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जिला अस्पताल : पांच घंटे के बाद भी बिना इलाज लौटे
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बांदा। जिला अस्पताल में कहने को तो रोजाना सैकड़ों मरीज इलाज के लिए आते हैं, लेकिन कितने इस सरकारी सुविधा का फायदा उठाकर लौटते हैं, कोई बताने वाला नहीं है। पहली बात यहां इलाज कराना हो तो जेब में पैसा और समय होना बहुत जरूरी है। यहां भले ही एक रुपये में पर्चा बनता हो, लेकिन ज्यादातर जांच और दवाएं मरीज को बाहर से ही लेनी पड़ेंगी। पर्चा बनवाने से लेकर दवा लेकर घर लौटने में मरीज को करीब पांच से छह घंटे का समय लग जाता है। प्रस्तुत है जिला अस्पताल की दुश्वारियों पर आधारित सुशील त्रिपाठी की लाइव रिपोर्ट
सुबह आठ बजे पर्चा काउंटर पर लंबी लाइन लगी थी। यह देखकर हमारा लौटने का मन किया। फिर किसी ने बताया कि महिला काउंटर पर भी पर्चा बनवाया जा सकता है। वहां पहुंचे तो महिला काउंटर पर बैठे कर्मचारी दिलशाद ने हाथ में एक रुपये का पर्चा थमाते हुए बताया कि फलां डॉक्टर को दिखाएं। रिपोर्टर ने पेट दर्द, सूजन, गैस न पास होना आदि शिकायतें डॉक्टर को बताई।
इस पर डॉक्टर ने कहा कि ये कुछ जांच हैं करवा लीजिए। इसमें अल्ट्रासाउंड आप चाहें तो बाहर से करवा लें, क्योंकि यहां की रिपोर्ट इतनी विश्वसनीय नहीं है। उन्होंने एक अल्ट्रासाउंड सेंटर का नाम भी बताया और एक दिन पहले एक मरीज की गलत रिपोर्ट का हवाला देते हुए बाहर की रिपोर्ट को सही बताया।
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डॉक्टर की बात मानकर रिपोर्टर जब सेंटर पर पहुंचा तो पता चला कि 700 रुपये में अल्ट्रासाउंड होगा। जेब में इतने पैसे नहीं थे तो वापस आकर जिला अस्पताल में ही 8:50 बजे अल्ट्रासाउंड के लिए पर्चा जमा कर दिया। यहां 69 मरीजों के बाद 70वां नंबर मिला। करीब चार घंटे बाद 12:50 बजे अल्ट्रासाउंड का नंबर आया। अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट लेकर डॉक्टर से दवा लिखवाने के बाद जाकर देखा तो दवा काउंटर ही बंद हो गया था। काउंटर के पास बैठे कर्मचारी ने बताया कि अब सुबह आना। मरता क्या न करता, सो पांच घंटे के बाद भी दवा की बजाय एक रुपये का पर्चा और जांच रिपोर्ट लेकर वापस लौटना पड़ा। (संवाद)
डॉक्टर साहब, 1000 की दवा नहीं खरीद सकती
एक केबिन के सामने रुककर देखा तो भीतर खड़ी महिला डॉक्टर से कह रही थी कि साहब मेडिकल स्टोर वाले एक हजार रुपये की दवा बता रहे हैं। मेरे पास इतने रुपये नहीं है। लिहाजा आप अस्पताल से ही दवा लिख दो। इस पर डॉक्टर ने उससे पर्चा लेकर उस पर पेन चलाना शुरू कर दिया।
डॉक्टरों ने ठानी, करते रहेंगे मनमानी
कई बार ओपीडी में डॉक्टरों के समय से न आने की शिकायतें अधिकारियों से की जा चुकी हैं, लेकिन लेटलतीफी है कि खत्म होने का नाम नहीं ले रही है। शुक्रवार को भी मानसिक रोग विभाग के कमरा नंबर पांच में डाॅ. हरदयाल 8:40 बजे तक नहीं पहुंचे थे। बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. आरके गुप्ता का समय ओपीडी में 9:30 से दो बजे तक का है, लेकिन वह 10:30 बजे आए। इस दौरान बीमार बच्चों को लेकर आए अभिभावक मायूस होेकर वापस भी हो रहे थे।
वर्जन...
