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भाजपा का पहली बार कब्जा, सपा का किला ढहा
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बाराबंकी। जिले की सबसे बड़ी पंचायत जिला पंचायत के मुखिया के पद पर भाजपा ने पहली बार जीत का स्वाद चखा है। भारी मतों से जीत के पीछे कुशल प्रबंधन और विपक्षी दलों का बिखराव सत्ता पक्ष के काम आया। सत्ता की हनक व धमक या कोई अन्य कारण, इस चुनाव में 12 जिला पंचायत सदस्य जिताने वाली भाजपा को 48 वोट मिले।
इन मतों में भाकियू, बसपा से लेकर भाजपा के धुर विरोधी विचारधारा वाले कई सदस्य खुलेआम उनके पाले में खड़े दिखाई दिए। भाजपा ने इस सीट पर कब्जा करने को लेकर साम-दाम, दंड-भेद सबका प्रयोग किया। तो मुख्य विरोधी सपा के नेताओं ने फोटो खिंचवाने में तो एका दिखाया पर भीतर ही भीतर गुटबाजी जारी रही। जिसका नतीजा यह रहा कि वह मुख्य मुकाबले में नहीं दिखी।
बाराबंकी में जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी पर अभी तक कांग्रेस, सपा और बसपा का कब्जा रहा है। भाजपा कई बार प्रदेश की सत्ता में रहने के बावजूद भी इस कुर्सी पर अपना प्रबल दावा कभी पेेश नहीं कर सकी। पहली बार भाजपा ने ऐतिहासिक और बड़ी जीत के साथ जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी पर कब्जा कर लिया है।
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कई दिनों से चल रही उठापटक में सपा और भाजपा के बीच सह-मात का खेल जारी था। भाजपा 12 और सपा 11 जिला पंचायत सदस्य ही जिता पाई थी। अन्य सीटों पर बसपा, भाकियू, निर्दलीयों का कब्जा था। दोनों दल अपनी-अपनी जीत का दावा ठोंक रहे थे। चुनाव घोषित होने के बाद भाजपा ने पूर्व विधायक राजरानी रावत को तो सपा ने भाजपा की बागी हुई डीडीसी चुनी गईं नेहा आनंद पर दांव लगाया था।
सत्ता की हनक धमक के साथ ही भाजपा ने चुनाव की पूरी कमान पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष के पति और जोड़तोड़ में माहिर सुरेंद्र सिंह व भाजपा जिलाध्यक्ष अवधेश श्रीवास्तव को सौंपी। उनकी टीम ने सदस्यों से संपर्क साध कर जीत का आंकड़ा ही नहीं बल्कि 57 में 48 वोट भाजपा प्रत्याशी को दिलाने में सफल रहे।
उधर, सपा की घोषित प्रत्याशी को लेकर एक राय नहीं बन पा रही थी। हाईकमान के निर्देश पर पार्टी के दिग्गज नेता एकसाथ फोटो खिंचवाते तो दिखाई पड़े पर पुरानी गुटबाजी में एक दूसरे को नीचा दिखाने का खेल जारी रहा। इसी का नतीजा है कि पिछले चुनाव में निर्विरोध चुनाव जीतने वाली सपा अपनी पार्टी के सदस्यों को क्रॉस वोटिंग करने से नहीं रोक पाई।
अब तक यह रहे जिला पंचायत अध्यक्ष
जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी पर वर्ष 1952 से 1975 तक महंत जगन्नाथ बख्श दास का कब्जा रहा। 1975 से 1989 तक जिलाधिकारी बतौर प्रशासक के रूप में रहे। सपा के देव नारायण सिंह 1989 से 1995 तक जिला पंचायत अध्यक्ष रहे। वर्ष 1995 में हुए चुनाव में सपा के रामगोपाल रावत इस सीट पर काबिज हुए और वर्ष 2000 तक जिला पंचायत अध्यक्ष रहे।
वर्ष 2000 में हुए चुनाव में सपा की कुसुम सिंह काबिज हुईं। वर्ष 2006 में हुए चुनाव में यह सीट बसपा के पाले में चली गई और इस सीट पर पूर्व ब्लॉक प्रमुख सुरेंद्र सिंह की पत्नी शीला सिंह का कब्जा रहा। वर्ष 2016 में हुए चुनाव में सपा के पूर्व मंत्री अरविंद सिंह गोप के भाई अशोक सिंह काबिज रहे। अब यह सीट भाजपा ने सपा से छीन ली है। इस सीट पर राजरानी ने पहली बार भगवा फहराया है।
