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Banda News: जिला अस्पताल में चार घंटे फर्श पर तड़पता रहा मासूम
Tue, 08 Sep 2026 11:50 PM IST
कानपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बांदा
संवाद न्यूज एजेंसी, बांदा
Updated Tue, 08 Sep 2026 11:50 PM IST
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फोटो-35-जिला अस्पताल में बाल रोग विशेषज्ञ कक्ष के बाहर जमीन पर लेटा रोहित और पास बैठी मां। अमर
बांदा। जिला अस्पताल में इलाज की उम्मीद लेकर पहुंचा 10 साल का मासूम चार घंटे तक फर्श पर तेज बुखार में तड़पता रहा। बुखार से तड़प रहे बच्चे को ट्रामा सेंटर से भी भगा दिया गया।
पिता कभी पर्चा बनवाने के लिए लाइन में लगे तो कभी डॉक्टर से बच्चे को देखने की गुहार लगाते रहे, लेकिन व्यवस्था के आगे उनकी एक न चली। दोपहर करीब डेढ़ बजे डॉक्टर तक पहुंचे तो बच्चे को मेडिकल कॉलेज के लिए रेफर कर दिया। पिता तीन बजे बच्चे को लेकर मेडिकल कॉलेज पहुंचे, तब जाकर उसे उपचार मिल सका।
अतर्रा के खमौरा गांव निवासी राममिलन का 10 वर्षीय बेटा रोहित करीब 20 दिन से बुखार से पीड़ित है। मंगलवार को पेट दर्द और तेज बुखार होने पर राममिलन पत्नी रामश्री के साथ सुबह करीब साढ़े नौ बजे उसे लेकर जिला अस्पताल के ट्रामा सेंटर पहुंचे। यहां उन्हें ओपीडी में दिखाने और पहले पर्चा बनवाने के लिए कहा गया।
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राममिलन ने स्टाफ को बेटे की हालत बताई, लेकिन उन्हें पर्चा बनवाने के लिए भेज दिया गया। वह बच्चे को बाल रोग विशेषज्ञ के कक्ष के बाहर लिटाकर पर्चा बनवाने के लिए लाइन में लग गए। भीड़ के कारण करीब दो घंटे बाद पर्चा बन सका। इसके बाद डॉक्टर के कक्ष के बाहर नंबर लगाने की प्रक्रिया में फिर इंतजार करना पड़ा।
राममिलन के मुताबिक इस दौरान रोहित तेज बुखार में फर्श पर तड़पता रहा। वह लगातार स्टाफ से बच्चे को पहले देखने की गुहार लगाते रहे, लेकिन सुनवाई नहीं हुई। करीब डेढ़ बजे डॉक्टर के पास पहुंचने पर बच्चे को मेडिकल कॉलेज के लिए रेफर कर दिया।
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एक नहीं, कई बच्चे फर्श पर इलाज की बांट जोहते रहे
जिला अस्पताल में बाल रोग विशेषज्ञ के कक्ष के बाहर आयुष, तिंदवारी बाईपास निवासी सुधीर कुमार का साढ़े पांच साल का बेटा आयुष कई दिनों से बीमार हैं। बच्चे तीन घंटे तक फर्श पर पड़े इलाज के लिए इंतजार करते रहे। शंभूनगर निवासी निशा आठ वर्षीय बेटे कृष्णा को तेज बुखार और पैर में दर्द की शिकायत पर सुबह सात बजे जिला अस्पताल लेकर पहुंचीं। करीब डेढ़ घंटे लाइन में लगने के बाद पर्चा बन सका। इसके बाद भी दोपहर एक बजे तक बच्चे को डॉक्टर नहीं देख सके।
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तस्वीरें बयां कर रहीं व्यवस्था की हकीकत
