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बकस्वाहा बचाने को आदिवासी भी उतरे
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Tribals also came down to save the bullshit
- फोटो : BANDA
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बांदा। बुंदेलखंड के बकस्वाहा जंगल से हीरा खनन के लिए सवा दो लाख से ज्यादा पेड़ कटने से बचाने को आदिवासियों ने भी मोर्चा खोल दिया है। शुक्रवार की शाम को महापंचायत करके अपने वजूद को जहां बचाए रखने को हुंकार भरी, वहीं बकस्वाहा को पर्यटन हब और यहां के दुर्लभ शैल चित्रों को राष्ट्रीय धरोहर घोषित करने की मांग करके जंगल को गुंजायमान कर दिया।
स्थानीय आदिवासियों ने बड़ी महापंचायत कर बकस्वाहा को बचाने के लिए जहां पूरी तरह से मोर्चा खोल दिया है, वहीं अपने भविष्य को लेकर चिंतित भी दिखे। बिजावर क्षेत्र के जटाशंकर में आयोजित महापंचायत में काफी तादाद में आदिवासियों ने शिरकत की। नेतृत्व कर रहे जंगल बचाओ आंदोलन के कार्यकर्ता समाजसेवी अमित भटनागर ने कहा कि आदिवासियों का कहना है कि यह मुद्दा उनके जीवन और भविष्य से जुड़ा हुआ है।
मांग की कि जंगल को पर्यटन हब और यहां के शैल चित्रों/रॉक पेंटिंग्स को राष्ट्रीय धरोहर घोषित किया जाना चाहिए। शैल चित्रों को विश्व स्मारक भी घोषित करने की मांग की। कहा कि इससे आदिवासियों को स्थायी रोजगार और जंगल की सुरक्षा सुनिश्चित हो सकेगी।
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यह भी कहा कि हीरा खनन में कंपनी सिर्फ 400 मजदूरों को रोजगार देगी, जबकि जंगल से 17 गांवों के लगभग 5 हजार आदिवासी पूरे साल आजीविका पा रहे हैं। उधर, बकस्वाहा जंगल रोजाना आंदोलनों, प्रदर्शनों और स्थानीय आदिवासियों की गतिविधियों से लगातार आबाद है। जंगल को हीरा खदान को बिड़ला ग्रुप की कंपनी को पट्टे पर देने के बाद से लगातार विरोध जारी है। हालांकि, एनजीटी ने फिलहाल जंगल के 2.15 लाख पेड़ कटने पर फौरी तौर पर रोक लगाते हुए केंद्र और राज्य सरकारों से रिपोर्ट तलब की है,। लेकिन जंगल को बचाने में जुटे संगठन और आदिवासी स्थायी रूप से रोक न लगने तक आंदोलन पर डटे हुए हैं। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के आदेश पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने यहां के शैल चित्रों के बारे में अपनी विस्तृत रिपोर्ट भी भेजी है।
कोर्ट में पेश नहीं हुए ठोस तर्क
पर्यावरण पैरोकार अमित भटनागर का कहना है कि न्यायालय में बकस्वाहा जंगल और आदिवासियों का पक्ष प्रभावी और ठोस तर्कों के साथ नहीं पेश किया गया। साथ ही भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने सिर्फ तीन स्थानों का सर्वे किया है। कई स्थान छोड़ दिए हैं। सिर्फ खानापूरी की है। यहां पाषाण व मेसोलिथिक काल के शैल चित्रों की पूरी एक बेल्ट है,। लेकिन एएसआई के सर्वे में कई स्थानों को शामिल नहीं किया गया है।
इंसेट---
शैल चित्रों से छेड़छाड़ का विरोध
बकस्वाहा के दुर्लभ शैल चित्रों को क्षतिग्रस्त करने और इन पर लाल व काले रंग से लिखे जाने पर आदिवासियों ने विरोध जताया है। प्रधानमंत्री से इन्हें संरक्षित करने की मांग की है। पूर्व सरपंच बहादुर सहित आदिवासी किशन दयाल, पाचू, देवीदीन, तुलसी आदि ने कहा कि उनके गांवों का विकास तो एक किनारे कर रोजी-रोटी भी छीनने की कोशिश की जा रही है। आदिवासियों ने कहा कि उनके पूर्वजों की निशानियों (शैल चित्र) और जंगल को खत्म किया गया तो नतीजे घातक होंगे।
इंसेट---
आज से एक और साइकिल यात्रा
