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हरियाली हार रही, पर्यावरण में पलीते को जीत

Fri, 04 Jun 2021 11:37 PM IST
Kanpur	 Bureau कानपुर ब्यूरो
Updated Fri, 04 Jun 2021 11:37 PM IST
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Greenery is losing, conquering the environment in the environment
Greenery is losing, conquering the environment in the environment - फोटो : BANDA
बांदा। पर्यावरण दुरुस्त तो जीवन चुस्त। यह सिर्फ जुमलेबाजी नहीं जीवन से जुड़ी 100 फीसदी हकीकत भी है। ऑक्सीजन का महत्व मौजूदा कोरोना महामारी ने हमें एक बार फिर बखूबी बता दिया है। ऑक्सीजन के तार पर्यावरण से ही जुड़े हैं। जितने अधिक पेड़ होंगे, उतनी ज्यादा ऑक्सीजन मिलेगी। विश्व पर्यावरण दिवस पर एक बार फिर हमें पर्यावरण की याद आई है।
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बुंदेलखंड के सातों जिलों बांदा, हमीरपुर, महोबा, चित्रकूट, झांसी, जालौन और ललितपुर जिले में राष्ट्रीय वन नीति के मुताबिक वन नहीं हैं। बुंदेलखंड जंगल और जमीन का गढ़ था, लेकिन जंगलों में तेजी से गिरावट का सिलसिला अभी भी जारी है। स्थितियां यहां तक पहुंच गई हैं कि बुंदेलखंड के किसी भी जनपद मेें राष्ट्रीय वन नीति के मुताबिक 33 प्रतिशत वन नहीं है। यहां वनों का औसत मात्र 6.83 फीसदी है। पर्यावरण का पलीता लगाने वालों में आम आदमी से लेकर सरकारी महकमे तक शामिल हैं।
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बुंदेलखंड खनिज संपदा से भरपूर रहा है। जंगल के साथ पहाड़ और बेशुमार बालू की खदानें हैं, लेकिन पिछले कुछ दशकों में इन सभी का जबरदस्त सफाया कर दिया गया है। खनिज से हर वर्ष राज्य सरकार अरबों रुपये तो जुटा रही है, लेकिन नदियों का अस्तित्व भी खतरे में आ गया है। बांदा, महोबा, चित्रकूट आदि में दर्जनों पहाड़ों का नामोनिशान मिट चुका है। यहां पौधरोपण के नाम पर हर वर्ष प्रदेश सरकार करोड़ों रुपये खर्च कर रही है, लेकिन हो वही रहा है कि मर्ज बढ़ता गया ज्यों ज्यों दवा की। (संवाद)
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बुंदेलखंड में वन क्षेत्र प्रतिशत
बांदा-1.21, चित्रकूट-18.5, हमीरपुर-3.6, महोबा-4.50, जालौन-5.6, झांसी-6.66, ललितपुर-7.8
बुंदेलखंड का औसत-6.83 प्रतिशत। राष्ट्रीय वन नीति 33 प्रतिशत।
सरकारी योजनाओं से भी वनों का विनाश
विकास परियोजनाओं, सड़क निर्माण और आम लोगों द्वारा अपने स्वार्थ के लिए हरियाली पर बेहिचक कुल्हाड़े चटकाए जा रहे हैं। यहां तक कि श्रीराम की तपोभूमि में स्थित रानीपुर वन्य जीव सेंचुरी भी पाठा का चटियल मैदान बनती जा रही है। बुंदेलखंड एक्सप्रेस-वे में करीब 1.90 लाख, झांसी-खजुराहो एक्सप्रेस-वे में 23 हजार पेड़ साफ कर दिए गए। अब बुंदेलखंड के बकस्वाहा (पन्ना) में हीरा खदान के लिए 2.15 लाख और पन्ना टाइगर मेें 7.23 लाख पेड़ खत्म करने की तैयारी है। रात दिन खनन से केन, यमुना, बागै, बेतवा आदि नदियां अपने अस्तित्व की जंग लड़ रही हैं।

आग भी बनी हरियाली की दुश्मन
बुंदेलखंड की हरियाली और पर्यावरण की एक बड़ी दुश्मन आग भी है। यहां के जंगलों में लगभग हर साल गर्मी के दिनों में अग्निकांड आम बात हो गई है। लाखों पेड़ राख हो रहे हैं। खासकर चित्रकूट के पाठा जंगल और बांदा के कालिंजर दुर्ग के जंगलों को आग वनों से विहीन कर रही है। बीते दो महीनों में इन क्षेत्रों में लगभग आग ने जंगलों को भस्म किया।
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