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धर्मगुरु डराते हैं, सद्गुरु देते हैं अभयदान

Sun, 31 Mar 2019 01:40 AM IST
pawan chandra पवन चंद्रा
Updated Sun, 31 Mar 2019 01:40 AM IST
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धर्मगुरु डराते हैं, सद्गुरु देते हैं अभयदान
बरेली। ‘जिसकी संगत से अपराध कट जाएं, जो सहन करे और शिष्य में सहने की क्षमता विकसित करे और जिसमें समस्त ब्रह्म के दर्शन हों वही सद्गुरु है।’ इन्हीं आशीर्वचनों से शनिवार को संत मोरारी बापू ने श्रोताओं को अध्यात्म का ज्ञान कराया। उन्होंने कहा, जो डराते हैं वे धर्मगुरु हैं और जो अभयदान प्रदान करें वे सद्गुरु हैं। सद्गुरु का साथ न मिलने से ‘मानस अपराध’ का क्रम शुरू होता है।
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संत मोरारी बापू ने बताया कि साधु या फकीर सिर्फ जंगलों में नहीं होते, वे मकानों में भी हो सकते हैं। वह पैंट, शर्ट भी पहन सकते हैं, क्योंकि साधु की पहचान वस्त्र से नहीं, बल्कि निश्चल वाणी, शुद्ध तन और सात्विक मन से होती है। ये गुण दुर्लभ हैं, लेकिन ये कहीं भी और किसी में भी हो सकते हैं। इन गुणों को जगाने के लिए सद्गुरु का साथ होना चाहिए। उन्होंने बताया कि असुर में भी ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की भावना है तो वह भी साधु कहलाएगा। तमाम प्रयासों के बाद भी सद्गुरु का दर्शन और साथ न मिले तो प्रभु श्रीराम का नाम जपने से भी पाप कट जाते हैं। उन्होंने कहा कि असत्य और सत्य दोनों ही शब्दों के दो रूप हैं। असत्य का कवच शब्द होते हैं और सत्य का कवच साहस होता है। शब्दों का चुनाव बेहद सावधानी से करना चाहिए। दरअसल, वाणी ही व्यक्ति की पहचान और उसके मनोभावों का ज्ञान कराती है। सद्गुरु की पहचान बताने के बाद मोरारी बापू ने मानस अपराध के क्रम में ऊर्जा नष्ट करने को मानव अपराध बताया। उन्होंने कहा, जो व्यक्ति स्वयं की अथवा अन्य किसी की ऊर्जा नष्ट करने में सहायक बने, वह पाप का भागीदार बनता है।
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स्त्री की गलतियों को क्षमा करें
मोरारी बापू ने महाभारत का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि स्त्री से कोई अपराध हो जाए तो भी क्षमा कर देना चाहिए। द्रौपदी ने दुर्योधन का अपमान किया था, लेकिन श्रीकृष्ण ने क्षमा कर दिया। हालांकि, कर्मफल द्रौपदी को भोगना पड़ा। उन्होंने कहा कि स्त्री लक्ष्मी होती हैं, उनका स्वभाव चंचल होने से अपराध हो जाते हैं, लेकिन कर्मफल के बंधन से स्वयं लक्ष्मी और खुद प्रभु भी मुक्त नहीं है। श्रीराम ने वनवास की आज्ञा मिलने के बाद कहा था कि शायद मुझसे कोई अपराध हो गया था, इसलिए पिता ने वनवास दिया।
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सत्य, प्रेम और करुणा का हो रहा अपराध
मोरारी बापू ने कहा कि सत्य को अप्रिय बनाना, सत्य को न मानना और सत्यवादिता का अहंकार सत्य का अपराध है। प्रेम में मजबूर करना, प्रेम की तुलना करना, प्रेम में मेहरबानी का भाव प्रेम का अपराध है। करुणा में पक्षपात करना, मजबूरी में करुणा दिखाना, करुणा करने वाले को भूलना, करुणा का अपराध है। इन तीनों अपराधों से बचने वाले को साधु की संज्ञा दी जाती है। उन्होंने बताया कि पुष्पवाटिका में श्रीराम और जानकी के मिलन से युगलगीत, पुष्पगीत, भ्रमरगीत और गोपी गीत का उदय हुआ था।


भक्त का अपमान नहीं होने देते प्रभु
उन्होंने कहा कि द्रौपदी सभा में निर्वस्त्र हो जातीं तो लाज द्रौपदी की नहीं, बल्कि कृष्ण की जाती, क्योंकि प्रभु भक्त की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहते हैं। भूलवश किसी से भक्त का अपमान हो जाए तो वह प्रभु का अपमान होता है। बापू ने कहा कि खामियों के बाद भी द्रौपदी ने श्रीकृष्ण से शरण मांगी थी, इसलिए शरणागति होते ही उनके अपराध नष्ट हो गए। क्षमा, तेजस्वी का तेज, सत्य और जो क्षमा को जान गया, वह सर्वज्ञ हो जाता है। कथा में मोहता परिवार समेत सैकड़ों श्रद्धालु मौजूद रहे।
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