 रही थी।
बड़े उलटफेर कर बिगाड़ दिए नतीजे
1- उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2017 में नोटा पर कुल मिलाकर 0.9 प्रतिशत यानी करीब 7.58 लाख वोट पड़े, यह संख्या इस राज्य में सीपीआई, एआईएमआईएम और बीएमयूपी जैसे दलों को कुल मिले वोटों से भी ज्यादा थी।
2- मटेरा विधानसभा सीट पर इस चुनाव में समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार यासर शाह ने भाजपा उम्मीदवार को 1595 वोटों से हराया जबकि इस क्षेत्र के नोटा 2717 मतदाताओं ने नोटा पर मतदान किया। मुबारकपुर में बसपा उम्मीदवार 688 वोटों से जीता जबकि यहां नोटा पर 1628 वोट पड़े। श्रावस्ती में जीत का अंतर 445 था जबकि नोटा पर इससे करीब दस गुना ज्यादा 4289 वोट पड़े थे।
3- सशस्त्र बल विशेषाधिकार यानी अफस्पा के खिलाफ 16 साल तक भूख हड़ताल कर चर्चित हुई मणिपुर की मानवाधिकार कार्यकर्ता इरोम शर्मिला ने 2017 में ही विधानसभा चुनाव लड़ा तो उन्हें सिर्फ 90 वोट मिले जबकि नोटा का बटन दबाने वालों की संख्या 143 थी।
4- उत्तराखंड में 2017 में ही हुए विधानसभा चुनाव में नोटा पर एक प्रतिशत वोट पड़े। यह संख्या 50408 थी। इतने वोट हासिल कर नोटा इस राज्य में भाजपा, कांग्रेस और बसपा के बाद चौथे नंबर पर रहा था। नोटा ने ऐसा ही कमाल पंजाब, मणिपुर और गोवा में भी दिखाया।
5- 2018 में मध्य प्रदेश, राजस्थान और तेलंगाना के विधानसभा चुनाव में भी नोटा जमकर लड़ा। मध्यप्रदेश में 1.5 प्रतिशत मतदाताओं ने नोटा अपनाया जबकि सपा को इस राज्य में एक और आप को 0.7 फीसदी वोट ही मिल सके। राजस्थान माकपा को 1.3 प्रतिशत और सपा को 0.2 प्रतिशत वोट मिले जबकि नोटा के खाते 1.3 प्रतिशत वोट आए। तेलंगाना में माकपा और भाकपा को 0.4 प्रतिशत और राकांपा को 0.2 प्रतिशत वोट ही मिले। नोटा को 1.1 प्रतिशत लोगों ने पसंद किया।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी प्रचार-प्रसार नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि ‘नोटा’ का अच्छी तरह प्रचार-प्रसार किया जाए ताकि मतदान प्रतिशत बढ़े मगर चुनाव आयोग ने इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए। जिले में 23 अप्रैल को मतदान है और प्रत्याशियों ने अपनी पूरी ताकत लगा रखी है। मतदान प्रतिशत बढ़ाने के लिए सरकारी मशीनरी ने भी पूरा जोर लगा दिया है, कहीं वाल पेंटिंग कराई गई है तो कहीं रैली निकाली जा रही है। मगर एक चीज जो प्रचार-प्रसार से गायब है, वह है.. ‘नोटा’। 27 सितंबर 2013 को सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि मतदान पसंद का विषय है। ऐसे में जिन लोगों को कोई प्रत्याशी पसंद नहीं है लेकिन वे मतदान करना चाहते हैं, अपने अधिकार से वंचित रह जाते हैं। उन्हें भी यह अधिकार मिलना चाहिए। इसके बाद ही चुनाव में ‘नोटा’ को शामिल किया गया। मगर न तो राजनीतिक दलों ने ही इसके प्रचार-प्रसार में रुचि ली और न ही जिला निर्वाचन कार्यालय ने। ऐसे में मतदान प्रतिशत बढ़ाने की मंशा पर सवाल खड़े होते नजर आ रहे हैं। पूरे शहर में जिला निर्वाचन कार्यालय की ओर से नोटा के प्रचार-प्रसार के लिए कोई होर्डिंग-बैनर आदि लगा नजर नहीं आ रहा है।
तुलाशेरपुर में नोटा पर वोट का एलान
तुलाशेरपुर वार्ड में विकास कार्य न कराने को लेकर वहां के लोग भी आक्रोशित हैं। इसको लेकर रविवार सात अप्रैल को पूर्वाह्न 11 बजे तुलाशेरपुर विकास समिति की बैठक बुलाई गई है। कहा गया है कि वे लोग इस बैठक में नोटा का इस्तेमाल करने को लेकर विचार विमर्श करेंगे।
बरेली में चल रही है जागरूकता की मुहिम
