{"_id":"5f5e5e688ebc3e57c42f2554","slug":"research-book-is-important-in-establishing-hindi-in-rural-environment-banda-news-knp5824775121","type":"story","status":"publish","title_hn":"ग्रामीण परिवेश में हिंदी को स्थापित करने में शोध ग्रंथ महत्वपूर्ण","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
ग्रामीण परिवेश में हिंदी को स्थापित करने में शोध ग्रंथ महत्वपूर्ण
विज्ञापन
हिंदी हैं हम बांदा : चंद्रिका दीक्षित ललित।
- फोटो : BANDA
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
बांदा। हिंदी को नए आयाम दिलाने, विधाओं को स्थापित करने और लोगों के बीच हिंदी को प्रतिष्ठित करने में शोधार्थियों का भी योगदान कम नहीं है। अपने शोध ग्रंथों से हिंदी को सम्मान दिलाने में इनका बेहद महत्वपूर्ण योगदान रहा है।
इसके साथ ही डी. लिट उपाधि से सम्मानित साहित्यकार डॉ. चंद्रिका प्रसाद दीक्षित ललित भी हिंदी को प्रतिष्ठा दिलाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे हैं। ‘अमर उजाला’ के हिंदी हैं हम अभियान में शोधार्थियों और साहित्यकारों ने बताया कि उन्होंने हिंदी की नई विधा और ग्रामीण परिवेश में हिंदी को स्थापित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। हिंदी को जन-जन की भाषा बनाने के लिए प्रयासरत हैं। आगे भी हिंदी को मान-सम्मान दिलाने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे।
डा. ललित ने लेखन से हिंदी को किया समृद्ध
शहर के डीसीडीएफ कॉलोनी निवासी साहित्यकार डॉ. चंद्रिका प्रसाद दीक्षित ललित ने रांची विश्वविद्यालय से डी. लिट उपाधि प्राप्त किया। उनका शोध ग्रंथ ‘महाकवि चंद का पुनर्मूल्यांकन : रासो एवं रासोत्तर कृतियों के परिप्रेक्ष्य’ है।
विज्ञापन
डॉ. ललित ने दुर्लभ पांडुलिपियों का अनुसंधान करके हिंदी साहित्य को नई दिशा दी। वह लगातार हिंदी को समाज में स्थापित करने के लिए प्रयासरत हैं। समय-समय पर रचनाओं और विधाओं से लोगों को हिंदी के प्रति जागरूक कर रहे हैं।
निम्नीपार की डॉ. रश्मि खरे ने महात्मा गांधी ग्रामोदय विश्वविद्यालय, चित्रकूट से वर्ष 2018 में नागार्जुन के कथा साहित्य व ग्राम चेतना विषय पर शोध किया।
उन्होंने शोध में समाज के निचले तबके में सम्मान विकसित करने और उनमें ग्रामीण यथार्थ की पहचान दिलाने पर जोर दिया। कथा और कहानी के माध्यम से ग्रामीण चेतना को जगाने का काम किया। उन्होंने बताया कि हिंदी को प्रतिष्ठित और सुशोभित करने के लिए लगातार प्रयास कर रही हैं।
सिविल लाइन की डॉ. अरुणा गुप्ता ने 2017 में ग्रामोदय विश्वविद्यालय से धर्मवीर भारतीय का कथा साहित्य : समीक्षात्मक अध्ययन विषय पर शोध किया। उन्होंने हिंदी को आम आदमी की जरूरत से जोड़ा। डॉ. अरुणा का कहना है कि वह हिंदी को सम्मान दिलाने के लिए हर संभव प्रयास कर रही हैं। विद्वानों के साथ गोष्ठी में भी हिंदी पर चर्चा करती हैं। इनका कहना है कि एक राष्ट्र एक भाषा में हिंदी को अव्वल दर्जा मिलना चाहिए। तभी हिंदी का मान बढ़ेगा।
अंग्रेजियत के साथ हिंदी का समावेश ठीक नहीं
सिविल लाइन की डॉ. अर्चना गुप्ता ने बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, झांसी से कामायनी और अभिशप्त शिला का तुलनात्मक अध्ययन विषय पर वर्ष 2002 में अपना शोध ग्रंथ प्रस्तुत किया।
