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Banda News: तालाबों में बहनों ने किया कजेलिया विसर्जन, लगा मेला
Fri, 28 Aug 2026 11:26 PM IST
कानपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बांदा
संवाद न्यूज एजेंसी, बांदा
Updated Fri, 28 Aug 2026 11:26 PM IST
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फोटो-1- तिंदवारी कस्बे में कजली विसर्जन करने जातीं युवतियां। संवाद
तिंदवारी। जिले में रक्षाबंधन पर्व के साथ शुक्रवार को कजली महोत्सव धूमधाम से मनाया गया। कई जगह गाजे बाजे के साथ शोभायात्रा निकाली गई।
महिलाएं गाजे-बाजे के साथ सिर पर कजली कलश लेकर प्रमुख मार्गों से होते हुए तालाब पहुंचीं, जहां उन्होंने कजेलियों का विसर्जन किया। इस दौरान तालाबों के आस-पास मेला लगा रहा।
कस्बे के महेंद्र यादव ने बताया कि फसल पर्व के रूप में कजली मेले को जाना जाता है। हिंदू परिवार की महिलाएं अपने घरों में पत्तों के दोनों या अन्य किसी मिट्टी के बर्तन में मिट्टी भरकर गेहूं और जौ मिलाकर बोती हैं। रक्षाबंधन के दिन कजेलियों को नदी व सरोवर में खोंट कर विसर्जित किया जाता है।
राजेश पटेल ने बताया कि प्राचीन काल से गेहूं व जौ के दाने बोने के पीछे मूल भाव यह है कि किसानों को मिट्टी के चयन, खाद मिलाने, बीज और सींच की सीख घर बैठे मिल जाती है। इसी परंपरा का निर्वहन पूरे बुंदेलखंड में आज भी हो रहा है।
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महिलाएं गाजे-बाजे के साथ सिर पर कजली कलश लेकर प्रमुख मार्गों से होते हुए तालाब पहुंचीं, जहां उन्होंने कजेलियों का विसर्जन किया। इस दौरान तालाबों के आस-पास मेला लगा रहा।
कस्बे के महेंद्र यादव ने बताया कि फसल पर्व के रूप में कजली मेले को जाना जाता है। हिंदू परिवार की महिलाएं अपने घरों में पत्तों के दोनों या अन्य किसी मिट्टी के बर्तन में मिट्टी भरकर गेहूं और जौ मिलाकर बोती हैं। रक्षाबंधन के दिन कजेलियों को नदी व सरोवर में खोंट कर विसर्जित किया जाता है।
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राजेश पटेल ने बताया कि प्राचीन काल से गेहूं व जौ के दाने बोने के पीछे मूल भाव यह है कि किसानों को मिट्टी के चयन, खाद मिलाने, बीज और सींच की सीख घर बैठे मिल जाती है। इसी परंपरा का निर्वहन पूरे बुंदेलखंड में आज भी हो रहा है।
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