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नवाबी शहर में होली भी नायाब
Tue, 19 Mar 2019 10:56 PM IST
gaurav gaurav
banda
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Published by: gaurav gaurav
Updated Tue, 19 Mar 2019 10:56 PM IST
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holi festival
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नवाबी शहर बांदा में होली भी नायाब है। ऋषि बामदेव और नवाब की नगरी बांदा में होलिका दहन की शुरुआत नवाब जुल्फिकार अली बहादुर ने सन 1890 में कराई थी। इसमें हिंदू-मुस्लिम बराबरी से शरीक होते थे।
होली मिलजुलकर बनाने की परंपरा यहां नवाबी दौर से चली आ रही है। नवाब जुल्फिकार अली बहादुर ने होली जलाने की शुरुआत शहर के रहुनिया मैदान से कराई थी। इसमें शहर के चुनिंदा हिंदू-मुस्लिम बराबरी से शरीक होकर लुत्फ लेते थे।
होली के रंग हिंदू-मुसलमान की पहचान मिटा देते थे। अपने जमाने के हनकदार मुस्लिम बुजुर्ग मुख्तार रहीम बख्श तत्कालीन नगर पालिका चेयरमैन डॉ. श्यामलाल शर्मा के साथ कार में बैठकर शहर में घूमते और लोगों को होली की मुबारकबाद देते थे। डॉ.अनवर (बलखंडी नाका), अमीन खां जूते वाले (कोतवाली रोड), चौधरी रहीम मनिहार (खुटला), मौला बख्श (मढिय़ा नाका) होली की अलग शान और पहचान बन गए थे। चौधरी खानदान के जमींदार पहलवान सिंह, उमराव सिंह, रामराजा दुबे, चुनकई महाराज, भूरी महाराज इन मुसलिम साथियों के साथ होली का जश्न मनाते थे।
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इतिहास के जानकार और इंटेक के कनवीनर हारिस जमां खां ने बताया कि बलखंडीनाका की होली सबसे ज्यादा मशहूर थी। तांगे वाले मंजूर मियां इसके कर्ताधर्ता थे। रामेश्वर रेवड़ी वाले उनकी मदद करते थे। शहर के रईस और बैरिस्टर मसूदुज्जमां (बलखंडी नाका) होरियारों का हौसला बढ़ाते थे।
अलबत्ता तब चेहरा पोतने का रिवाज नहीं था। कुदरती रंग इस्तेमाल होते थे। किसी के प्रति कोई दुर्भावना नहीं होती थी। उस जमाने के रईस मन्नूलाल अवस्थी, लालमन शुक्ला, किशोरी प्रसाद, सेठ गोकुलचंद्र पीतल की बड़ी पिचकारियों से रंग खेलते थे। वरिष्ठ अधिवक्ता और समाजसेवी अशोक दीक्षित कहते हैं कि अब कुछ स्थानों पर होली प्रेम के बजाए दुश्मनी बढ़ा रही है।
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होली मिलजुलकर बनाने की परंपरा यहां नवाबी दौर से चली आ रही है। नवाब जुल्फिकार अली बहादुर ने होली जलाने की शुरुआत शहर के रहुनिया मैदान से कराई थी। इसमें शहर के चुनिंदा हिंदू-मुस्लिम बराबरी से शरीक होकर लुत्फ लेते थे।
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होली के रंग हिंदू-मुसलमान की पहचान मिटा देते थे। अपने जमाने के हनकदार मुस्लिम बुजुर्ग मुख्तार रहीम बख्श तत्कालीन नगर पालिका चेयरमैन डॉ. श्यामलाल शर्मा के साथ कार में बैठकर शहर में घूमते और लोगों को होली की मुबारकबाद देते थे। डॉ.अनवर (बलखंडी नाका), अमीन खां जूते वाले (कोतवाली रोड), चौधरी रहीम मनिहार (खुटला), मौला बख्श (मढिय़ा नाका) होली की अलग शान और पहचान बन गए थे। चौधरी खानदान के जमींदार पहलवान सिंह, उमराव सिंह, रामराजा दुबे, चुनकई महाराज, भूरी महाराज इन मुसलिम साथियों के साथ होली का जश्न मनाते थे।
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इतिहास के जानकार और इंटेक के कनवीनर हारिस जमां खां ने बताया कि बलखंडीनाका की होली सबसे ज्यादा मशहूर थी। तांगे वाले मंजूर मियां इसके कर्ताधर्ता थे। रामेश्वर रेवड़ी वाले उनकी मदद करते थे। शहर के रईस और बैरिस्टर मसूदुज्जमां (बलखंडी नाका) होरियारों का हौसला बढ़ाते थे।
अलबत्ता तब चेहरा पोतने का रिवाज नहीं था। कुदरती रंग इस्तेमाल होते थे। किसी के प्रति कोई दुर्भावना नहीं होती थी। उस जमाने के रईस मन्नूलाल अवस्थी, लालमन शुक्ला, किशोरी प्रसाद, सेठ गोकुलचंद्र पीतल की बड़ी पिचकारियों से रंग खेलते थे। वरिष्ठ अधिवक्ता और समाजसेवी अशोक दीक्षित कहते हैं कि अब कुछ स्थानों पर होली प्रेम के बजाए दुश्मनी बढ़ा रही है।