बरेली में मतदाताओं को नोटा के प्रति जागरूक कर मतदान प्रतिशत बढ़ाने की मुहिम शुरू हुई है। जागर और विकल्प संस्था ने फेसबुक पर मैं ‘नोटा’ हूं, के नाम से फेसबुक बनाया है। इस पर खबरों की कटिंग एवं अन्य माध्यमों से लोगों को चुनाव में भागीदारी करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। अब तक बहुत सारे लोग इस पेज से जुड़ भी चुके हैं। साथ ही इस संबंध में जिला निर्वाचन कार्यालय के माध्यम से चुनाव आयोग को ज्ञापन भी भेजा है। बता दें कि पिछले दिनों मिनी बाईपास की कुछ मोहल्लों और संजयनगर में लोगों ने विकास कार्य न होने पर चुनाव बहिष्कार की बात कही थी। मगर, इन लोगों के लिए नोटा भी विकल्प बन सकता है।
निराशा के माहौल में आशा की किरण है नोटा
मतदान सभी का अधिकार है, चाहें उन्हें कोई प्रत्याशी पसंद नहीं हो। हम उन लोगों के बीच भी जाएंगे, जो मतदान का बहिष्कार कर रहे हैं। मेरा मकसद है कि लोग अपने मताधिकार का प्रयोग करें और वोट प्रतिशत बढ़े। - डॉ. प्रदीप कुमार
मेरा कहना है कि असहमति हमारा अधिकार है। नोटा का वोट राजनीतिक दलों को अच्छे प्रत्याशियों को उतारने के लिए बाध्य करेगा। हमारे आंदोलन की सफलता यही होगी कि हमें उसका प्रयोग न करना पड़े। - राजनारायण गुप्ता
नोटा की सुविधा का प्रचार-प्रसार जरूरी है ताकि सौ प्रतिशत मतदान हो सके। हम इसके लिए ही लोगों को जागरूक कर रहे हैं कि वे मतदान अवश्य करें, प्रत्याशी पसंद नहीं है तो नोटा का बटन दबाएं। - नवीन चोपड़ा
लोग सामने मौजूद प्रत्याशी का चयन करें और अगर प्रत्याशी पसंद नहीं है तो नोटा का इस्तेमाल करें। मगर ऐसा न हो कि प्रत्याशी पसंद न होने पर लोग मतदान में ही शामिल नहीं हो। यह जागरूकता इसीलिए है। - सत्यवीर सिंह
सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर उन लोगों को भी मतदान का अधिकार मिला है जो पसंद का प्रत्याशी न होने के चलते मतदान करने ही नहीं जाते थे। इससे वह अपने मतदान के मूल अधिकार से वंचित हो जाते थे। - विकास महर्षि
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नोटा यानी ‘इन उम्मीदवारों में से कोई नहीं’। अमेरिका में यह प्रयोग पहली बार 1978 में किया गया था। भारत में निर्वाचन आयोग की ओर से 2009 में सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दी गई कि मतदाता को ‘कोई नहीं’ का विकल्प चुनने का अधिकार दिया जाए ताकि उन्हें अयोग्य उम्मीदवारों को खारिज करने का अधिकार मिल सके। हालांकि सरकार नोटा के पक्ष में नहीं थी। नोटा की पैरवी पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टी नाम के एक गैरसरकारी संगठन ने की। आखिरकार 27 सितंबर 2013 को सुप्रीम कोर्ट ने नोटा को लागू करने का आदेश जारी कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि नोटा का विकल्प दिए जाने से चुनाव में सकारात्मक परिवर्तन होगा जो राजनीतिक दलों को बेहतर उम्मीदवार चुनाव में उतारने के लिए मजबूर करेगा। आपराधिक और अनैतिक पृष्ठभूमि वाले लोगों के पास चुनाव लड़ने से बचने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा क्योंकि नोटा के जरिये मतदाता उन्हें अस्वीकार कर सकेंगे। चुनाव आयोग की व्यवस्था के मुताबिक अगर नोटा को पड़े वोटों की संख्या सर्वाधिक वोट पाने वाले उम्मीदवार से ज्यादा होगी तो उस निर्वाचन क्षेत्र में दोबारा चुनाव कराया जाएगा। हालांकि नोटा के कई नकारात्मक प्रभाव सामने आने के बाद यह विकल्प देने वाले कई देश अब इसे खत्म कर चुके हैं।
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दो राज्यों के चुनाव नतीजों ने भाजपा को दिया झटका