इमरजेंसी में दवाएं अस्पताल के अलावा ट्रॉमा सेंटर से भी ली जा सकती हैं। जहां मरीज को अधिक समय नहीं लगता है। इसकी जानकारी मरीजों को हेल्प डेस्क से मिल सकती है। रही बात अल्ट्रासाउंड की तो एक मशीन होने के कारण इसमें देरी होती है। पत्राचार किया जा चुका है, जल्द ही अस्पताल को एक अल्ट्रा साउंड मशीन मिलने की संभावना है। -डॉ. आरके गुप्ता, सीएमएस, जिला अस्पताल।
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सुबह आठ बजे पर्चा काउंटर पर लंबी लाइन लगी थी। यह देखकर हमारा लौटने का मन किया। फिर किसी ने बताया कि महिला काउंटर पर भी पर्चा बनवाया जा सकता है। वहां पहुंचे तो महिला काउंटर पर बैठे कर्मचारी दिलशाद ने हाथ में एक रुपये का पर्चा थमाते हुए बताया कि फलां डॉक्टर को दिखाएं। रिपोर्टर ने पेट दर्द, सूजन, गैस न पास होना आदि शिकायतें डॉक्टर को बताई।
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इस पर डॉक्टर ने कहा कि ये कुछ जांच हैं करवा लीजिए। इसमें अल्ट्रासाउंड आप चाहें तो बाहर से करवा लें, क्योंकि यहां की रिपोर्ट इतनी विश्वसनीय नहीं है। उन्होंने एक अल्ट्रासाउंड सेंटर का नाम भी बताया और एक दिन पहले एक मरीज की गलत रिपोर्ट का हवाला देते हुए बाहर की रिपोर्ट को सही बताया।
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डॉक्टर की बात मानकर रिपोर्टर जब सेंटर पर पहुंचा तो पता चला कि 700 रुपये में अल्ट्रासाउंड होगा। जेब में इतने पैसे नहीं थे तो वापस आकर जिला अस्पताल में ही 8:50 बजे अल्ट्रासाउंड के लिए पर्चा जमा कर दिया। यहां 69 मरीजों के बाद 70वां नंबर मिला। करीब चार घंटे बाद 12:50 बजे अल्ट्रासाउंड का नंबर आया। अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट लेकर डॉक्टर से दवा लिखवाने के बाद जाकर देखा तो दवा काउंटर ही बंद हो गया था। काउंटर के पास बैठे कर्मचारी ने बताया कि अब सुबह आना। मरता क्या न करता, सो पांच घंटे के बाद भी दवा की बजाय एक रुपये का पर्चा और जांच रिपोर्ट लेकर वापस लौटना पड़ा। (संवाद)
डॉक्टर साहब, 1000 की दवा नहीं खरीद सकती
एक केबिन के सामने रुककर देखा तो भीतर खड़ी महिला डॉक्टर से कह रही थी कि साहब मेडिकल स्टोर वाले एक हजार रुपये की दवा बता रहे हैं। मेरे पास इतने रुपये नहीं है। लिहाजा आप अस्पताल से ही दवा लिख दो। इस पर डॉक्टर ने उससे पर्चा लेकर उस पर पेन चलाना शुरू कर दिया।
डॉक्टरों ने ठानी, करते रहेंगे मनमानी
कई बार ओपीडी में डॉक्टरों के समय से न आने की शिकायतें अधिकारियों से की जा चुकी हैं, लेकिन लेटलतीफी है कि खत्म होने का नाम नहीं ले रही है। शुक्रवार को भी मानसिक रोग विभाग के कमरा नंबर पांच में डाॅ. हरदयाल 8:40 बजे तक नहीं पहुंचे थे। बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. आरके गुप्ता का समय ओपीडी में 9:30 से दो बजे तक का है, लेकिन वह 10:30 बजे आए। इस दौरान बीमार बच्चों को लेकर आए अभिभावक मायूस होेकर वापस भी हो रहे थे।
वर्जन...
इमरजेंसी में दवाएं अस्पताल के अलावा ट्रॉमा सेंटर से भी ली जा सकती हैं। जहां मरीज को अधिक समय नहीं लगता है। इसकी जानकारी मरीजों को हेल्प डेस्क से मिल सकती है। रही बात अल्ट्रासाउंड की तो एक मशीन होने के कारण इसमें देरी होती है। पत्राचार किया जा चुका है, जल्द ही अस्पताल को एक अल्ट्रा साउंड मशीन मिलने की संभावना है। -डॉ. आरके गुप्ता, सीएमएस, जिला अस्पताल।