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महाशिवरात्रि आज, शिवालयों में उमड़ेगा भक्तों का सैलाब
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कालिंजर दुर्ग में स्थित नीलकंठेश्वर मंदिर। संवाद
- फोटो : BANDA
बांदा। महाशिवरात्रि पर्व मंगलवार को होने से शिवालयों में ओम नम: शिवाय और बम-बम भोले आदि शिव मंत्र गूंजेंगे। शिवालयों को रंगरोगन आदि से सजाया और संवारा गया है।
महाशिवरात्रि पर्व पर बड़ी संख्या में महिला-पुरुष व्रत रखेंगे। शाम को स्नान आदि के बाद पूजा होगी। रात्रि के चार प्रहरों में हर प्रहर में शिव पूजा की जा सकती है। शिवलिंग पर बेल पत्र, पान, सुपाड़ी, रोली, मौली, चंदन, लौंग, इलायची, दूध, दही, शहद, धतुरा आदि अर्पित किया जाएगा।
यह रात शिव और पार्वती के विवाह की मानी जाती है। पंचांग के मुताबिक, इस वर्ष महाशिवरात्रि चतुर्थ दशी मंगलवार को तड़के 3 बजकर 16 मिनट से शुरू होगी और बुधवार 2 मार्च को सुबह करीब 10 बजे तक रहेगी। शिव भक्तों में महाशिवरात्रि को लेकर खास उल्लास है। जनपद में बांदा शहर के बामदेश्वर मंदिर और नील कंठेश्वर मंदिर मुख्य शिवालय हैं।
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शिव मूर्ति कंठ आज भी मुलायम
बांदा/कालिंजर। ऐतिहासिक कालिंजर दुर्ग में स्थित नीलकंठेश्वर मंदिर के शिवलिंग का दुर्लभ और दिलचस्प इतिहास है। चट्टानों को काटकर बनाई गई प्रतिमाएं और शिल्प कृतियां बेहद आकर्षक हैं। वास्तु शिल्प की दृष्टि से यह मंडप चंदेल शासकों की अनोखी कृतियां हैं।
मंदिर के ऊपर पानी का ऐसा प्राकृतिक स्त्रोत है जो कभी नहीं सूखता। इससे शिवलिंग का जलाभिषेक कुदरती तौर पर निरंतर होता रहता है। चतुर्थ शताब्दी में यहां नागों ने नीलकंठ महादेव का मंदिर बनवाया। चंदेल काल से ही यहां पूजा-अर्चना होती चली आ रही है। श्रद्धालु बताते हैं कि शिव मूर्ति कंठ चट्टान में होने के बावजूद स्पर्श करने से मुलायम प्रतीत होता है।
भागवत पुराण के सागर मंथन में निकले कालकूट विष को शिव ने पीकर अपने कंठ में रोक लिया था और यही तपस्या कर जहर की ज्वाला शांत की थी। आज भी प्रतिमा के कंठ से जल का रिसाव होता रहता है। महाशिवरात्रि पर यहां शिव-पार्वती विवाह धूमधाम से होगा। वैदिक मंत्रोच्चारण कर कालिंजर दुर्ग के राजगुरु पुरोहित पंडित कराएंगे।
5 मीटर गहरी गुफा में बिना नंदी का शिवलिंग
बांदा। शहर के पश्चिमी छोर पर केन नदी किनारे स्थित बांबेश्वर पहाड़ पर ऊंची चट्टानों के बीच बामदेश्वर मंदिर शिव भक्तों का आस्था केंद्र होने के साथ ही प्राकृतिक रूप से भी आकर्षक है। इसे रामायण कालीन बताया गया है। कहा जाता है कि महर्षि बामदेव की तपस्या से यह शिवलिंग उत्पन्न हुआ था। वामदेव का तपस्या स्थल पहाड़ पर ही था।
किंवदंती है कि वनवास के लिए चित्रकूट जाते समय श्रीराम और सीता ने बामदेवेश्वर पर्वत में महर्षि बामदेव का आशीर्वाद लिया था और शिवलिंग की पूजा की थी। वह कई दिन यहां रहे। यह शिवलिंग चट्टानों के बीच 5 मीटर गुफा में है। कई अन्य मंदिर भी हैं। खास बात यह भी है कि मंदिरों में शिवलिंग के पास नंदी की मूर्ति होती है, लेकिन यहां नहीं है।
यहां अखंड दीपक शुरू से ही जल रहा है। महाशिवरात्रि पर तड़के से देर रात तक हजारों महिला पुरुष गुफा तक पहुंचने के बाद शिवलिंग पर जलाभिषेक व दुग्धाभिषेक कर पूजा अर्चना के लिए लंबी लाइन में खड़े होकर अपनी बारी का इंतजार करेंगे। मंदिर के पुजारी पुत्तन तिवारी के मुताबिक रामायण काल में इस शिवलिंग का वर्णन है।
