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राजनीतिक भविष्य दांव पर लगा तो दिग्गजों ने बदले दल
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बाराबंकी। विधानसभा चुनाव में टिकट वितरण के बाद शुरू हुए दल बदलने के खेल में जिले के पूर्व मंत्री रहे संग्राम सिंह वर्मा और पूर्व विधायक राजलक्ष्मी वर्मा ने सपा का दामन थाम लिया। तो चार बार के विधायक मुलायम सिंह यादव के कभी खासमखास रहे छोटेलाल यादव भाजपा में शामिल हो गए। यह चुनाव परिणाम को कितना प्रभावित कर पाएंगे इससे ज्यादा चर्चा इनका राजनीतिक भविष्य को लेकर है।
चुनाव के बाद इनका क्या होगा इसे लेकर चर्चाएं तेज हैं। मजेदार बात यह है कि कई दलों में रहने वाले ये नेता इस बार उसी दल में गए हैं जिसमें अपने राजनीतिक करिअर के दौरान कभी नहीं रहे। वह अब उम्र के इस पड़ाव में अपनी सियासत की विरासत सौंपने की तैयारी में हैं।
बाराबंकी जिले में विधानसभा चुनाव के दौरान टिकट न मिलने के बाद कई दिग्गज नेताओं ने दल बदले हैं। इनमें प्रमुख रूप से बाराबंकी सीट पर आमने-सामने चुनाव लड़ने वाले संग्राम सिंह वर्मा और छोटेलाल यादव भी शामिल हैं। हालांकि दोनों नेता पहले भी दलबदल चुके हैं। किंतु इस बार दोनों जिस दल में शामिल हुए हैं उसी के खिलाफ अब तक संघर्ष करते रहे हैं।
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दोनों की अपनी सजातीय वोटों के साथ जिले और क्षेत्र में अच्छी पकड़ मानी जाती रही है। दोनों नेता उम्र के उस पड़ाव पर हैं जहां वह सियासत की विरासत अपने और अपनों को सौंपने के लिए संघर्ष कर रहे थे। भाजपा ने संग्राम सिंह के परिवार को टिकट देने का वादा भी किया था पर परिस्थितियों ऐसी बनी कि यह हो न सका।
और अंत में वह उस दल में शामिल हो गए जिस दल ने उन्हें बड़ा दुख दिया। वह कहते भी थे कि कहीं भी जाएंगे पर सपा में नहीं। यही हाल इनके धुर विरोधी रहे छोटेलाल का रहा। उनको भाजपा के खिलाफ संघर्ष ने ही एक अच्छे नेता के रूप में स्थापित होने का मुकाम दिया। पर जिस दल के सहारे उन्होंने लम्बी पारी खेली उसी दल पर ‘अब वह सपा नहीं रही’ का आरोप लगाकर भाजपा में शामिल हो गए।
रामनगर से पूर्व विधायक राजलक्ष्मी वर्मा सपा छोड़कर लगभग सभी प्रमुख दलों में अपना भविष्य आजमा चुकी हैं। सिर्फ सपा ही एक ऐसा दल था जिसमें वह नही रहीं। इस बार कांग्रेस से टिकट न मिलने पर सपा का दामन थाम लिया है। वैसे तो चुनाव के समय दलबदल का चलन पुराना रहा है, राजनीति में आस्थाएं स्थायी नहीं होतीं।
किंतु इस बार यह तीनों नेता जिस दल में गए हैं इनको कितना लाभ दे पाएंगे यह तो 10 मार्च का चुनाव परिणाम से तय होगा। वरिष्ठ पत्रकार मोहम्मद नवाब इन लोगों के दलबदल पर कहते हैं कि सिर्फ कृष्ण बिहारी नूर की दो लाइनें ‘बुझी न प्यास तो खत्म जिंदगी कर ली, नदी ने जाकर समंदर में खुदकुशी कर ली’ सुनाकर पूरी राजनीति की हकीकत बयां की है। (संवाद)
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चुनाव के बाद इनका क्या होगा इसे लेकर चर्चाएं तेज हैं। मजेदार बात यह है कि कई दलों में रहने वाले ये नेता इस बार उसी दल में गए हैं जिसमें अपने राजनीतिक करिअर के दौरान कभी नहीं रहे। वह अब उम्र के इस पड़ाव में अपनी सियासत की विरासत सौंपने की तैयारी में हैं।
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बाराबंकी जिले में विधानसभा चुनाव के दौरान टिकट न मिलने के बाद कई दिग्गज नेताओं ने दल बदले हैं। इनमें प्रमुख रूप से बाराबंकी सीट पर आमने-सामने चुनाव लड़ने वाले संग्राम सिंह वर्मा और छोटेलाल यादव भी शामिल हैं। हालांकि दोनों नेता पहले भी दलबदल चुके हैं। किंतु इस बार दोनों जिस दल में शामिल हुए हैं उसी के खिलाफ अब तक संघर्ष करते रहे हैं।
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दोनों की अपनी सजातीय वोटों के साथ जिले और क्षेत्र में अच्छी पकड़ मानी जाती रही है। दोनों नेता उम्र के उस पड़ाव पर हैं जहां वह सियासत की विरासत अपने और अपनों को सौंपने के लिए संघर्ष कर रहे थे। भाजपा ने संग्राम सिंह के परिवार को टिकट देने का वादा भी किया था पर परिस्थितियों ऐसी बनी कि यह हो न सका।
और अंत में वह उस दल में शामिल हो गए जिस दल ने उन्हें बड़ा दुख दिया। वह कहते भी थे कि कहीं भी जाएंगे पर सपा में नहीं। यही हाल इनके धुर विरोधी रहे छोटेलाल का रहा। उनको भाजपा के खिलाफ संघर्ष ने ही एक अच्छे नेता के रूप में स्थापित होने का मुकाम दिया। पर जिस दल के सहारे उन्होंने लम्बी पारी खेली उसी दल पर ‘अब वह सपा नहीं रही’ का आरोप लगाकर भाजपा में शामिल हो गए।
रामनगर से पूर्व विधायक राजलक्ष्मी वर्मा सपा छोड़कर लगभग सभी प्रमुख दलों में अपना भविष्य आजमा चुकी हैं। सिर्फ सपा ही एक ऐसा दल था जिसमें वह नही रहीं। इस बार कांग्रेस से टिकट न मिलने पर सपा का दामन थाम लिया है। वैसे तो चुनाव के समय दलबदल का चलन पुराना रहा है, राजनीति में आस्थाएं स्थायी नहीं होतीं।
किंतु इस बार यह तीनों नेता जिस दल में गए हैं इनको कितना लाभ दे पाएंगे यह तो 10 मार्च का चुनाव परिणाम से तय होगा। वरिष्ठ पत्रकार मोहम्मद नवाब इन लोगों के दलबदल पर कहते हैं कि सिर्फ कृष्ण बिहारी नूर की दो लाइनें ‘बुझी न प्यास तो खत्म जिंदगी कर ली, नदी ने जाकर समंदर में खुदकुशी कर ली’ सुनाकर पूरी राजनीति की हकीकत बयां की है। (संवाद)