अस्पताल प्रशासन बेहतर उपचार और व्यवस्थाओं के दावे करता है, लेकिन अस्पताल के फर्श पर उपचार के इंतजार में पड़े बीमार बच्चों की तस्वीरें अलग कहानी बयां कर रही हैं। गंभीर हालत में पहुंचे मरीजों को प्राथमिकता के आधार पर उपचार मिलना चाहिए, लेकिन यहां पर्चा, नंबर और इंतजार की प्रक्रिया में ही कई घंटों बीत जा रहे हैं।
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मंत्री के सामने भी सामने आ चुकी हैं शिकायतें
जिला अस्पताल की व्यवस्थाओं को लेकर शिकायतें पहले भी सामने आ चुकी हैं। मंत्री रामकेश निषाद के अस्पताल पहुंचने पर मरीजों ने ओटी में वसूली किए जाने और चिकित्सकों द्वारा बाहर की दवाएं लिखे जाने के आरोप लगाए थे। मरीजों की शिकायत सुनने के बाद मंत्री ने संबंधित स्टाफ को कड़ी फटकार लगाई थी। ऐसे में सवाल है कि शिकायतों और फटकार के बाद भी व्यवस्था में अपेक्षित सुधार क्यों नहीं हुआ।
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ट्रामा सेंटर में मिलना चाहिए तत्काल उपचार
अगर कोई मरीज ऐसा आता है, जिसे तेज बुखार है, दस्त हो रहे हैं या अन्य कोई ऐसी परेशान है कि तत्काल उपचार की आवश्यकता है तो उसे ट्रामा सेंटर में ही भर्ती करना चाहिए। ट्रामा सेंटर से अगर उसे ओपीडी में भेजा गया तो गलत है। मेरा प्रयास रहता है सभी बाल मरीजों को उपचार मिले। कमरे के बाहर लेटे मरीज के बारे में कई बार जानकारी नहीं हो पाती है।
-डॉ. आरके गुप्ता, बाल रोग विशेषज्ञ
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पहले देना चाहिए था उपचार
अगर कोई मरीज ऐसा है जिसे तत्काल उपचार की आवश्यकता है तो उसे ट्रामा सेंटर में ही भर्ती किया जाता है। इसके लिए सख्त निर्देश भी दिए गए हैं। ओपीडी में तेज बुखार में मरीज को क्यों भेजा गया, इसकी जानकारी की जाएगी। मरीजों के दबाव के चलते कुछ समस्याएं आ रही हैं, उनके निदान का प्रयास किया जा रहा है।
-डॉ. किशुन कुमार, मुख्य चिकित्सा अधीक्षक, जिला अस्पताल
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पिता कभी पर्चा बनवाने के लिए लाइन में लगे तो कभी डॉक्टर से बच्चे को देखने की गुहार लगाते रहे, लेकिन व्यवस्था के आगे उनकी एक न चली। दोपहर करीब डेढ़ बजे डॉक्टर तक पहुंचे तो बच्चे को मेडिकल कॉलेज के लिए रेफर कर दिया। पिता तीन बजे बच्चे को लेकर मेडिकल कॉलेज पहुंचे, तब जाकर उसे उपचार मिल सका।
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अतर्रा के खमौरा गांव निवासी राममिलन का 10 वर्षीय बेटा रोहित करीब 20 दिन से बुखार से पीड़ित है। मंगलवार को पेट दर्द और तेज बुखार होने पर राममिलन पत्नी रामश्री के साथ सुबह करीब साढ़े नौ बजे उसे लेकर जिला अस्पताल के ट्रामा सेंटर पहुंचे। यहां उन्हें ओपीडी में दिखाने और पहले पर्चा बनवाने के लिए कहा गया।
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राममिलन ने स्टाफ को बेटे की हालत बताई, लेकिन उन्हें पर्चा बनवाने के लिए भेज दिया गया। वह बच्चे को बाल रोग विशेषज्ञ के कक्ष के बाहर लिटाकर पर्चा बनवाने के लिए लाइन में लग गए। भीड़ के कारण करीब दो घंटे बाद पर्चा बन सका। इसके बाद डॉक्टर के कक्ष के बाहर नंबर लगाने की प्रक्रिया में फिर इंतजार करना पड़ा।