उन्होंने शोध में कहा है कि हिंदी साहित्य में महाकवि जयशंकर प्रसाद की कामायनी अध्ययन का विषय है। इसके अलावा शोध में महादेवी वर्मा की सदी में नारी के जीवन का भी चित्रण किया है। इनका कहना है कि हिंदी प्रतिष्ठित है, पर अंग्रेजियत के साथ हिंदी का समावेश ठीक नहीं है।
विज्ञापन
इसके साथ ही डी. लिट उपाधि से सम्मानित साहित्यकार डॉ. चंद्रिका प्रसाद दीक्षित ललित भी हिंदी को प्रतिष्ठा दिलाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे हैं। ‘अमर उजाला’ के हिंदी हैं हम अभियान में शोधार्थियों और साहित्यकारों ने बताया कि उन्होंने हिंदी की नई विधा और ग्रामीण परिवेश में हिंदी को स्थापित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। हिंदी को जन-जन की भाषा बनाने के लिए प्रयासरत हैं। आगे भी हिंदी को मान-सम्मान दिलाने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे।
विज्ञापन
डा. ललित ने लेखन से हिंदी को किया समृद्ध
शहर के डीसीडीएफ कॉलोनी निवासी साहित्यकार डॉ. चंद्रिका प्रसाद दीक्षित ललित ने रांची विश्वविद्यालय से डी. लिट उपाधि प्राप्त किया। उनका शोध ग्रंथ ‘महाकवि चंद का पुनर्मूल्यांकन : रासो एवं रासोत्तर कृतियों के परिप्रेक्ष्य’ है।
विज्ञापन
डॉ. ललित ने दुर्लभ पांडुलिपियों का अनुसंधान करके हिंदी साहित्य को नई दिशा दी। वह लगातार हिंदी को समाज में स्थापित करने के लिए प्रयासरत हैं। समय-समय पर रचनाओं और विधाओं से लोगों को हिंदी के प्रति जागरूक कर रहे हैं।
निम्नीपार की डॉ. रश्मि खरे ने महात्मा गांधी ग्रामोदय विश्वविद्यालय, चित्रकूट से वर्ष 2018 में नागार्जुन के कथा साहित्य व ग्राम चेतना विषय पर शोध किया।
उन्होंने शोध में समाज के निचले तबके में सम्मान विकसित करने और उनमें ग्रामीण यथार्थ की पहचान दिलाने पर जोर दिया। कथा और कहानी के माध्यम से ग्रामीण चेतना को जगाने का काम किया। उन्होंने बताया कि हिंदी को प्रतिष्ठित और सुशोभित करने के लिए लगातार प्रयास कर रही हैं।
सिविल लाइन की डॉ. अरुणा गुप्ता ने 2017 में ग्रामोदय विश्वविद्यालय से धर्मवीर भारतीय का कथा साहित्य : समीक्षात्मक अध्ययन विषय पर शोध किया। उन्होंने हिंदी को आम आदमी की जरूरत से जोड़ा। डॉ. अरुणा का कहना है कि वह हिंदी को सम्मान दिलाने के लिए हर संभव प्रयास कर रही हैं। विद्वानों के साथ गोष्ठी में भी हिंदी पर चर्चा करती हैं। इनका कहना है कि एक राष्ट्र एक भाषा में हिंदी को अव्वल दर्जा मिलना चाहिए। तभी हिंदी का मान बढ़ेगा।
अंग्रेजियत के साथ हिंदी का समावेश ठीक नहीं
सिविल लाइन की डॉ. अर्चना गुप्ता ने बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, झांसी से कामायनी और अभिशप्त शिला का तुलनात्मक अध्ययन विषय पर वर्ष 2002 में अपना शोध ग्रंथ प्रस्तुत किया।
उन्होंने शोध में कहा है कि हिंदी साहित्य में महाकवि जयशंकर प्रसाद की कामायनी अध्ययन का विषय है। इसके अलावा शोध में महादेवी वर्मा की सदी में नारी के जीवन का भी चित्रण किया है। इनका कहना है कि हिंदी प्रतिष्ठित है, पर अंग्रेजियत के साथ हिंदी का समावेश ठीक नहीं है।

हिंदी हैं हम बांदा : डॉ. रश्मी खरे।- फोटो : BANDA

हिंदी हैं हम बांदा : डा. अरुणा गुप्ता।- फोटो : BANDA

हिंदी हैं हम बांदा : डॉ. अर्चना गुप्ता।- फोटो : BANDA