{"_id":"62547d86d65bd314e92283fe","slug":"hospital-barabanki-news-lko625699021","type":"story","status":"publish","title_hn":"लाखों खर्च के बाद भी सीएचसी पर नहीं हो पा रहे ऑपरेशन","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
लाखों खर्च के बाद भी सीएचसी पर नहीं हो पा रहे ऑपरेशन
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
बाराबंकी। जिले में संचालित फर्स्ट रेफरल यूनिटें (एफआरयू) रेफर सेंटर बन गई है। यहां पर लाखों रुपये खर्च कर किए गए इंतजाम भी बेकार साबित हो रहे हैं। बाकी सीएचसी पर भी ओटी होने का कोई मकसद ही नहीं निकल रहा है। अस्पतालों में तैनात चिकित्सकों की लापरवाही प्रसूताओं पर भारी पड़ती जा रही है।
इससे प्रसूूताओं को प्रसव कराने के लिए जिला महिला अस्पताल तक दौड़ लगानी पड़ रही है। यहां भी उन्हें डॉक्टरों की कमी बताकर भर्ती नहीं किया जा रहा है। ऐसी हालत में घंटों दर्द से छटपटाने वाली प्रसूताएं निजी अस्पतालों में जाने को मजबूूर हैं। वहां उनका शोषण हो रहा है और एक ऑपरेशन के लिए निजी अस्पताल 20 से 30 हजार रुपये तक वसूल रहे हैं।
जिले की सभी 19 सीएचसी में ऑपरेशन थियेटर हैं। जबकि विभाग के पास पांच सर्जन व एनेस्थीसिया के चार डॉक्टर हैं। सीएचसी में से हैदरगढ़, रामसनेहीघाट, देवा, फतेहपुर, रामनगर व टिकैतनगर को फर्स्ट रेफरल यूनिट (एफआरयू) का दर्जा मिला है। टिकैतनगर में सुविधा अभी प्रारम्भ ही हुई है। इनमें से चार सीएचसी देवा, फतेहपुर, हैदरगढ़ व रामसनेहीघाट में ही प्रसव संबंधी ऑपरेशन का दावा विभाग कर रहा है। इन जगहों पर जब प्रसव के ऑपरेशन करने होते हैं तो सर्जन व एनेस्थीसिया के डॉक्टर का इंतजाम करना पड़ता है।
विज्ञापन
क्योंकि सर्जन 24 घंटे सीएचसी पर नहीं रहते। अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बीते एक साल में सीएचसी देवा में 32, फतेहपुर में 10, हैदरगढ़ में 28 व रामसनेहीघाट में 13 ऑपरेशन किए गए। इन सीएचसी पर पहुंचने वाली 90 प्रतिशत प्रसूताओं को जिला महिला अस्पताल रेफर किया जा रहा है। यहां भी एक डॉक्टर के जिम्मे ऑपरेशन की व्यवस्था है। रोजाना 6 से 7 सिजेरियन प्रसव हो रहे हैं।
बीते एक साल में महिला अस्पताल में 2511 प्रसूताओं का सिजेरियन प्रसव कराए गए। लेकिन मौजूदा समय में यहां से भी रोजाना आधा दर्जन प्रसूताओं को निराश लौटना पड़ रहा है। निजी अस्पताल जाना मजबूरी बन गई है। यहां प्रसव के ऑपरेशन पर तीस हजार तक का खर्चा आ रहा है। जिला महिला अस्पताल के सीएमएस डा. पीके श्रीवास्तव भी कहते हैं कि महिला अस्पताल में डॉक्टरों की कमी है। एक डॉक्टर ही सिजेरियन करती हैं। लेकिन क्षमता से अधिक प्रसूताओं के आने से व्यवस्था गड़बड़ा गई है।
संसाधन के अभाव में दूरबीन के ऑपरेशन ठप
जिला अस्पताल के ऑपरेशन थियेटर में रोजाना आधा दर्जन से अधिक ऑपरेशन हो रहे हैं। पथरी, गांठ व अन्य बीमारियों के मरीजों को लाभ मिल रहा है। लेकिन अस्पताल में दूरबीन विधि से ऑपरेशन होना बंद है। क्योंकि उपकरण ही नहीं है।
