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Barabanki News: नियम के फेर में जा रही गंभीर घायलों की जान
Fri, 11 Jul 2025 01:06 AM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बाराबंकी
संवाद न्यूज एजेंसी, बाराबंकी
Updated Fri, 11 Jul 2025 01:06 AM IST
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बाराबंकी। सड़क हादसों में घायल होने वाले अधिकांश लोगों की जान समय पर उचित इलाज न मिल पाने के कारण जा रही है। जिन घायलों की जान समय पर 20 से 30 किमी दूर लखनऊ ले जाकर बचाई जा सकती है, उन्हें नियम की फेर में फंस कर कागजी रस्म अदायगी में ही ढाई से तीन घंटे लग जाते हैं। ऐसे गंभीर लोगों को सीएचसी से सीधे लखनऊ रेफर न कर पहले जिला अस्पताल लाकर दूसरा रेफर लैटर बनवाने के साथ एंबुलेंस भी बदलना पड़ती है।
इस पूरी प्रक्रिया में लगने वाले समय के कारण अधिकांश घायलों को अपनी जान रास्ते में ही गंवानी पड़ रही है। प्रक्रिया पूरी होने तक पहले वाली एबुलेंस मरीज को लिए खड़ी रहती है, भले ही मरीज की सांस ही क्यों न उखड़ रही हो। चिकित्सकों की माने तो हर माह हादसों में घायल होने वाले 10 से 15 लोगों की मौत रेफर किए जाने के नियम की फेर में फंस कर होती है।
देवा, कुर्सी, बड्डूपुर और शहर कोतवाली से सटे लखनऊ बॉर्डर पर हादसा होने के बाद घायलों को इलाज मिल पाने में काफी देर होती है। इन जगहों से गंभीर घायलों को पहले जिला अस्पताल लाया जाता है। यहां एबुंलेंस से उतारने के बाद उन्हें दूसरी एंबुलेंस से लखनऊ रेफर किया जाता है। अफसोसजनक बात यह कि जो एंबुलेंस घायल को लेकर जिला अस्पताल आती, उसे लखनऊ नही ले जाया जाता। डॉक्टर दूसरी एंबुलेंस का इंतजाम करने के लिए तीमारदारों को ही 108 पर काल कर एंबुलेंस पर बुलाने की सलाह देकर किनारा कस लेते हैं। दूसरी एबुंलेंस आने व उससे घायल को लखनऊ के लोहिया अस्पताल ले जाने में करीब ढाई से तीन घंटा लग जाता है।
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इस संबंध में जिला अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. वीपी सिंह का कहना है कि गंभीर रूप से घायल को तत्काल लखनऊ ले जाने की व्यवस्था होनी चाहिए। सीएचसी व जिला अस्पताल तक जाने में उसकी हालात बिगड़ जाती है। एंबुलेंस बदलने की प्रक्रिया का नियम है। इसलिए उसका पालन करना पड़ रहा है।
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इस पूरी प्रक्रिया में लगने वाले समय के कारण अधिकांश घायलों को अपनी जान रास्ते में ही गंवानी पड़ रही है। प्रक्रिया पूरी होने तक पहले वाली एबुलेंस मरीज को लिए खड़ी रहती है, भले ही मरीज की सांस ही क्यों न उखड़ रही हो। चिकित्सकों की माने तो हर माह हादसों में घायल होने वाले 10 से 15 लोगों की मौत रेफर किए जाने के नियम की फेर में फंस कर होती है।
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देवा, कुर्सी, बड्डूपुर और शहर कोतवाली से सटे लखनऊ बॉर्डर पर हादसा होने के बाद घायलों को इलाज मिल पाने में काफी देर होती है। इन जगहों से गंभीर घायलों को पहले जिला अस्पताल लाया जाता है। यहां एबुंलेंस से उतारने के बाद उन्हें दूसरी एंबुलेंस से लखनऊ रेफर किया जाता है। अफसोसजनक बात यह कि जो एंबुलेंस घायल को लेकर जिला अस्पताल आती, उसे लखनऊ नही ले जाया जाता। डॉक्टर दूसरी एंबुलेंस का इंतजाम करने के लिए तीमारदारों को ही 108 पर काल कर एंबुलेंस पर बुलाने की सलाह देकर किनारा कस लेते हैं। दूसरी एबुंलेंस आने व उससे घायल को लखनऊ के लोहिया अस्पताल ले जाने में करीब ढाई से तीन घंटा लग जाता है।
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इस संबंध में जिला अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. वीपी सिंह का कहना है कि गंभीर रूप से घायल को तत्काल लखनऊ ले जाने की व्यवस्था होनी चाहिए। सीएचसी व जिला अस्पताल तक जाने में उसकी हालात बिगड़ जाती है। एंबुलेंस बदलने की प्रक्रिया का नियम है। इसलिए उसका पालन करना पड़ रहा है।