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‘मौत का सफर’ तय करा रही हैं खटारा एंबुलेंस

Sat, 18 Jan 2020 12:00 AM IST
Kanpur	 Bureau कानपुर ब्यूरो
Updated Sat, 18 Jan 2020 12:00 AM IST
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Khatara ambulances are deciding the 'journey of death'
जिला अस्पताल के बाहर खड़ीं प्राइवेट एंबुलेंस। - फोटो : BANDA
बांदा। मरीजों की जिंदगी बचाने में अहम मानी जाने वाली एंबुलेंस ही मरीजों को ‘मौत का सफर’ तय करा रहीं। इनमें खास भूमिका प्राइवेट एंबुलेंस की है। इन एंबुलेंसों में सिलिंडर तो हैं पर आक्सीजन नहीं, न ही कोई मानक पूरे हैं। कई सरकारी एंबुलेंस भी खटारा हो गईं। दूसरी तरफ गांवों की खस्ताहाल सड़कें भी मरीजों की जान की दुश्मन बनी हैं।
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जिला पुरुष और जिला महिला चिकित्सालय सहित जिले में छह सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) और 3 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) तथा 45 न्यू पीएचसी हैं। इन स्वास्थ्य केंद्रों के बीच 108 नंबर की 23 एंबुलेंस और 102 नंबर की 21 सरकारी एंबुलेंस हैं। 3 एडवांस लाइफ सपोर्ट एंबुलेंस अलग से हैं। ये आधुनिक सुविधाओं से लैस हैं। साथ ही अस्पताल और स्वास्थ्य केंद्रों के बाहर प्राइवेट एंबुलेंसों की भी धमाचौकड़ी रहती है।
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सरकारी एंबुलेंसों में चालक व ईएमटी सहित पर्याप्त दवाएं व अन्य सुविधाएं हैं, लेकिन इनकी पर्याप्त संख्या न होने और समय से न पहुंच पाने पर अधिकांश मरीजों को मानकविहीन प्राइवेट एंबुलेंस का सहारा लेना पड़ता है। नीली बत्ती लगाकर एंबुलेंस बना लिए गए प्राइवेट वाहनों में मरीज के लिए मात्र एक सीट होती है। इसके अलावा न आक्सीजन की व्यवस्था है और न ही अग्निशमन यंत्र की।
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अधिकांश प्राइवेट एंबुलेंस डीजल-पेट्रोल के बजाय गैस सिलिंडरों से चलाई जा रही हैं। जिला अस्पताल और मेडिकल कॉलेज से रोजाना औसतन करीब 40 से 50 मरीज लखनऊ और कानपुर ले जाए जाते हैं। मानक के मुताबिक सारी व्यवस्थाएं होनी चाहिए।
फिर भी अधिकारियों की अनदेखी से प्राइवेट एंबुलेंस मरीजों की जान से खिलवाड़ कर रही हैं। रही बात सरकारी एंबुलेंसों की खटारा हो चुकीं 11 एंबुलेंसों के स्थान पर दो माह पूर्व नई एंबुलेंस आ गईं, लेकिन गांवों की खस्ताहाल सड़कों से मरीजों को ढोने में इनकी भी हालत जर्जर हो गई है।
एंबुलेंस के ये हैं मानक
ऑक्सीजन सिलिंडर व मास्क, स्ट्रेचर, मास्क, लाइफ सपोर्ट में ईसीजी, वेंटीलेटर, कार्डियक मॉनीटर, इमर्जेंसी मेडिकल टेक्नीशियन (ईएमटी) सहित पैरामेडिकल स्टाफ, फर्स्ट एड में जरूरी दवाएं व इंजेक्शन, हृदय रोगी के लिए डिफ्रिबिलेटर (श्वांस गति सही रखने), सर्वाइकल कोलार (गर्दन बांधने) आदि उपकरण होने चाहिए, लेकिन सरकारी एंबुलेंस के अलावा प्राइवेट में ये सुविधाएं नगण्य हैं।
ग्रामीण इलाके की सड़कें भी हैं आफत
बड़ोखर ब्लाक क्षेत्र में हरदौनी, चरका, बसहरी, दुरेड़ी, गोयरा मुगली। अतर्रा में नांदनमऊ व बिसंडा रोड के कुछ पुरवा। जसपुरा में पैलानी से अमलोर और गौरीकलां से शिवरामपुर मार्ग सहित बालू घाट वाले रास्ते। कालिंजर में आसपास के कुछ गांव। कमासिन क्षेत्र में पन्नाह, मटेहना, इंगुवा, मऊ, सांड़ा, सिंगुवा डेरा, तोड़ी पुरवा, मरका रोड, गोंडा आदि।

एंबुलेंस जिला प्रभारी उमेश द्विवेदी ने बताया कि सबसे दिक्कत अंडरपास से होकर गुजरने वाले गांवों में आ रही है। अंडरपास में पानी भरने से एंबुलेंस नहीं निकल पातीं। ऐसे में मरीजों को स्ट्रेचर आदि में लादकर एंबुलेंस तक पैदल लाना पड़ता है। ताजी बानगी में शुक्रवार को नांदनमऊ गांव में खराब सड़क के कारण रांची नामक मरीज को स्ट्रेचर पर लाना पड़ा।

एंबुलेंस में रखा शोपीस ऑक्सीजन सिलिंडर।

एंबुलेंस में रखा शोपीस ऑक्सीजन सिलिंडर।- फोटो : BANDA

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