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इन मतों में भाकियू, बसपा से लेकर भाजपा के धुर विरोधी विचारधारा वाले कई सदस्य खुलेआम उनके पाले में खड़े दिखाई दिए। भाजपा ने इस सीट पर कब्जा करने को लेकर साम-दाम, दंड-भेद सबका प्रयोग किया। तो मुख्य विरोधी सपा के नेताओं ने फोटो खिंचवाने में तो एका दिखाया पर भीतर ही भीतर गुटबाजी जारी रही। जिसका नतीजा यह रहा कि वह मुख्य मुकाबले में नहीं दिखी।
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बाराबंकी में जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी पर अभी तक कांग्रेस, सपा और बसपा का कब्जा रहा है। भाजपा कई बार प्रदेश की सत्ता में रहने के बावजूद भी इस कुर्सी पर अपना प्रबल दावा कभी पेेश नहीं कर सकी। पहली बार भाजपा ने ऐतिहासिक और बड़ी जीत के साथ जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी पर कब्जा कर लिया है।
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कई दिनों से चल रही उठापटक में सपा और भाजपा के बीच सह-मात का खेल जारी था। भाजपा 12 और सपा 11 जिला पंचायत सदस्य ही जिता पाई थी। अन्य सीटों पर बसपा, भाकियू, निर्दलीयों का कब्जा था। दोनों दल अपनी-अपनी जीत का दावा ठोंक रहे थे। चुनाव घोषित होने के बाद भाजपा ने पूर्व विधायक राजरानी रावत को तो सपा ने भाजपा की बागी हुई डीडीसी चुनी गईं नेहा आनंद पर दांव लगाया था।
सत्ता की हनक धमक के साथ ही भाजपा ने चुनाव की पूरी कमान पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष के पति और जोड़तोड़ में माहिर सुरेंद्र सिंह व भाजपा जिलाध्यक्ष अवधेश श्रीवास्तव को सौंपी। उनकी टीम ने सदस्यों से संपर्क साध कर जीत का आंकड़ा ही नहीं बल्कि 57 में 48 वोट भाजपा प्रत्याशी को दिलाने में सफल रहे।
उधर, सपा की घोषित प्रत्याशी को लेकर एक राय नहीं बन पा रही थी। हाईकमान के निर्देश पर पार्टी के दिग्गज नेता एकसाथ फोटो खिंचवाते तो दिखाई पड़े पर पुरानी गुटबाजी में एक दूसरे को नीचा दिखाने का खेल जारी रहा। इसी का नतीजा है कि पिछले चुनाव में निर्विरोध चुनाव जीतने वाली सपा अपनी पार्टी के सदस्यों को क्रॉस वोटिंग करने से नहीं रोक पाई।
अब तक यह रहे जिला पंचायत अध्यक्ष
जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी पर वर्ष 1952 से 1975 तक महंत जगन्नाथ बख्श दास का कब्जा रहा। 1975 से 1989 तक जिलाधिकारी बतौर प्रशासक के रूप में रहे। सपा के देव नारायण सिंह 1989 से 1995 तक जिला पंचायत अध्यक्ष रहे। वर्ष 1995 में हुए चुनाव में सपा के रामगोपाल रावत इस सीट पर काबिज हुए और वर्ष 2000 तक जिला पंचायत अध्यक्ष रहे।
वर्ष 2000 में हुए चुनाव में सपा की कुसुम सिंह काबिज हुईं। वर्ष 2006 में हुए चुनाव में यह सीट बसपा के पाले में चली गई और इस सीट पर पूर्व ब्लॉक प्रमुख सुरेंद्र सिंह की पत्नी शीला सिंह का कब्जा रहा। वर्ष 2016 में हुए चुनाव में सपा के पूर्व मंत्री अरविंद सिंह गोप के भाई अशोक सिंह काबिज रहे। अब यह सीट भाजपा ने सपा से छीन ली है। इस सीट पर राजरानी ने पहली बार भगवा फहराया है।