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महाशिवरात्रि पर्व पर बड़ी संख्या में महिला-पुरुष व्रत रखेंगे। शाम को स्नान आदि के बाद पूजा होगी। रात्रि के चार प्रहरों में हर प्रहर में शिव पूजा की जा सकती है। शिवलिंग पर बेल पत्र, पान, सुपाड़ी, रोली, मौली, चंदन, लौंग, इलायची, दूध, दही, शहद, धतुरा आदि अर्पित किया जाएगा।
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यह रात शिव और पार्वती के विवाह की मानी जाती है। पंचांग के मुताबिक, इस वर्ष महाशिवरात्रि चतुर्थ दशी मंगलवार को तड़के 3 बजकर 16 मिनट से शुरू होगी और बुधवार 2 मार्च को सुबह करीब 10 बजे तक रहेगी। शिव भक्तों में महाशिवरात्रि को लेकर खास उल्लास है। जनपद में बांदा शहर के बामदेश्वर मंदिर और नील कंठेश्वर मंदिर मुख्य शिवालय हैं।
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शिव मूर्ति कंठ आज भी मुलायम
बांदा/कालिंजर। ऐतिहासिक कालिंजर दुर्ग में स्थित नीलकंठेश्वर मंदिर के शिवलिंग का दुर्लभ और दिलचस्प इतिहास है। चट्टानों को काटकर बनाई गई प्रतिमाएं और शिल्प कृतियां बेहद आकर्षक हैं। वास्तु शिल्प की दृष्टि से यह मंडप चंदेल शासकों की अनोखी कृतियां हैं।
मंदिर के ऊपर पानी का ऐसा प्राकृतिक स्त्रोत है जो कभी नहीं सूखता। इससे शिवलिंग का जलाभिषेक कुदरती तौर पर निरंतर होता रहता है। चतुर्थ शताब्दी में यहां नागों ने नीलकंठ महादेव का मंदिर बनवाया। चंदेल काल से ही यहां पूजा-अर्चना होती चली आ रही है। श्रद्धालु बताते हैं कि शिव मूर्ति कंठ चट्टान में होने के बावजूद स्पर्श करने से मुलायम प्रतीत होता है।
भागवत पुराण के सागर मंथन में निकले कालकूट विष को शिव ने पीकर अपने कंठ में रोक लिया था और यही तपस्या कर जहर की ज्वाला शांत की थी। आज भी प्रतिमा के कंठ से जल का रिसाव होता रहता है। महाशिवरात्रि पर यहां शिव-पार्वती विवाह धूमधाम से होगा। वैदिक मंत्रोच्चारण कर कालिंजर दुर्ग के राजगुरु पुरोहित पंडित कराएंगे।
5 मीटर गहरी गुफा में बिना नंदी का शिवलिंग
बांदा। शहर के पश्चिमी छोर पर केन नदी किनारे स्थित बांबेश्वर पहाड़ पर ऊंची चट्टानों के बीच बामदेश्वर मंदिर शिव भक्तों का आस्था केंद्र होने के साथ ही प्राकृतिक रूप से भी आकर्षक है। इसे रामायण कालीन बताया गया है। कहा जाता है कि महर्षि बामदेव की तपस्या से यह शिवलिंग उत्पन्न हुआ था। वामदेव का तपस्या स्थल पहाड़ पर ही था।
किंवदंती है कि वनवास के लिए चित्रकूट जाते समय श्रीराम और सीता ने बामदेवेश्वर पर्वत में महर्षि बामदेव का आशीर्वाद लिया था और शिवलिंग की पूजा की थी। वह कई दिन यहां रहे। यह शिवलिंग चट्टानों के बीच 5 मीटर गुफा में है। कई अन्य मंदिर भी हैं। खास बात यह भी है कि मंदिरों में शिवलिंग के पास नंदी की मूर्ति होती है, लेकिन यहां नहीं है।
यहां अखंड दीपक शुरू से ही जल रहा है। महाशिवरात्रि पर तड़के से देर रात तक हजारों महिला पुरुष गुफा तक पहुंचने के बाद शिवलिंग पर जलाभिषेक व दुग्धाभिषेक कर पूजा अर्चना के लिए लंबी लाइन में खड़े होकर अपनी बारी का इंतजार करेंगे। मंदिर के पुजारी पुत्तन तिवारी के मुताबिक रामायण काल में इस शिवलिंग का वर्णन है।

बांदा के बांबेश्वर पर्वत पर स्थित बामदेश्वर शिव मंदिर। संवाद - फोटो : BANDA