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पर्यावरण के लिए सरकारों में समझ नहीं

Thu, 09 Sep 2021 11:32 PM IST
Kanpur	 Bureau कानपुर ब्यूरो
Updated Thu, 09 Sep 2021 11:32 PM IST
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Governments do not understand for the environment
बांदा। देश के दिग्गज पर्यावरण पुरोधाओं का मानना है कि बकस्वाहा जंगल और केन-बेतवा नदी लिंक परियोजना को लेकर केंद्र और राज्य सरकारें पर्यावरण और बुंदेलखंड के प्रति गंभीर नहीं हैं। उन्हें न ही पर्यावरण की समझ है और न रुचि।
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ये विचार बुंदेलखंड के बकस्वाहा जंगल और केन-बेतवा नदी गठजोड़ परियोजना के मुद्दे पर बृहस्पतिवार को भोपाल में आयोजित पर्यावरण संसद में सामने आए। दिनभर चली एक दिवसीय संसद में देश के अनेकों पर्यावरणविद और विशेषज्ञ खुद उपस्थित हुए या वर्चुअल रूप से प्रतिभाग किया।
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देश की मशहूर पर्यावरण पैरोकार और नर्मदा बचाओ आंदोलन की अगुवा मेधा पाटेकर ने कहा कि केन-बेतवा और नर्मदा प्रोजेक्ट जैसी परियोजनाओं का परिणाम काफी नुकसानदेह साबित होता है। उन्होंने कहा कि 1986 में बना पर्यावरण सुरक्षा कानून सर्वांगीण है। आज भावना दूसरी है।
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सुप्रीम कोर्ट के मशहूर अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने अपने वर्चुअल संबोधन में कहा कि सरकार में पर्यावरण के प्रति न कोई समझ है और न रुचि। बिना जन सुनवाई के ऐसी योजनाएं लागू कर दीं जाती हैं। कई नियम बदल दिए गए हैं।
कहा कि सरकार पर्यावरण मंत्रालय खत्म करना चाहती है। नदी जोड़ने की परियोजनाओं को विशेषज्ञों ने घातक परिणाम वाला बताया है। वन पुरुष जादव मुलाई ने संसद की अध्यक्षता की।
बकस्वाहा जंगल बचाओ अभियान/आंदोलन से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता सुभाष पांडे (भोपाल) ने संसद में सभापति मंडल को 450 पेज की रिपोर्ट पेश की। इसमें बकस्वाहा जंगल व केन-बेतवा लिंक का विस्तृत ब्योरा दिया गया है।
पर्यावरण संसद को कई वरिष्ठ और मशहूर पर्यावरणविदों ने संबोधित किया। बकस्वाहा जंगल के साथ शैलचित्रों पर भी विशेष रूप से चर्चा की।
केन-बेतवा लिंक नहीं बनने देना चाहिए
राजस्थान के अलवर के मैग्सेसे अर्वाडेड और जल पुरुष राजेंद्र सिंह राणा ने कहा कि केन-बेतवा लिंक को हमें बिल्कुल नहीं बनने देना चाहिए। बकस्वाहा आदि जंगलों में जो शैल चित्र हैं ये हमारी विरासत/हेरिटेज हैं। इनको सुरक्षित रखने के लिए हम सबको एक होकर आगे बढ़ने की जरूरत है।
सदनों में मुद्दा उठवाएं, कोर्ट अभी न जाएं
बकस्वाहा और केन-बेतवा लिंक में इतनी संख्या में पेड़ कट रहे कि लोगों को यह बताना होगा कि इसका इंपेक्ट क्या होगा। कुछ करोड़ रुपया मिल जाएगा तो क्या भला होगा। इन मुद्दों को संसद और विधान सभाओं में उठवाएं। चर्चा कराएं। कोर्ट में अभी न जाएं, बल्कि कोर्ट को पत्र भेजें।
-महेश भाई पंडया, पर्यावरण कार्यकर्ता, अहमदाबाद (गुजरात)।
पैसे के लिए पर्यावरण को हानि पहुंचाना दुखद
आरटीआई एक्टिविस्ट शैलेष गांधी ने कहा कि हमें कोई परवाह नहीं है कि ऑक्सीजन का क्या होगा। अगली पीढ़ियों की हम परवाह नहीं कर रहे। यह दुखद है। पैसे के नाम पर पर्यावरण को हानि पहुंचाकर हम कहीं नहीं पहुंचेंगे।
जब विशेषज्ञ इन परियोजनाओं का विरोध कर रहे हैं तो उनकी बात सुनना चाहिए और चर्चा होनी चाहिए। पर्यावरण को जो नुकसान पहुंचेगा उसे हम ठीक नहीं कर पाएंगे। न वापस जा पाएंगे।
शैल चित्र पूरे विश्व की संपदा
मुंबई के मितुल प्रदीप ने कहा कि हम सो रहे हैं। नहीं जागे तो मनुष्य जाति का अंत सुनिश्चित है। जंगल के शैल चित्र सिर्फ हमारे देश के ही नहीं बल्कि पूरे विश्व और मानव जाति की संपदा हैं। हमें गर्व होना चाहिए कि 30-40 हजार वर्ष पूर्व हमारे पूर्वजों ने ये शैल चित्र बनाए थे।
जल विकास अभिकरण खुद भ्रमित
प्यासे बुंदेलखंड की प्यास केन-बेतवा लिंक कभी नहीं बुझा पाएगी। ये निश्चित है। राष्ट्रीय जल विकास अभिकरण खुद इस योजना को लेकर भ्रमित है। उनके पास 15 से 18 वर्ष पुराने अभिलेख हैं। उन्हीं के अध्ययन आधार पर ये परियोजना बनाई गई है। हम इसका विरोध करते हैं।
-अमित भटनागर, पर्यावरण कार्यकर्ता
आशीष ने विशेषज्ञों को बताई जमीनी हकीकत
पर्यावरण संसद में चित्रकूटधाम मंडल से आरटीआई एक्टिविस्ट और पर्यावरण कार्यकर्ता आशीष सागर दीक्षित शामिल हुए। उन्होंने बकस्वाहा जंगल और केन बेतवा लिंक परियोजना स्थलों पर अपने किए गए भ्रमण और वहां की वास्तविक स्थितियों से पर्यावरणविदों को अवगत कराया।

कई सत्रों में चली राष्ट्रीय पर्यावरण संसद
राष्ट्रीय पर्यावरण संसद सुबह 9 बजे से शाम 6 बजे तक चली। पर्यावरण विचार सत्र, ऑनलाइन सत्र, राजनीतिक सत्र और हरित संकल्प हुए।
संसद का आयोजन पर्यावरण बचाओ अभियान, बकस्वाहा जंगल बचाओ अभियान, पाषाणकालीन सभ्यता बचाओ अभियान सहित पराक्रम जनसेवी संस्थान, भोपाल और जन विकास संगठन ने किया था।
मुख्य कर्ताधर्ता शरद सिंह कुमरे और अमित भटनागर रहे। इनके अलावा डॉ. अश्विनी दुबे, राजेश यादव, मनीष जैन, अधिवक्ता एमएस खरे इत्यादि भी शामिल रहे।
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