सितंबर 2013 यानी बमुश्किल पांच साल पहले ईवीएम का हिस्सा बनने वाले नोटा ने 2018 में ही पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में अपनी ताकत दिखाकर बड़े उलटफेर कर दिए। इन पांचों राज्यों में नोटा के खाते में अच्छे-खासे वोट गए। चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक मध्यप्रदेश में 1.4 प्रतिशत, राजस्थान में दो प्रतिशत, तेलंगाना में 1.1 प्रतिशत, मिजोरम में 0.5 प्रतिशत और मिजोरम में 2917 वोट नोटा को मिले। राजस्थान और मध्य प्रदेश में भाजपा और कांग्रेस को मिले वोटों का अंतर नोटा को मिले वोटों से कम था। यानी दोनों राज्यों में लाखों मतदाताओं ने भाजपा और कांग्रेस में से किसी को नहीं चुना। भाजपा इस नतीजे से सकते में थी।
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बरेली मंडल में भी असरदार होता गया नोटा
2014 के लोकसभा चुनाव में नोटा सिर्फ एक साल का हुआ था, लेकिन इसके बावजूद उसने बरेली मंडल में भी अच्छी-खासी धमक दिखाई। बरेली संसदीय क्षेत्र नोटा का बटन दबाने वाले मतदाताओं की संख्या 0.66 प्रतिशत थी। यहां कुल 1662880 लोगों ने मतदान किया था। नोटा के पक्ष में सर्वाधिक मतदान बरेली मंडल के पीलीभीत संसदीय क्षेत्र में हुआ था जहां मेनका गांधी जैसी चर्चित राजनीतिक हस्ती चुनाव मैदान में थी। यहां 1.10 प्रतिशत मतदाताओं ने मतदान किया था। मतदान करने वालों की कुल संख्या 1669835 थी। यानी नोटा पर 17 हजार से ज्यादा लोगों ने वोट डाला था। आंवला संसदीय क्षेत्र में भी नोटा पर 1.05 प्रतिशत मतदाताओं ने नोटा पर अपना वोट डाला। यहां मतदान करने वालों की कुल संख्या 1652063 थी। बदायूं में नोटा का प्रतिशत सबसे कम 0.61 रहा। यहां मतदान 1767738 लोगों ने किया था। इसके अलावा शाहजहांपुर संसदीय क्षेत्र में 0.88 प्रतिशत मतदाताओं ने नोटा के पक्ष में मतदान किया। यहां मतदान करने वाले लोगों की कुल संख्या मंडल में सर्वाधिक 1978119 रही थी।
बड़े उलटफेर कर बिगाड़ दिए नतीजे
1- उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2017 में नोटा पर कुल मिलाकर 0.9 प्रतिशत यानी करीब 7.58 लाख वोट पड़े, यह संख्या इस राज्य में सीपीआई, एआईएमआईएम और बीएमयूपी जैसे दलों को कुल मिले वोटों से भी ज्यादा थी।
2- मटेरा विधानसभा सीट पर इस चुनाव में समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार यासर शाह ने भाजपा उम्मीदवार को 1595 वोटों से हराया जबकि इस क्षेत्र के नोटा 2717 मतदाताओं ने नोटा पर मतदान किया। मुबारकपुर में बसपा उम्मीदवार 688 वोटों से जीता जबकि यहां नोटा पर 1628 वोट पड़े। श्रावस्ती में जीत का अंतर 445 था जबकि नोटा पर इससे करीब दस गुना ज्यादा 4289 वोट पड़े थे।
3- सशस्त्र बल विशेषाधिकार यानी अफस्पा के खिलाफ 16 साल तक भूख हड़ताल कर चर्चित हुई मणिपुर की मानवाधिकार कार्यकर्ता इरोम शर्मिला ने 2017 में ही विधानसभा चुनाव लड़ा तो उन्हें सिर्फ 90 वोट मिले जबकि नोटा का बटन दबाने वालों की संख्या 143 थी।
4- उत्तराखंड में 2017 में ही हुए विधानसभा चुनाव में नोटा पर एक प्रतिशत वोट पड़े। यह संख्या 50408 थी। इतने वोट हासिल कर नोटा इस राज्य में भाजपा, कांग्रेस और बसपा के बाद चौथे नंबर पर रहा था। नोटा ने ऐसा ही कमाल पंजाब, मणिपुर और गोवा में भी दिखाया।
5- 2018 में मध्य प्रदेश, राजस्थान और तेलंगाना के विधानसभा चुनाव में भी नोटा जमकर लड़ा। मध्यप्रदेश में 1.5 प्रतिशत मतदाताओं ने नोटा अपनाया जबकि सपा को इस राज्य में एक और आप को 0.7 फीसदी वोट ही मिल सके। राजस्थान माकपा को 1.3 प्रतिशत और सपा को 0.2 प्रतिशत वोट मिले जबकि नोटा के खाते 1.3 प्रतिशत वोट आए। तेलंगाना में माकपा और भाकपा को 0.4 प्रतिशत और राकांपा को 0.2 प्रतिशत वोट ही मिले। नोटा को 1.1 प्रतिशत लोगों ने पसंद किया।