कुछ साल पहले यहां तैनात रहे डॉक्टर द्वारा अपने स्तर से दूरबीन के माध्यम से पथरी के ऑपरेशन शुरू किए गए थे। इसका बहुत लाभ मिला था मगर यह व्यवस्था कुछ दिन ही रही। सीएमएस डॉ. ब्रजेेश कुमार ने बताया कि अस्पताल में दूरबीन की सुविधा ही नहीं हैं।
विज्ञापन
इससे प्रसूूताओं को प्रसव कराने के लिए जिला महिला अस्पताल तक दौड़ लगानी पड़ रही है। यहां भी उन्हें डॉक्टरों की कमी बताकर भर्ती नहीं किया जा रहा है। ऐसी हालत में घंटों दर्द से छटपटाने वाली प्रसूताएं निजी अस्पतालों में जाने को मजबूूर हैं। वहां उनका शोषण हो रहा है और एक ऑपरेशन के लिए निजी अस्पताल 20 से 30 हजार रुपये तक वसूल रहे हैं।
विज्ञापन
जिले की सभी 19 सीएचसी में ऑपरेशन थियेटर हैं। जबकि विभाग के पास पांच सर्जन व एनेस्थीसिया के चार डॉक्टर हैं। सीएचसी में से हैदरगढ़, रामसनेहीघाट, देवा, फतेहपुर, रामनगर व टिकैतनगर को फर्स्ट रेफरल यूनिट (एफआरयू) का दर्जा मिला है। टिकैतनगर में सुविधा अभी प्रारम्भ ही हुई है। इनमें से चार सीएचसी देवा, फतेहपुर, हैदरगढ़ व रामसनेहीघाट में ही प्रसव संबंधी ऑपरेशन का दावा विभाग कर रहा है। इन जगहों पर जब प्रसव के ऑपरेशन करने होते हैं तो सर्जन व एनेस्थीसिया के डॉक्टर का इंतजाम करना पड़ता है।
विज्ञापन
क्योंकि सर्जन 24 घंटे सीएचसी पर नहीं रहते। अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बीते एक साल में सीएचसी देवा में 32, फतेहपुर में 10, हैदरगढ़ में 28 व रामसनेहीघाट में 13 ऑपरेशन किए गए। इन सीएचसी पर पहुंचने वाली 90 प्रतिशत प्रसूताओं को जिला महिला अस्पताल रेफर किया जा रहा है। यहां भी एक डॉक्टर के जिम्मे ऑपरेशन की व्यवस्था है। रोजाना 6 से 7 सिजेरियन प्रसव हो रहे हैं।
बीते एक साल में महिला अस्पताल में 2511 प्रसूताओं का सिजेरियन प्रसव कराए गए। लेकिन मौजूदा समय में यहां से भी रोजाना आधा दर्जन प्रसूताओं को निराश लौटना पड़ रहा है। निजी अस्पताल जाना मजबूरी बन गई है। यहां प्रसव के ऑपरेशन पर तीस हजार तक का खर्चा आ रहा है। जिला महिला अस्पताल के सीएमएस डा. पीके श्रीवास्तव भी कहते हैं कि महिला अस्पताल में डॉक्टरों की कमी है। एक डॉक्टर ही सिजेरियन करती हैं। लेकिन क्षमता से अधिक प्रसूताओं के आने से व्यवस्था गड़बड़ा गई है।
संसाधन के अभाव में दूरबीन के ऑपरेशन ठप
जिला अस्पताल के ऑपरेशन थियेटर में रोजाना आधा दर्जन से अधिक ऑपरेशन हो रहे हैं। पथरी, गांठ व अन्य बीमारियों के मरीजों को लाभ मिल रहा है। लेकिन अस्पताल में दूरबीन विधि से ऑपरेशन होना बंद है। क्योंकि उपकरण ही नहीं है।
कुछ साल पहले यहां तैनात रहे डॉक्टर द्वारा अपने स्तर से दूरबीन के माध्यम से पथरी के ऑपरेशन शुरू किए गए थे। इसका बहुत लाभ मिला था मगर यह व्यवस्था कुछ दिन ही रही। सीएमएस डॉ. ब्रजेेश कुमार ने बताया कि अस्पताल में दूरबीन की सुविधा ही नहीं हैं।