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Banda News: पितृपक्ष में गूंजते हैं महबुलिया के लोकगीत
Sun, 04 Oct 2026 11:15 PM IST
कानपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बांदा
संवाद न्यूज एजेंसी, बांदा
Updated Sun, 04 Oct 2026 11:15 PM IST
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फोटो 21- बबेरू के एक तालाब में महबुलिया पूजा करतीं बालिकाएं। संवाद
बांदा। बुंदेलखंड के लोक जीवन में पितृपक्ष केवल पूर्वजों के तर्पण तक सीमित नहीं है।
इन 16 दिनों में गांवों में बालिकाओं द्वारा की जाने वाली महबुलिया पूजा लोकपरंपरा, आस्था और संस्कार का अनूठा संगम है। यह परंपरा नई पीढ़ी को अपनी जड़ों और लोकसंस्कृति से जोड़ती है।
सनातन परंपरा में पितृऋण महत्वपूर्ण माना गया है। इसमें पूर्वजों के श्राद्ध के साथ प्रकृति के प्रति कृतज्ञता भी समाहित है। महबुलिया पूजा इसी लोक भावना को जीवंत करती है। पितृपक्ष के 16 दिनों तक गांवों में बालिकाओं के पारंपरिक गीत गूंजते हैं। यह वातावरण को लोकमय बना देते हैं। पूजा के लिए बालिकाएं समूह बनाती हैं। वे कंटीली झाड़ी को फूलों और पत्तों से सजाती हैं।
विधिवत पूजन के बाद सजी झाड़ी को गीत गाते हुए तालाब या पोखर तक ले जाया जाता है। वहां फूल-पत्तियां कांटों से अलग कर पानी में विसर्जित की जाती हैं। बालिकाएं लाई और भिगोए चने की दाल समेत प्रसाद बांटती हैं। लोकमान्यता है कि वर्षों पहले महबुलिया नाम की एक वृद्ध महिला ने यह पूजा शुरू की थी। यह अनुष्ठान उनके नाम से महबुलिया कहलाने लगा और आज भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी जारी है।
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इन 16 दिनों में गांवों में बालिकाओं द्वारा की जाने वाली महबुलिया पूजा लोकपरंपरा, आस्था और संस्कार का अनूठा संगम है। यह परंपरा नई पीढ़ी को अपनी जड़ों और लोकसंस्कृति से जोड़ती है।
सनातन परंपरा में पितृऋण महत्वपूर्ण माना गया है। इसमें पूर्वजों के श्राद्ध के साथ प्रकृति के प्रति कृतज्ञता भी समाहित है। महबुलिया पूजा इसी लोक भावना को जीवंत करती है। पितृपक्ष के 16 दिनों तक गांवों में बालिकाओं के पारंपरिक गीत गूंजते हैं। यह वातावरण को लोकमय बना देते हैं। पूजा के लिए बालिकाएं समूह बनाती हैं। वे कंटीली झाड़ी को फूलों और पत्तों से सजाती हैं।
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विधिवत पूजन के बाद सजी झाड़ी को गीत गाते हुए तालाब या पोखर तक ले जाया जाता है। वहां फूल-पत्तियां कांटों से अलग कर पानी में विसर्जित की जाती हैं। बालिकाएं लाई और भिगोए चने की दाल समेत प्रसाद बांटती हैं। लोकमान्यता है कि वर्षों पहले महबुलिया नाम की एक वृद्ध महिला ने यह पूजा शुरू की थी। यह अनुष्ठान उनके नाम से महबुलिया कहलाने लगा और आज भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी जारी है।
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