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी प्रचार-प्रसार नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि ‘नोटा’ का अच्छी तरह प्रचार-प्रसार किया जाए ताकि मतदान प्रतिशत बढ़े मगर चुनाव आयोग ने इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए। जिले में 23 अप्रैल को मतदान है और प्रत्याशियों ने अपनी पूरी ताकत लगा रखी है। मतदान प्रतिशत बढ़ाने के लिए सरकारी मशीनरी ने भी पूरा जोर लगा दिया है, कहीं वाल पेंटिंग कराई गई है तो कहीं रैली निकाली जा रही है। मगर एक चीज जो प्रचार-प्रसार से गायब है, वह है.. ‘नोटा’। 27 सितंबर 2013 को सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि मतदान पसंद का विषय है। ऐसे में जिन लोगों को कोई प्रत्याशी पसंद नहीं है लेकिन वे मतदान करना चाहते हैं, अपने अधिकार से वंचित रह जाते हैं। उन्हें भी यह अधिकार मिलना चाहिए। इसके बाद ही चुनाव में ‘नोटा’ को शामिल किया गया। मगर न तो राजनीतिक दलों ने ही इसके प्रचार-प्रसार में रुचि ली और न ही जिला निर्वाचन कार्यालय ने। ऐसे में मतदान प्रतिशत बढ़ाने की मंशा पर सवाल खड़े होते नजर आ रहे हैं। पूरे शहर में जिला निर्वाचन कार्यालय की ओर से नोटा के प्रचार-प्रसार के लिए कोई होर्डिंग-बैनर आदि लगा नजर नहीं आ रहा है।
तुलाशेरपुर में नोटा पर वोट का एलान
तुलाशेरपुर वार्ड में विकास कार्य न कराने को लेकर वहां के लोग भी आक्रोशित हैं। इसको लेकर रविवार सात अप्रैल को पूर्वाह्न 11 बजे तुलाशेरपुर विकास समिति की बैठक बुलाई गई है। कहा गया है कि वे लोग इस बैठक में नोटा का इस्तेमाल करने को लेकर विचार विमर्श करेंगे।
बरेली में चल रही है जागरूकता की मुहिम
बरेली में मतदाताओं को नोटा के प्रति जागरूक कर मतदान प्रतिशत बढ़ाने की मुहिम शुरू हुई है। जागर और विकल्प संस्था ने फेसबुक पर मैं ‘नोटा’ हूं, के नाम से फेसबुक बनाया है। इस पर खबरों की कटिंग एवं अन्य माध्यमों से लोगों को चुनाव में भागीदारी करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। अब तक बहुत सारे लोग इस पेज से जुड़ भी चुके हैं। साथ ही इस संबंध में जिला निर्वाचन कार्यालय के माध्यम से चुनाव आयोग को ज्ञापन भी भेजा है। बता दें कि पिछले दिनों मिनी बाईपास की कुछ मोहल्लों और संजयनगर में लोगों ने विकास कार्य न होने पर चुनाव बहिष्कार की बात कही थी। मगर, इन लोगों के लिए नोटा भी विकल्प बन सकता है।
निराशा के माहौल में आशा की किरण है नोटा
मतदान सभी का अधिकार है, चाहें उन्हें कोई प्रत्याशी पसंद नहीं हो। हम उन लोगों के बीच भी जाएंगे, जो मतदान का बहिष्कार कर रहे हैं। मेरा मकसद है कि लोग अपने मताधिकार का प्रयोग करें और वोट प्रतिशत बढ़े। - डॉ. प्रदीप कुमार
मेरा कहना है कि असहमति हमारा अधिकार है। नोटा का वोट राजनीतिक दलों को अच्छे प्रत्याशियों को उतारने के लिए बाध्य करेगा। हमारे आंदोलन की सफलता यही होगी कि हमें उसका प्रयोग न करना पड़े। - राजनारायण गुप्ता
नोटा की सुविधा का प्रचार-प्रसार जरूरी है ताकि सौ प्रतिशत मतदान हो सके। हम इसके लिए ही लोगों को जागरूक कर रहे हैं कि वे मतदान अवश्य करें, प्रत्याशी पसंद नहीं है तो नोटा का बटन दबाएं। - नवीन चोपड़ा
लोग सामने मौजूद प्रत्याशी का चयन करें और अगर प्रत्याशी पसंद नहीं है तो नोटा का इस्तेमाल करें। मगर ऐसा न हो कि प्रत्याशी पसंद न होने पर लोग मतदान में ही शामिल नहीं हो। यह जागरूकता इसीलिए है। - सत्यवीर सिंह
सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर उन लोगों को भी मतदान का अधिकार मिला है जो पसंद का प्रत्याशी न होने के चलते मतदान करने ही नहीं जाते थे। इससे वह अपने मतदान के मूल अधिकार से वंचित हो जाते थे। - विकास महर्षि