राममिलन के मुताबिक इस दौरान रोहित तेज बुखार में फर्श पर तड़पता रहा। वह लगातार स्टाफ से बच्चे को पहले देखने की गुहार लगाते रहे, लेकिन सुनवाई नहीं हुई। करीब डेढ़ बजे डॉक्टर के पास पहुंचने पर बच्चे को मेडिकल कॉलेज के लिए रेफर कर दिया।
एक नहीं, कई बच्चे फर्श पर इलाज की बांट जोहते रहे
जिला अस्पताल में बाल रोग विशेषज्ञ के कक्ष के बाहर आयुष, तिंदवारी बाईपास निवासी सुधीर कुमार का साढ़े पांच साल का बेटा आयुष कई दिनों से बीमार हैं। बच्चे तीन घंटे तक फर्श पर पड़े इलाज के लिए इंतजार करते रहे। शंभूनगर निवासी निशा आठ वर्षीय बेटे कृष्णा को तेज बुखार और पैर में दर्द की शिकायत पर सुबह सात बजे जिला अस्पताल लेकर पहुंचीं। करीब डेढ़ घंटे लाइन में लगने के बाद पर्चा बन सका। इसके बाद भी दोपहर एक बजे तक बच्चे को डॉक्टर नहीं देख सके।
तस्वीरें बयां कर रहीं व्यवस्था की हकीकत
अस्पताल प्रशासन बेहतर उपचार और व्यवस्थाओं के दावे करता है, लेकिन अस्पताल के फर्श पर उपचार के इंतजार में पड़े बीमार बच्चों की तस्वीरें अलग कहानी बयां कर रही हैं। गंभीर हालत में पहुंचे मरीजों को प्राथमिकता के आधार पर उपचार मिलना चाहिए, लेकिन यहां पर्चा, नंबर और इंतजार की प्रक्रिया में ही कई घंटों बीत जा रहे हैं।
मंत्री के सामने भी सामने आ चुकी हैं शिकायतें
जिला अस्पताल की व्यवस्थाओं को लेकर शिकायतें पहले भी सामने आ चुकी हैं। मंत्री रामकेश निषाद के अस्पताल पहुंचने पर मरीजों ने ओटी में वसूली किए जाने और चिकित्सकों द्वारा बाहर की दवाएं लिखे जाने के आरोप लगाए थे। मरीजों की शिकायत सुनने के बाद मंत्री ने संबंधित स्टाफ को कड़ी फटकार लगाई थी। ऐसे में सवाल है कि शिकायतों और फटकार के बाद भी व्यवस्था में अपेक्षित सुधार क्यों नहीं हुआ।
ट्रामा सेंटर में मिलना चाहिए तत्काल उपचार
अगर कोई मरीज ऐसा आता है, जिसे तेज बुखार है, दस्त हो रहे हैं या अन्य कोई ऐसी परेशान है कि तत्काल उपचार की आवश्यकता है तो उसे ट्रामा सेंटर में ही भर्ती करना चाहिए। ट्रामा सेंटर से अगर उसे ओपीडी में भेजा गया तो गलत है। मेरा प्रयास रहता है सभी बाल मरीजों को उपचार मिले। कमरे के बाहर लेटे मरीज के बारे में कई बार जानकारी नहीं हो पाती है।
-डॉ. आरके गुप्ता, बाल रोग विशेषज्ञ
पहले देना चाहिए था उपचार
अगर कोई मरीज ऐसा है जिसे तत्काल उपचार की आवश्यकता है तो उसे ट्रामा सेंटर में ही भर्ती किया जाता है। इसके लिए सख्त निर्देश भी दिए गए हैं। ओपीडी में तेज बुखार में मरीज को क्यों भेजा गया, इसकी जानकारी की जाएगी। मरीजों के दबाव के चलते कुछ समस्याएं आ रही हैं, उनके निदान का प्रयास किया जा रहा है।
-डॉ. किशुन कुमार, मुख्य चिकित्सा अधीक्षक, जिला अस्पताल

फोटो-35-जिला अस्पताल में बाल रोग विशेषज्ञ कक्ष के बाहर जमीन पर लेटा रोहित और पास बैठी मां। अमर