बकस्वाहा मुद्दे पर चल रहे आंदोलनों की श्रंखला में 26 जुलाई को एक और शुरुआत हो रही है। बकस्वाहा जंगल बचाओ आंदोलन के अगुवा अमित भटनागर ने बताया कि 26 से 30 जुलाई तक पांच दिवसीय साइकिल यात्रा निकाली जाएगी। 26 को गांधी आश्रम में गांधी प्रतिमा पर माल्यार्पण के साथ यात्रा शुरू होगी। सटई, बिजावर, भीमपुर होते हुए बकस्वाहा पहुंचेगी। यह भी बताया कि सर्वे में छोड़ दिए गए शैल चित्रों आदि के बारे में पुरातत्व विभाग को अवगत कराया जाएगा।
इंसेट---
फोटो परिचय-14- बकस्वाहा जा रही साइकिल यात्रा का स्वागत करतीं डॉ. नम्रता आनंद। विज्ञप्ति
यात्रा का जगह-जगह इस्तकबाल
मुजफ्फरपुर (बिहार) से बकस्वाहा के लिए शनिवार को रवाना हुई साइकिल यात्रा की जगह-जगह अगुवानी हो रही है। पीपल, नीम, तुलसी अभियान के तत्वावधान में शुरू हुई यह साइकिल यात्रा 800 किलोमीटर का सफर तय करके बकस्वाहा पहुंचेगी। रविवार को नूरसरांय में अभियान संस्थापक डॉ. धर्मेंद्र और मशरूम कारोबारी राजीव ने यात्रा के सदस्यों का स्वागत किया। उन्हें पीपल और नीम के पत्ते की माला और मेडल पहनाया। डॉ. नम्रता आनंद ने सरिसताबाद में साइकिल यात्रियों की आरती उतारी और शाल देकर सम्मानित किया।
इंसेट---
फोटो परिचय-16- आशीष सागर दीक्षित। विज्ञप्ति
पहले भी हीरे के लिए काटे गए थे पेड़
उन्होंने मौके पर जाकर आदिवासियों की पीड़ा जानी है। वह पिछले अनुभवों से दुखी हैं। इसके पहले भी आस्ट्रेलिया की कंपनी रियोटिंटो बकस्वाहा जंगल में हीरा खनन के लिए काफी पेड़ काट चुकी, लेकिन अब आदिवासी इसे स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं।
-आशीष सागर दीक्षित, पर्यावरण पैरोकार
इंसेट---
फोटो परिचय-17- राजेश यादव। विज्ञप्ति
शैल चित्र संरक्षण से बढ़ेंगे रोजगार
बकस्वाहा के जंगल के शैल चित्रों को संरक्षित कर दिया जाए तो स्थानीय स्तर पर लोगों के लिए रोजगार बढ़ेंगे। देश-विदेश से आने वाले पर्यटक आकर्षित होंगे। स्थानीय लोगों की आमदनी होगी। बुंदेलखंड का नाम देश दुनियां में जाना जाएगा।
-राजेश यादव, पर्यावरण पैरोकार
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स्थानीय आदिवासियों ने बड़ी महापंचायत कर बकस्वाहा को बचाने के लिए जहां पूरी तरह से मोर्चा खोल दिया है, वहीं अपने भविष्य को लेकर चिंतित भी दिखे। बिजावर क्षेत्र के जटाशंकर में आयोजित महापंचायत में काफी तादाद में आदिवासियों ने शिरकत की। नेतृत्व कर रहे जंगल बचाओ आंदोलन के कार्यकर्ता समाजसेवी अमित भटनागर ने कहा कि आदिवासियों का कहना है कि यह मुद्दा उनके जीवन और भविष्य से जुड़ा हुआ है।
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मांग की कि जंगल को पर्यटन हब और यहां के शैल चित्रों/रॉक पेंटिंग्स को राष्ट्रीय धरोहर घोषित किया जाना चाहिए। शैल चित्रों को विश्व स्मारक भी घोषित करने की मांग की। कहा कि इससे आदिवासियों को स्थायी रोजगार और जंगल की सुरक्षा सुनिश्चित हो सकेगी।
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यह भी कहा कि हीरा खनन में कंपनी सिर्फ 400 मजदूरों को रोजगार देगी, जबकि जंगल से 17 गांवों के लगभग 5 हजार आदिवासी पूरे साल आजीविका पा रहे हैं। उधर, बकस्वाहा जंगल रोजाना आंदोलनों, प्रदर्शनों और स्थानीय आदिवासियों की गतिविधियों से लगातार आबाद है। जंगल को हीरा खदान को बिड़ला ग्रुप की कंपनी को पट्टे पर देने के बाद से लगातार विरोध जारी है। हालांकि, एनजीटी ने फिलहाल जंगल के 2.15 लाख पेड़ कटने पर फौरी तौर पर रोक लगाते हुए केंद्र और राज्य सरकारों से रिपोर्ट तलब की है,। लेकिन जंगल को बचाने में जुटे संगठन और आदिवासी स्थायी रूप से रोक न लगने तक आंदोलन पर डटे हुए हैं। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के आदेश पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने यहां के शैल चित्रों के बारे में अपनी विस्तृत रिपोर्ट भी भेजी है।
