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पुआल जलाने से खराब हो रहा जिले का पर्यावरण

Mon, 07 Nov 2016 11:58 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो/बाराबंकी
अमर उजाला ब्यूरो/बाराबंकी Updated Mon, 07 Nov 2016 11:58 PM IST
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worsen environment of the district by burning straw
पुआल जलाने से खराब हो रहा जिले का पर्यावरण - फोटो : अमर उजाला

खेत में पुआल जलाने का सबसे ज्यादा असर जहां पर्यावरण प्रदूषण पर पड़ रहा है वहीं मिट्टी के उपजाऊ पोषक तत्व भी जलकर नष्ट हो रहे हैं इससे उपजाऊ भूमि के बंजर होने का खतरा बढ़ता जा रहा है। पिछले दो दिनों से आसमान में छाई धुंध के लिए पुआल जलाने को प्रमुख कारण माना जा रहा है। सोमवार को धुंध के कारण हाइवे पर विजिबिलिटी सिर्फ 500 मीटर के आसपास थी। इस कारण वाहनों की रफ्तार धीमी रही।

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जिले का ज्यादातर किसान जानकारी के अभाव में या फिर पुआल को नष्ट करने के लिए उसे खेतों में ही जला देता है। लेकिन किसान को यह नहीं पता है कि वह पुआल जलाकर एक ओर जहां पर्यावरण को प्रदूषित कर रहा है तो दूसरी ओर मिट्टी की उपजाऊ शक्ति को बंजर होने में तब्दील कर रहा है। कृषि विभाग की माने तो मिट्टी में जीवांश कार्बन वैक्टिरिया होते हैं जो पुआल को जलाने के साथ ही जलकर नष्ट हो जाते हैं। इसका असर फसलों के उत्पादन पर पड़ता है। पिछले दो दिनों से आसमान में छाई धुंध प्रदूषण का नतीजा बताई जा रही है। विभाग की माने तो बढ़ते प्रदूषण को देखते हुए सरकार इसे कानून के दायरे में लाने जा रही है जिससे ऐसा करने वाले किसानों को दंड़ित भी किया जा सके। 
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पुआल से बना सकते खाद 
किसान पुआल को खेत में जलाने के बजाए इसके छोटे-छोटे टुकडे़ कर खेत में फैला दें। इसके बाद 20 किलो प्रति हेक्टेयर की दर से यूरिया का छिड़काव कर खेत में जोताई कर पलट दे और पानी भर दे। यह खेत में सड़ कर खाद में तब्दील हो जाएगा। इसके अलावा किसान पुआल को एक गड्ढे में डाल दें इसके ऊपर गोबर और पानी डालकर ढक दें कुछ महीने बाद खोदाई करे बेहतर खाद निकलेगी जिसे खेत में प्रयोग किया जा सकता है। इसके अलावा पुआल को मवेशियों के चारे के रुप में भी इस्तेमाल किया जा सकता है। 
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दीवाली के बाद से छाई है धुंध
दीवाली के अगले ही दिन से ही बाराबंकी में धुंध का असर होने लगा है।  शनिवार की शाम को इसमें इजाफा हो गया। इसका मुख्य कारण खेतों में जलाई गई फसल के अलावा वाहनों से निकलने वाले धुआं, घरों से निकलने वाले कचरों के डंपिंग यार्ड में आग लगाना, दीवाली पर जलाए गए पटाखे आदि हैं।  बंद कमरों में भी हल्की हल्की धुंध का अहसास हो रहा है।

इससे सांस लेने में तकलीफ  होने पर लोग चाय या गर्म पानी का सहारा ले रहे हैं। जबकि इससे कहीं ज्यादा नुकसान स्मॉग के जहरीले कणों का फेफड़े से लेकर दिमाग तक पहुंचना है। सोमवार को हालात और ज्यादा खराब हो गए। दोपहर में हाईवे पर विजिबिलिटी सिर्फ 500 मीटर के आसपास थी।  इस कारण वाहनों की रफ्तार धीमी रही।


पुआल और डंठल को किसान खेतों में न जलाएं इसके लिए समय-समय पर किसानों को प्रशिक्षण दिया जाता है। किसानों के लिए जो गोष्ठियां आयोजित होती हैं उसमें भी इस बात की जानकारी दी जाती है। क्योंकि इससे मिट्टी के अंदर के जीवांश कार्बन वैक्टिरिया भी जल जाते है जिसका असर फसलों के उत्पादन पर पड़ता है। -डॉ. एसपी सिंह, उपकृषि निदेशक 

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