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धान की फसल में आभासी कंडुआ रोग का प्रकोप
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फसल सुरक्षा वैज्ञानिक डा. मंजुल पांडेय और कृषि विभाग के फसल निरीक्षण दल ने शुक्रवार को संयुक्त रूप से धान फसलों का सर्वे किया। महुआ, बिसंडा, कमासिन, नरैनी, तिंदवारी और बबेरू आदि क्षेत्रों में सर्वे के दौरान धान के खड़ी फसल में आभासी कंडुआ रोग पाया गया। महुआ ब्लाक में यह ज्यादा दिखा।
कृषि विज्ञान केंद्र अध्यक्ष डा. श्याम सिंह ने बताया कि जनपद में 60 हजार हेक्टेयर क्षेत्रफल में धान लगाया गया है। ज्यादातर किसानों ने बुवाई से पहले बीजोपचार नहीं कराया।
इससे फसल में अस्टिले जिनाइडीज विरेन्स नाम का कीट का असर है। यह बीज और वायु जनित रोग है। बालियों के निकलने से पहले नहीं दिखाई देता। फूलों के गुच्छे में ही लक्षण प्रकट होते हैं।
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बालियां पकने पर भी नजर आता है। कृषि वैज्ञानिकों ने कहा कि इससे धान की उपज और गुणवत्ता दोनों ही प्रभावित होते हैं। लगभग 17 से 22 प्रतिशत धान की फसल प्रभावित हो चुकी है। कंदुक का रंग नारंगी से पीला, पीला से हरा और काला परिवर्तित हो जाता है। उन्होंने कहा कि ऐसे में बारिश हो जाए तो यह रोग और बढ़ेगा।
नाइट्रोजन की अधिक मात्रा और खेत में अत्यधिक नमी से भी यह रोग बढ़ता है।
किसानों को सलाह दी है कि खेत को साफ-सुथरा रखें। ग्रसित पौधों को उखाड़कर खेत के बाहर गड्ढे में दबा दें। ग्रसित फसल पर प्रोपिकनाजोल एक एमएल प्रति लीटर, कॉपर आक्सीक्लोराइड दो ग्राम प्रति लीटर, क्लोरोथेनोलिन दो ग्राम प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें। सात से 10 दिन के अंतराल में दूसरा छिड़काव करें।
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कृषि विज्ञान केंद्र अध्यक्ष डा. श्याम सिंह ने बताया कि जनपद में 60 हजार हेक्टेयर क्षेत्रफल में धान लगाया गया है। ज्यादातर किसानों ने बुवाई से पहले बीजोपचार नहीं कराया।
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इससे फसल में अस्टिले जिनाइडीज विरेन्स नाम का कीट का असर है। यह बीज और वायु जनित रोग है। बालियों के निकलने से पहले नहीं दिखाई देता। फूलों के गुच्छे में ही लक्षण प्रकट होते हैं।
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बालियां पकने पर भी नजर आता है। कृषि वैज्ञानिकों ने कहा कि इससे धान की उपज और गुणवत्ता दोनों ही प्रभावित होते हैं। लगभग 17 से 22 प्रतिशत धान की फसल प्रभावित हो चुकी है। कंदुक का रंग नारंगी से पीला, पीला से हरा और काला परिवर्तित हो जाता है। उन्होंने कहा कि ऐसे में बारिश हो जाए तो यह रोग और बढ़ेगा।
नाइट्रोजन की अधिक मात्रा और खेत में अत्यधिक नमी से भी यह रोग बढ़ता है।
किसानों को सलाह दी है कि खेत को साफ-सुथरा रखें। ग्रसित पौधों को उखाड़कर खेत के बाहर गड्ढे में दबा दें। ग्रसित फसल पर प्रोपिकनाजोल एक एमएल प्रति लीटर, कॉपर आक्सीक्लोराइड दो ग्राम प्रति लीटर, क्लोरोथेनोलिन दो ग्राम प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें। सात से 10 दिन के अंतराल में दूसरा छिड़काव करें।