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पिता-पुत्र की जंग में फंसी बेनी की सियासी विरासत

Thu, 05 Jan 2017 11:18 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो/बाराबंकी
अमर उजाला ब्यूरो/बाराबंकी Updated Thu, 05 Jan 2017 11:18 PM IST
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In the war of father and son trapped the political legacy of Benny
बेनी - फोटो : अमर उजाला
सूबे के सबसे बड़े सियासी खानदान में पिता-पुत्र के बीच छिड़ी जंग में सपा नेता बेनी प्रसाद वर्मा की सियासी विरासत फंसती नजर आ रही है। एक दशक पहले जिन हालात में बेनी बाबू ने समाजवादी पार्टी को अलविदा कहा था वैसे हालात फिर सामने आ रहे हैं।
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इस बार जिले की सियासत में बेनी प्रसाद वर्मा और कैबिनेट मंत्री अरविन्द सिंह गोप के बीच शह-मात का फैसला सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव और सीएम अखिलेश सिंह यादव के बीच छिड़े घमासान के नतीजे पर टिका है। 
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समाजवादी आंदोलन का गढ़ कहे जाने वाले जिले में बेनी प्रसाद वर्मा सपा में अपनी ताकत का अहसास कराते हुए खुद राज्यसभा सदस्य बनने में कामयाब हुए। इतना ही नहीं वरन अपने पुत्र राकेश वर्मा को कैबिनेट मंत्री अरविंद सिंह गोप के चुनाव क्षेत्र रामनगर से सपा मुखिया मुलायम सिंह की सूची में टिकट दिलाने में भी सफल रहे।
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लेकिन अगले ही दिन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने दूसरी सूची जारी कर अरविन्द सिंह गोप को टिकट दे दिया। तभी से सबकी जुबान पर रामनगर विधानसभा क्षेत्र में टिकट को लेकर कौन बाजी मारेगा, इस बाबत गुणा-भाग तेज है।

पिता-पुत्र में समझौते में जिले के किस नेता का पलड़ा भारी होता है यह तो समय बताएगा। किन्तु एक बार फिर बेनी बाबू की विरासत पिता-पुत्र की जंग में फंसती नजर आ रही है। चुनावी रणभेरी बजने के बाद दोनों के समर्थक क्षेत्र में संपर्क में जुटे हैं। 

पिछले चुनाव में हारे थे बेनी के सभी प्रत्याशी
एक दशक पूर्व वर्ष 2007 में विधानसभा चुनाव में टिकट वितरण को लेकर ही बेनी बाबू ने सपा छोड़कर समाजवादी क्रान्ति दल बना लिया था, पर एक वर्ष बाद ही कांग्रेस में शामिल होकर गोण्डा से सांसद और मंत्री बन गए। 2012 के विधानसभा चुनाव में बेनी बाबू ने कांग्रेस पार्टी से दरियाबाद विधानसभा सीट से अपने बेटे राकेश वर्मा समेत जिले भर में अपने मनपसंद उम्मीदवार मैदान में उतारे, पर किसी को जिता नहीं सके। अरविन्द सिंह गोप सभी सीटों पर सपा को जिताकर जिले में सबसे ताकतवर नेता के रूप में उभरे। 


गणित बिठाने में जुटे रहे बेनी बाबू
2016 में सपा में बेनी प्रसाद वर्मा की वापसी के बाद उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती जिले में अरविन्द सिंह गोप का दबदबा कम कर अपना पुराना राजनीतिक साम्राज्य स्थापित करने की है। बड़बोले नेता कहे जाने वाले बेनी बाबू राज्यसभा सदस्य बनने के बाद इस गणित पर बिना कुछ बोले भीतर ही भीतर अपना गणित बिठाते रहे।
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