कोर्ट में पेश नहीं हुए ठोस तर्क
पर्यावरण पैरोकार अमित भटनागर का कहना है कि न्यायालय में बकस्वाहा जंगल और आदिवासियों का पक्ष प्रभावी और ठोस तर्कों के साथ नहीं पेश किया गया। साथ ही भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने सिर्फ तीन स्थानों का सर्वे किया है। कई स्थान छोड़ दिए हैं। सिर्फ खानापूरी की है। यहां पाषाण व मेसोलिथिक काल के शैल चित्रों की पूरी एक बेल्ट है,। लेकिन एएसआई के सर्वे में कई स्थानों को शामिल नहीं किया गया है।
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शैल चित्रों से छेड़छाड़ का विरोध
बकस्वाहा के दुर्लभ शैल चित्रों को क्षतिग्रस्त करने और इन पर लाल व काले रंग से लिखे जाने पर आदिवासियों ने विरोध जताया है। प्रधानमंत्री से इन्हें संरक्षित करने की मांग की है। पूर्व सरपंच बहादुर सहित आदिवासी किशन दयाल, पाचू, देवीदीन, तुलसी आदि ने कहा कि उनके गांवों का विकास तो एक किनारे कर रोजी-रोटी भी छीनने की कोशिश की जा रही है। आदिवासियों ने कहा कि उनके पूर्वजों की निशानियों (शैल चित्र) और जंगल को खत्म किया गया तो नतीजे घातक होंगे।
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आज से एक और साइकिल यात्रा
बकस्वाहा मुद्दे पर चल रहे आंदोलनों की श्रंखला में 26 जुलाई को एक और शुरुआत हो रही है। बकस्वाहा जंगल बचाओ आंदोलन के अगुवा अमित भटनागर ने बताया कि 26 से 30 जुलाई तक पांच दिवसीय साइकिल यात्रा निकाली जाएगी। 26 को गांधी आश्रम में गांधी प्रतिमा पर माल्यार्पण के साथ यात्रा शुरू होगी। सटई, बिजावर, भीमपुर होते हुए बकस्वाहा पहुंचेगी। यह भी बताया कि सर्वे में छोड़ दिए गए शैल चित्रों आदि के बारे में पुरातत्व विभाग को अवगत कराया जाएगा।
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फोटो परिचय-14- बकस्वाहा जा रही साइकिल यात्रा का स्वागत करतीं डॉ. नम्रता आनंद। विज्ञप्ति
यात्रा का जगह-जगह इस्तकबाल
मुजफ्फरपुर (बिहार) से बकस्वाहा के लिए शनिवार को रवाना हुई साइकिल यात्रा की जगह-जगह अगुवानी हो रही है। पीपल, नीम, तुलसी अभियान के तत्वावधान में शुरू हुई यह साइकिल यात्रा 800 किलोमीटर का सफर तय करके बकस्वाहा पहुंचेगी। रविवार को नूरसरांय में अभियान संस्थापक डॉ. धर्मेंद्र और मशरूम कारोबारी राजीव ने यात्रा के सदस्यों का स्वागत किया। उन्हें पीपल और नीम के पत्ते की माला और मेडल पहनाया। डॉ. नम्रता आनंद ने सरिसताबाद में साइकिल यात्रियों की आरती उतारी और शाल देकर सम्मानित किया।
इंसेट---
फोटो परिचय-16- आशीष सागर दीक्षित। विज्ञप्ति
पहले भी हीरे के लिए काटे गए थे पेड़
उन्होंने मौके पर जाकर आदिवासियों की पीड़ा जानी है। वह पिछले अनुभवों से दुखी हैं। इसके पहले भी आस्ट्रेलिया की कंपनी रियोटिंटो बकस्वाहा जंगल में हीरा खनन के लिए काफी पेड़ काट चुकी, लेकिन अब आदिवासी इसे स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं।
-आशीष सागर दीक्षित, पर्यावरण पैरोकार
इंसेट---
फोटो परिचय-17- राजेश यादव। विज्ञप्ति
शैल चित्र संरक्षण से बढ़ेंगे रोजगार
बकस्वाहा के जंगल के शैल चित्रों को संरक्षित कर दिया जाए तो स्थानीय स्तर पर लोगों के लिए रोजगार बढ़ेंगे। देश-विदेश से आने वाले पर्यटक आकर्षित होंगे। स्थानीय लोगों की आमदनी होगी। बुंदेलखंड का नाम देश दुनियां में जाना जाएगा।
-राजेश यादव, पर्यावरण पैरोकार

Tribals also came down to save the bullshit- फोटो : BANDA

Tribals also came down to save the bullshit- फोटो : BANDA