{"_id":"60b2821d8ebc3edea103c5e1","slug":"mango-bharpoor-nahi-mil-rahi-keemat-banda-news-knp631130596","type":"story","status":"publish","title_hn":"आम भरपूर, पर नहीं मिल रही उचित कीमत","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
आम भरपूर, पर नहीं मिल रही उचित कीमत
विज्ञापन
बांदा। आम आदमी को अबकी भले ही फलों का राजा आम भरपूर मयस्सर हो, लेकिन आम के बागवान आमदनी के स्वाद के महरूम हो रहे हैं। आम की भरपूर हुई फसल के मौके पर लगातार चल रहे कोरोना कर्फ्यू और लॉकडाउन ने उनकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया है।
व्यापारी और आढ़ती औने-पौने दामों में नाम मात्र को खरीदारी कर रहे हैं। पिछले तीन सालों में आम की फसल को कोई न कोई ग्रहण लगता रहा। कभी बौर आते ही बीमारी लग गई तो कभी आमों से लदे पेड़ों को आंधी-तूफान ने वीरान कर दिया, लेकिन इस वर्ष आम की फसल जोरदार हुई है। आम के पेड़ फलों से लदे हुए हैं। इधर, कई दिनों से तेज हवा और आंधी में बड़ी मात्रा में आम गिरे हैं। बागवान/आम उत्पादक इन्हें बाजार तक नहीं पहुंचा पा रहे। लॉकडाउन के चलते मंडी लगातार बंद चल रही है।
पिछले करीब दो दशकों से बड़ोखर गांव में आम का बाग लिए अहमद बताते हैं कि रोजाना क्विंटलों आम निकल रहा है, लेकिन लॉकडाउन में इसकी कीमत नहीं मिल पा रही। कच्चा आम बमुश्किल 10 से 12 रुपये प्रति किलो आढ़ती खरीद रहे हैं। वह भी थोड़ा बहुत। अक्सर मंडी से माल वापस लाना पड़ रहा है। अहमद ने कहा कि इस वर्ष पिछले तीन सालों से हो रहे घाटे की भरपाई की उम्मीद थी। महामारी ने इसे मटियामेट कर दिया।
विज्ञापन
विज्ञापन
व्यापारी और आढ़ती औने-पौने दामों में नाम मात्र को खरीदारी कर रहे हैं। पिछले तीन सालों में आम की फसल को कोई न कोई ग्रहण लगता रहा। कभी बौर आते ही बीमारी लग गई तो कभी आमों से लदे पेड़ों को आंधी-तूफान ने वीरान कर दिया, लेकिन इस वर्ष आम की फसल जोरदार हुई है। आम के पेड़ फलों से लदे हुए हैं। इधर, कई दिनों से तेज हवा और आंधी में बड़ी मात्रा में आम गिरे हैं। बागवान/आम उत्पादक इन्हें बाजार तक नहीं पहुंचा पा रहे। लॉकडाउन के चलते मंडी लगातार बंद चल रही है।
विज्ञापन
पिछले करीब दो दशकों से बड़ोखर गांव में आम का बाग लिए अहमद बताते हैं कि रोजाना क्विंटलों आम निकल रहा है, लेकिन लॉकडाउन में इसकी कीमत नहीं मिल पा रही। कच्चा आम बमुश्किल 10 से 12 रुपये प्रति किलो आढ़ती खरीद रहे हैं। वह भी थोड़ा बहुत। अक्सर मंडी से माल वापस लाना पड़ रहा है। अहमद ने कहा कि इस वर्ष पिछले तीन सालों से हो रहे घाटे की भरपाई की उम्मीद थी। महामारी ने इसे मटियामेट कर दिया।
विज्ञापन